​मोदी और ट्रंप में बुनियादी अंतर

सवाल ये नहीं है कि ये अच्छा है या बुरा। सवाल ये है कि आप अपने बोलने पर कितना टिके रहते हैं। और अगर आपको लगता है कि आप जो बोल रहे हैं उस पर टिके रहना मुश्किल है तो फिर आप वह बोल ही क्यों रहे हैं? 
मेरी नजर में ट्रंप और मोदी का इसी नजरिए से आंकलन होना चाहिए। मोदी ने मुस्लिम चरमपंथ को अपने उत्थान का जरिया बनाया। मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ हिन्दुओं, बौद्धों, सिखों और जैनों के मन में जो गुस्सा है उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया खुद को इस्लाम के खिलाफ खड़ा एक लीडर दिखाकर। जबकि वो ऐसे नहीं हैं। उन्हें मुसलमान से अपने लिए स्वीकार्यता चाहिए और जिस दिन से वो प्रधानमंत्री बने हैं लगातार इसकी कोशिश भी कर रहे हैं। यह बात दीगर है मुसलमान उनको स्वीकार करने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है। 

इसके ठीक उलट ट्रंप हैं। ट्रंप ने अपने चुनावी भाषणों में रेडिकल इस्लाम के खिलाफ बोला और जीत गये तो तत्काल जो बोला उसे लागू करने लग गये। इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ के खिलाफ लड़ने का उनका अपना तरीका है और इस काम में ट्रंप अकेले नहीं हैं। ट्रंप के डिफेन्स सेक्रेटरी जनरल जेम्स मैटिस इस रेडिकल इस्लाम के खिलाफ खड़ी सबसे मुखर आवाज हैं। बीते कुछ सालों से अमेरिका के डिफेन्स और स्ट्रेटजिक इंस्टीट्यूट में इस बात पर लगभग एकराय बन गयी है कि रेडिकल इस्लाम पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है। खतरे की इस जद में अमेरिका सबसे पहले है। 

मिस्र के दार्शनिक और विचारक मुराद वहबा ने आज से तीन दशक पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि रेडिकल इस्लाम पहले सोवियत यूनियन को खत्म करेगा उसके बाद अमेरिका का नंबर आयेगा। अफगानिस्तान की लड़ाई के बाद अमेरिकी संस्थानों को यह यकीन हो गया कि हम जिसको हथियार बनाकर लड़ रहे हैं इसी हथियार से एक दिन हम खुद खत्म हो जाने वाले हैं। इसलिए अमेरिका एक नीति पर काम कर रहा है। ट्रंप उस नीति के सिर्फ मुखर वक्ता है और कुछ नहीं। नीति उनकी नहीं है। उनकी सिर्फ नीयत है। 

लेकिन यहां भारत जैसे उदार देश में कट्टर इस्लाम का वैसा कोई खतरा नहीं है जैसा पश्चिम के देशों में हैं। यहां का खतरा कट्टरता के बहावी और देओबंदी संस्करण से हैं जिसकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला सूफी इस्लाम वाला कश्मीर बन गया और हमारी सरकारें देखती रह गयीं। अरब दुनिया भर में इस्लाम का बहावी संस्करण विकसित कर रहा है इसलिए मस्जिदों और मदरसों के लिए जमकर धन बांट रहा है। इस बंदरबांट में भारत के भी मौलवियों को पैसा मिलता है जो उस पैसे से मदरसे चला रहे हैं और मस्जिदें बना रहे हैं। अगर मोदी ईमानदार होते तो कम से कम इस अरबी पूंजी पर नजर डालते। लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि कम लोग जानते हैं कि सऊदी व्यारारियों से गुजरात के कारोबारियों के बहुत करीबी रिश्ते हैं। खासकर कबाड़ के कारोबार के कारण। वह एक बहुत बड़ा नेक्सस है जो गुजरातियों और अरबी कारोबारियों के बीच चलता है।

मोदी भी इस्लामिक कट्टरता को कम करके बाकी समाज जिसमें सामान्य मुसलमान भी शामिल है, को नहीं बचाना चाहते। उनकी नीति तात्कालिक और सत्ता से जुड़ी हुई है। वो इस्लाम का डर दिखाकर सत्ता में बने रहना चाहते हैं ताकि अपने पूंजीवादी समर्थकों का भला करते रहें। इसलिए मोदी और उनके समर्थक इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ बोलते तो खूब हैं लेकिन करते कुछ नहीं। उन्हें मालूम है अगर हिन्दुओं के मन से यह डर निकल गया तो वो भला उन्हें वोट क्योंकर करेंगे? वो इस्लामिक कट्टरता का डर बनाकर रखना चाहते हैं ताकि सत्ता में बने रहें। 

मोदी और ट्रंप में यही बुनियादी अंतर है। सामान्य मुसलमान का दुश्मन कोई नहीं है। खतरा है उस रेडिकल और पोलिटिकल इस्लाम से जो खलीफा के ख्वाब में जीता है। एक खतरे को खत्म करने का उपाय कर रहा है तो दूसरा डर को हथियार बनाकर सत्ता भोग रहा है।

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