मुस्लिम बेटी की घर वापसी

उज्मा पहले से शादी शुदा थी। शायद अली भी पहले से शादी शुदा था। लेकिन दोनों जब मलेशिया में मिले तो प्यार हो गया। अली पाकिस्तान का था और उज्मा भारत की। उज्मा लौटकर भारत आयी तो अली से मिलने इसी एक मई को पाकिस्तान चली गयी। उज्मा ने अपने रिश्ते के बारे में कुछ ऐसा खुलासा नहीं किया है कि जिससे लगे कि वह पाकिस्तान क्यों गयी थी लेकिन उसने जो कहा है वह यह कि खैबर पख्तूनख्वा के निवासी अली ने उससे बंदूक की नोक पर निकाह कर लिया लेकिन जैसे भी हो वह इस निकाह से निकलकर भारत आना चाहती है।

भारत सरकार की कोशिशों से वह भारत पहुंच भी चुकी है लेकिन इस दौरान बहुत सारी घटनाएं ऐसी भी हुई हैं जिस पर गौर करने की जरूरत है। उज्मा एक मई को पाकिस्तान पहुंचती है और तीन मई को ही वह खैबर से लौटकर इस्लामाबाद आ जाती है जहां वह भारतीय दूतावास के अधिकारियों से संपर्क करती है और कहती है कि वह यहां आकर फंस गयी है और अब उसे भारत वापस जाना है। दूतावास के अधिकारी तब तक बहुत मदद नहीं कर सकते थे जब तक कि वहां की अदालत इस मामले में हस्तक्षेप न करती। अली के मुताबिक वह उसकी पत्नी थी और न उसने उसे तलाक दिया था और न ही उज्मा ने उससे तलाक मांगा था।

ऐसे में सिर्फ अदालत ही यह तय कर सकती थी कि वह पाकिस्तान में अपने शौहर के साथ रहे या भारत वापस चली जाए। अदालत में उज्मा ने हवाला दिया कि पहली शादी से उसे एक बेटी है और वह गंभीर रूप से बीमार है। बेटी के इलाज के लिए उसका वापस लौटना जरूरी है। अदालत ने संभवत: इसी आधार पर उसे भारत वापस लौटने की इजाजत दे दी। लेकिन अभी भी वह अली की बीवी है और अली का कहना है कि अपनी बीवी को पाने के लिए वह कानूनी कोशिश जारी रखेगा।

लेकिन यहां इस कानूनी दांव पेंच से अलग सवाल दूसरे हैं। सवाल ये है कि भारत के मुसलमानों के मन में पाकिस्तान के लिए वही अपनापा है जो पाकिस्तानियों के मन में सऊदी अरब के लिए है। उत्तर भारत के ज्यादातर उर्दूभाषी मुसलमान मानते हैं कि पाकिस्तान उनके लिए ज्यादा हितैषी है और आखिरकार उन्हें किसी ऐसे राज्य में ही रहना है जो पाकिस्तान जैसा हो। यह ख्वाब पहवान चढ़ा रहे इसके लिए रोटी बेटी का रिश्ता कायम रखा गया है। बंटवारे के बाद सिर्फ भारत से गये मुसलमानों से ही रिश्ते बनाकर नहीं रखे गये हैं बल्कि नये रिश्ते भी तलाशे गये हैं। उत्तर भारतीय मुसलमान अपनी बेटियों की शादी पाकिस्तान करने पर बहुत गर्व का अनुभव करता है। कारण वही, दो कौमी मानसिकता।

लेकिन उज्मा ने पंद्रह दिन में ही महसूस कर लिया कि वह “मौत के कुएं” में गिर गयी है। बीते दो तीन दशकों में इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान में कट्टरता चरम पर चढ़ी है। खासकर, पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा के इलाके में। अफगानिस्तान और कश्मीर में आतंकवादियों की सप्लाई के लिए यहीं पर सबसे ज्यादा मुजाहिद कारखाने लगाये गये। किसी समाज को कट्टरपंथी बनाने के लिए इस्लाम के हर नुक्ते का सहारा लिया गया। जाहिर है, इस पूरी प्रक्रिया में समाज भी प्रदूषित हुआ और लोग भी। अब कट्टरपंथ पाकिस्तान में न्यू नार्मल है। ऐसे में भारत से जानेवाली किसी महिला के लिए वहां के वातावरण में घुल मिल पाना मुश्किल ही होगा।

लेकिन उज्मा की उस अपील पर भी भारतीय मुसलमान जरूर ध्यान दें जो मुस्लिम उम्माह की चाह में पाकिस्तान से मोहब्बत कर बैठे हैं कि भारत की मुस्लिम बेटियां शादी करके पाकिस्तान न जाएं। सानिया मिर्जा जैसे अपवाद हो सकते हैं लेकिन ज्यादातर की हालत उज्मा जैसी ही होती है। उज्मा की तो घर वापसी हो गयी, बाकी बेटियों की तो घर वापसी भी नहीं हो पाती।

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