​जब हम युद्ध नहीं लड़ते तब क्रिकेट खेलते हैं

भारत के खिलाफ जो पाकिस्तान बना उसको सिखाया गया कि वह आखिर बना क्यों है? मुसलमान पर कोई खतरा नहीं था। इस्लाम भी दूर दूर तक कहीं खतरे में नहीं था। फिर भी पाकिस्तान बना। वह इसलिए बना क्योंकि हमें लड़ना था। पाकिस्तान का मतलब क्या? ला इलाह लिल्लाह। इतिहास की किताबों ने मोहम्मद बिन कासिम से पाकिस्तान को बनाया तो मौलवी मौलाना चार कदम और आगे चले गये। दुनिया में सिर्फ हिन्दुस्तान ही अब वो जगह बची है जहां मुशरिक (मुर्तिपूजक) बसते हैं। सहाबा (पैगंबर मोहम्मद) की आखिरी तमन्ना यही थी कि इस मुशरिक हिन्दुस्तान को खत्म करके दीन ए इलाही को कायम कर दिया जाए। यह तभी हो सकता है जब हम उनसे पूरी तैयारी से लड़े। लड़ाई की इसी तैयारी के लिए पाकिस्तान बनाया गया।

चाहे दीन के हवाले से जायें, चाहे दुनिया के हवाले से। पाकिस्तान के डिजाइन में हिन्दुस्तान से युद्ध रचा बसा है। “भारत पाकिस्तान का दुश्मन नंबर वन है।” पाकिस्तान जब भी भारत को देखता है इसी नजरिए से देखता है। इस नजरिए ने उसे प्रेरित किया कि वह कश्मीर में जंगे आजादी को जारी रखे। इसी नजरिए से उसने खालिस्तान मूवमेन्ट पैदा किया। इसी नजरिए से उसने एक दशक तक भारत में बम विस्फोट करवाये। इसी नजरिए से उसने मुंबई पर आतंकी हमला करवाया और यही वह नजरिया है जो उसे भारत से क्रिकेट के मैदान में भिड़ाता है।

जाहिर है, जब एक पक्ष आपसे लड़ने के लिए ही डिजाइन किया गया हो तो आप कब तक जवाब नहीं देंगे। आजादी के सप्ताह भर के बाद ही जब इधर आजादी के जश्न में डूबा देश बंटवारे के अपने घाव पर मरहम लगा रहा था पाकिस्तान को कश्मीर पाने की सूझ गयी। जो मिला उससे संतोष नहीं था। जो नहीं मिला उसका असंतोष इतना गहरा था कि पंद्रह दिन में मुजाहिद कबाइली कश्मीर के भीतर थे। बुनियादी सोच जीत हार से ज्यादा अस्तित्व के ही स्वीकार या अस्वीकार से जुड़ा हुआ है। इसी सोच की प्रतिक्रिया में भारत के भीतर भी इसी तरह की सोच विकसित होने लगी जो पाकिस्तान के अस्तित्व को ही अस्वीकार करने लगी।

ये दोनों सोच दोनों ही देशों में बहुत गहरी उतर चुकी हैं। सरकार और सेना तक सीमित नहीं है। यह दोनों ही तरफ की आम जनता के दिलो दिमाग में रच बस चुकी हैं। इसलिए हम एक दूसरे के खिलाफ युद्धोन्माद में रहते हैं। सेनाएं फायरिंग कर सकती हैं लेकिन जनता क्या कर सकती है? जनता क्रिकेट के मैदान में उतरती है एक दूसरे पर मनोवैज्ञानिक जीत हार के जज्बे के साथ।

इसलिए भारत और पाकिस्तान जब युद्ध नहीं लड़ते तो क्रिकेट खेलते हैं। दोनों देशों के बीच होनेवाला क्रिकेट किसी शांति और सौहार्द का संदेश नहीं होता। यह एक दूसरे तरह का युद्ध है। जनता को युद्ध के मैदान से जो चाहिए, वह क्रिकेट के मैदान से हासिल कर लेती है। जैसे आज भारत की जनता ने लंदन में हासिल कर लिया है।

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