नबी निंदा के नाम पर

wp-image-1861936016jpg.jpgपाकिस्तान में मशाल खान की हत्या के बाद नबीं निंदा कानून पर फिर बहस चल पड़ी है। इससे पहले पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक ने कर दिया था तब भी सालों ऐसी ही बहस होती रही कि अल्लाह के निंदक को सजा देने का हक किसे है? पाकिस्तान में जो नबी निंदा कानून (ब्लासफेमी लॉ) मौजूद है उसका क्या औचित्य है? अगर इस तरह लोग इस्लाम के नाम पर एक दूसरे का कत्ल करेंगे तो कानूनों की क्या अहमियत रह जाएगी। इस बहस के बीच यह जानना जरूरी है कि पाकिस्तान की बुनियाद ही एक ऐसे घटना से पड़ी जिस पर आज पाकिस्तान बहस कर रहा है।

इल्मुद्दीन लाहौर का एक अनपढ़ नौजवान था। एक लोहार की भट्टी पर काम करता था। हथौड़े चलाकर लोहे पीटता था। तब लाहौर में हिन्दुओं का अच्छा खासा प्रभाव था। मुस्लिम बहुलता के बाद भी गीत, संगीत, कला, नाटक, थियेटर, प्रकाशन सब को हिन्दुओं ने जीवित रखा था। इन्हीं में एक प्रकाशन था प्रताप प्रकाशन। इसके मालिक थे राजपाल। राजपाल ने १९२३ में एक छोटी सी बुकलेट प्रकाशिक की, रंगीला रसूल। रंगीला रसूल का लेखन आर्यसमाजी चमूकृष्ण शास्त्री ने किया था और अपनी किताब में उन्होंने मुस्लिम विद्वानों के ही हवाले से मुहम्मद के जीवन पर प्रकाश डाला था।

इस किताब में मोहम्मद की निजी जिन्दगी के किस्से लिखे गये थे। ये सब किसी न किसी इस्लामिक विद्वान की किताब या हदीस में उल्लिखित हैं। लेकिन किताब के छपते ही गुस्सा भड़क गया। लाहौर जैसे उदार समाज में कई साल तक प्रताप प्रकाशन को बंद करने और लेखक को गिरफ्तार करने की मांग चलती रही। इसी बीच १९२७ में इल्मुद्दीन ने एक दिन अपने हथौड़े से मारकर राजपाल की हत्या कर दी। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसने अफवाह सुनी थी कि प्रकाशक ने उसके नबी का अपमान किया है।

इल्मुद्दीन गिरफ्तार हुआ। ब्रिटिश अदालत में उस पर हत्या का मुकदमा चला, लेकिन हत्या करते ही इल्मुद्दीन इस्लाम का हीरो बन गया। उस वक्त अल्लामा इकबाल इल्मुद्दीन के पक्ष में खुलकर खड़े हुए। अल्लामा ने मोहम्मद अली जिन्ना से बात की कि वह इल्मुद्दीन का केस लड़े। मोहम्मद अली जिन्ना इल्मुद्दीन के लिए लाहौर की अदालत में खड़े भी हुए लेकिन बचा नहीं पाये। आखिरकांर अक्टूबर १९२९ में इल्मुद्दीन को फांसी दे दी गयी।

इस घटना ने अल्लामा इकबाल को झकझोर कर रख दिया। अल्लामा ने देश के दूसरे नवाबों और रसूखदार मुसलमानों से संपर्क किया और उन्हें इल्मुद्दीन के नमाज ए जनाजा में बुलाया। जब वहां अल्लामा इकबाल से कहा गया कि आप प्रेयर करवायें तो उन्होंने कहा, इल्मुद्दीन इतने महान आदमी थे कि उनके नमाजे जनाजा की प्रार्थना के अगुवाई करने की पात्रता उनके अंदर नहीं है। एक अनपढ़ गंवार इल्मुद्दीन के सामने अल्लामा इकबाल जैसी शख्सियत खुद इतनी बौनी क्यों मान रही थी? क्योंकि उसने मजहब के नाम पर एक ऐसे व्यक्ति की हत्या कर दिया था जिसके ऊपर आरोप लगा था कि उसने नबी निंदा किया है।

इसके बाद दिसंबर १९३० में अल्लामा इकबाल इलाहाबाद आये और उन्होंने मुस्लिम लीग के जलसे में ब्रिटिश हुकूमत से एक ऐसे “ऑटोनॉमस स्टेट” की मांग सामने रखी जहां इस्लामिक कानूनों के मुताबिक एक आदर्श इस्लामिक राज्य स्थापित किया जा सके। इसके लिए उन्होंने पश्चिमी हिस्से की मांग की जो आज का पाकिस्तान है। अल्लामा इकबाल तो मर गये लेकिन यह मांग जिन्दा रही। इस्लाम के नाम पर ऑटोनॉमस स्टेट की जगह एक स्वतंत्र देश ही बन गया। और उसी देश में वही नबी निंदा वाला कानून आज उनके गले की हड्डी बन गया है। मुमताज कादरी भी इल्मुद्दीन की तरह गाजी ही था जिसने नबी निंदा के नाम पर सलमान तासीर की हत्या कर दी थी। आखिरकार मुमताज कादरी को फांसी हुई। अभी दो दिन पहले एक पत्रकारिता के छात्र को नबी निंदा के नाम पर पीट पीटकर मार दिया गया।

जो पाकिस्तान कभी नबीं निंदा के खिलाफ सख्त कानून बनाने की मांग के साथ बना था आज उस पाकिस्तान में वही कानून खत्म करने की मांग हो रही है। वह कानून तो शायद खत्म न हो, पाकिस्तान जरूर खत्म हो जाएगा।

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