हाइपरलूप हाजिर हो!

क्या यह जरूरी है कि जब दुनिया में कोई तकनीकि पुरानी पड़ जाए तभी हम उसे हाथ लगायें? अगर नहीं तो भविष्य भारत के दरवाजे पर खड़ा है। टेसला मोटर्स के संस्थापक एलन मस्क ने जिस हाइपरलूप परिवन प्रणाली का सपना सामने रखा है उसके हकीकत बनने में कोई खास रुकावट नहीं आनी चाहिए। 
हाइपरलूप एक नये तरह की परिवहन प्रणाली है। एयर, रेल और रोड ट्रांसपोर्ट से अलग। एक चौथा रास्ता। पॉड ट्रांसपोर्ट जहां एक लो प्रेशराइज्ड एयर ट्यूब में एक पॉड या बक्सा तैरता है। हवा का दबाव कम होते ही गति आवाज की रफ्तार तक जा सकती है। यही तकनीकि हाइपरलूप में इस्तेमाल हुई है। एलन मस्क का दावा है कि हाइपरलूप ट्यूब ११०० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है जिसके कारण शहरों के बीच दूरी उम्मीद से कम समय में पूरी की जा सकती है। दिल्ली से मुंबई सवा घंटे में। 

हालांकि हाइपरलूप का अभी प्रायोगिक परीक्षण भी नहीं हुआ है और सब कम्प्यूटर के सिम्यूलेटर पर ही है लेकिन नतीजे निराशाजनक नहीं है। इसी साल मार्च में अमेरिका में पहला टेस्ट ट्रैक बनकर तैयार हो जाएगा जहां इसका परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद दुबई से आबू धाबी के बीच पहला हाइपरलूप ट्रैक २०२० में आपरेशनल हो जाएगा। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने बहुत सकारात्मक संकेत दिया है। न केवल भारत सरकार का परिवहन मंत्रालय मुंबई से पुणे के बीच पहला हाइपरलूप ट्रैक बिछाने की योजना बना रहा है बल्कि भारत से निवेशकों और तकनीशियनों ने इसमें बहुत रूचि दिखाई है। इसका नतीजा ये है कि कंपनी के अधिकारी इन दिनों भारत के दौरे पर हैं। 

हाइपरलूप भारत जैसी सघन आबादी वाले देश के लिए ट्रेन और प्लेन से ज्यादा फायदे का सौदा है। अगर एक मिनट के अंतराल पर सेवा दे तो हाइपरलूप हर घंटे आठ सौ लोगों को एक तरफ से दूसरी तरफ ले जा सकता है। अंतराल आधा मिनट कर दिया जाए तो सोलह सौ लोग और अगर अंतराल १५ सेकेण्ड का हो तो हर घण्टे ३२०० लोग एक तरफ से दूसरी तरफ की यात्रा कर सकते हैं। यह प्लेन के मुकाबले बेहतर है और ट्रेन के मुकाबले में भी। यह एक तरह से दो शहरों के बीच मेट्रो सर्विस जैसी सुविधा होगी और प्लेन और ट्रेन से सस्ती भी। 

निर्माण लागत बुलेट ट्रेन के मुकाबले चौथाई है लिहाजा इसे बनाना भी कोई खर्चीला काम नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यूएई के बाद भारत ही वह देश होगा जहां हाइपरलूप की सेवा शुरू होगी। लंबी दूरी के भविष्य के इस परिवहन को हम जितना जल्दी स्वीकार करें, उतना अच्छा।

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