करणी माता की करणी सेना

गाने बजाने वाले लोग कभी उच्चकोटि के लोग नहीं समझे गये शायद इसीलिए चारण शब्द का बहुत अनादर किया गया है उत्तर भारत में। चारण भांट का इस्तेमाल चमचों के लिए होने लगा। जबकि चारण लोग विरुदावली गाते हैं। उनकी ऐसी अद्भुद प्रतिभा होती है कि तत्काल कविता रच लेते हैं। लेकिन इन चारण लोगों की प्रतिष्ठा राजस्थान में देवताओं जैसी है। इसका कारण है। 
समाज व्यवस्था में चारण राजपूतों से उच्च स्थान रखते हैं। वो धरती पर देवताओं के प्रतिनिधि हैं। समाज के संरक्षक। इसलिए जब भी समाज पर संकट आया चारण सबसे आगे आये। समाज को बचाने के लिए सदियों मुस्लिम आक्रमणकारियों से युद्ध करते रहे, लेकिन साथ साथ एक दूसरा काम भी किया। शक्ति की उपासना। इसलिए चारण समाज में सप्त देवियां अवतरित हुई हैं। इन देवियों में ही एक देवी थी करणी माता। 

करणी माता कोई मिथक नहीं हैं। वो एक जीती जागती हकीकत हैं। उनका जन्म भी उसी दौर में हुआ जिस दौर में रानी पद्मावती का जिक्र आता है। रिद्धू बाई में बचपन से ही ऐसे लक्षण दिखते थे जो उनके भीतर अलौकिक शक्ति का संकेत करते थे। उनके पिता मेधाजी को एक बार सांप ने काट लिया। उस वक्त रिद्धू बाई महज छह साल की थी। कहते हैं उनके छूने से ही सांप का जहर उतर गया। इसी तरह राव शेखा जी से जुड़ी कहानी है कि उन्होंने कैसे अपने कटोरे से पूरी सेना को भोजन करा दिया था। 

इन घटनाओं ने रिद्धू बाई को करणी माता के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया। करणी मतलब जो कर सके। रिद्धू बाई माता हिंगलाज की उपासक और उन्हीं के अवतार के रूप में प्रसिद्ध हुईं। यही करणी माता राजपूतों की इष्ट हैं। करणी माता का मंदिर आजकल अपने चूहों के लिए जाना जाता है। जिसके बारे में कहा जाता है कि चारण समाज के जो लोग मरते हैं वो चूहा बनकर आते हैं और करणी माता मंदिर में निवास करते हैं। इसलिए करणी माता मंदिर में चूहों का पूरा आदर किया जाता है।

इन्हीं करणी माता के नाम पर करणी सेना का गठन हुआ है। मीडिया में करणी सेना को जिस तरह से बदनाम किया जा रहा है वह अशोभनीय है। करणी सेना के लोग राह चलते न तो किसी को परेशान कर रहे हैं और न ही अपनी मान्यताओं को किसी पर थोप रहे हैं। हां, उनकी मान्यताओं से जुड़ी बातों पर जब प्रहार होता है तो वो उसके खिलाफ खड़े होते हैं। तो इसमें गलत क्या है? जहां तक संजय लीला भंसाली की फिल्म के सेट पर हुई हुड़दंग का मामला है तो इसमें करणी सेना के लोग अकेले जिम्मेदार नहीं है। संजय लीला भंसाली की प्रोडक्शन टीम भी जिम्मेवार है। 

इतिहास को देखने का एक जरिया किसी व्यक्ति का दिमाग हो सकता है लेकिन इतिहास को देखने का दूसरा जरिया समूह की आस्था होती है। परंपरा और मान्यताएं होती हैं। अलिखित इतिहास लिखित इतिहास से ज्यादा शक्तिशाली और प्रभावशाली होता है लिहाजा किसी एक व्यक्ति के दिमाग से एक समुदाय की मान्यता को खारिज नहीं किया जा सकता। जो ऐसी कोशिश करता है वह खुद खारिज हो जाता है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s