स्वामी निरंजन का भूषण पद्मविभूषण

स्वामी सत्यानंद सरस्वती की तस्वीर के सामने स्वामी निरंजन

इस बार पद्म पुरस्कारों में एक नाम स्वामी निरंजन का भी है। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बिहार स्कूल आफ योगा के कुलाधिपति हैं और मुंगेर में ही रहकर साधनारत हैं। भारत में बिहार स्कूल आफ योगा के बारे में कम लोग जानते हैं और उससे भी कम लोग स्वामी निरंजन के बारे में जानते हैं लेकिन जो जानते हैं वो ये भी जानते हैं उनका विश्व मानव स्वास्थ्य की उन्नति में कितना गहरा योगदान है। 
स्वामी निरंजन अपने गुरु स्वामी सत्यानंद सरस्वती के पास चार साल की उम्र में ही आ गये थे और दस साल की उम्र में सन्यासी हो गये। ११ साल की उम्र में योग प्रचार के लिए देश से बाहर चले गये और जिस उम्र में नौजवान कैरियर की शुरुआत करता है उस उम्र में (महज २३ साल) वो अपना काम पूरा करके वापस भारत लौट आये। यहां आकर वो बिहार स्कूल आफ योग के १९८३ में निदेशक बने और फिर उसके बाद परमहंस परंपरा में दीक्षित हुए। 

स्वामी निरंजन के बारे में कितना कुछ है कहने के लिए इसे चंद शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। दुनिया में योग का डंका बजाने वाले स्वामी सत्यानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी स्वामी निरंजन ने न सिर्फ योग का प्रसार किया बल्कि दुनियाभर में योग की जड़ें खोजी। स्वामी निरंजन पर अमेरिका में बहुतेरे प्रयोग हुए हैं। फिलहाल मुंगेर में रहकर वो नासा के एक प्रोजेक्ट में शामिल इकलौते सन्यासी हैं जो भविष्य में अंतरिक्ष में जानेवाले मनुष्यों के स्वास्थ्य पर शोध कर रहे हैं। उनके लिए भविष्य की ऐसी मेडिसिन पर काम कर रहे हैं जहां इलाज के लिए दवाइयों की नहीं बल्कि इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फ्रिक्वेन्सी की जरूरत होगी।

अब जबकि वो तपस्या में हैं तब सरकार द्वारा उनका यह नागरिक सम्मान भारत की सन्यास परंपरा और योग का सम्मान है। फिर भी इसे मैं किसी महान अवसर या सम्मान के रूप में नहीं देखता। परंपरा और लोकसेवा से काम किसी भी पुरस्कार से बड़े पुरस्कार होते हैं। स्वामी जी द्वारा स्थापित संस्थाओं के जरिए आज झारखण्ड के सौ गावों की देखभाल की जाती है। उनके लिए रोजी रोटी से लेकर शिक्षा संस्कार तक सब जिम्मेदारी सन्यासियों ने उठा रखी है। कहीं कोई सरकार नहीं। कहीं कोई प्लानिंग कमीशन नहीं। न प्रोजेक्ट और न ही खाता बही। सब ईश्वरीय कार्य है और उसे ही समर्पित है। 

सन्यासी के काम का साक्षी ईश्वर होता है। स्वामी जी कहते थे सन्यासी चक्रवर्ती सम्राट होता है। उसे कोई क्या दे सकता है? वह पूरी दुनिया को देता है। फिर कोई सम्मान दे या न दे, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सम्मान मिला तो ठीक। न मिला तो भी ठीक। वह नर सेवा में नारायण सेवा की अपनी अनंत यात्रा निर्बाध रुप से जारी रखता है।

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