तैमूर चढ़ेगा फांसी पर

उस तैमूर ने भले ही इस्लाम के नाम पर हजारों लोगों को फांसी दी हो लेकिन इक्कीसवीं सदी के इस तैमूर को इस्लाम के नाम पर ही फांसी दी जाएगी। पाकिस्तान में तीस साल के तैमूर रजा को फांसी की सजा मुकर्रर की जा चुकी है। आतंक विरोधी अदालत ने एक साल की सुनवाई के बाद उसे नबी निंदा का दोषी पाया है। उसके ऊपर आरोप था कि उसने मुसलमानों के पैगंबर मोहम्मद और उनकी पत्नी आयेशा से जुड़ी आपत्तिजनक तस्वीरें इंटरनेट पर डाली थी।

तैमूर रजा शिया है और शिया मुसलमान पाकिस्तान में मजहबी मामलात में काफिर घोषित किये जा चुके हैं। पाकिस्तान की सुन्नी जमातें (खासकर देओबंदी) शिया मुसलमानों को काफिर मानती हैं और वाजिबुल कत्ल भी। जनरल जिया उस हक के जमाने में देओबंदी मदरसों से जो इस्लामी पौध विकसित हुई थी अब वह वट वृक्ष बन गयी है। राजनीतिक तौर पर तो अभी वह भेदभाव नहीं दिखता लेकिन मजहबी तौर पर शिया सुन्नी का बंटवारा बहुत गहरा हो गया है। वैसा ही जैसा सऊदी अरब और ईरान के बीच।

शिया मुसलमान पैगंबर मोहम्मद के प्रति पूरे वफादार हैं लेकिन उनकी पत्नी आयेशा उनकी श्रद्धा का विषय कभी नहीं रहीं। इसका कारण आयेशा का अली और हुसैन से युद्ध है जिसमें दोनों मारे गये थे। सैकड़ों साल से शिया सुन्नी का यह बंटवारा दिनों दिन गहरा ही होता गया है। ऐसे में पाकिस्तान में यह टकराव स्वाभाविक तौर पर होता रहता है। पाकिस्तान में एक अनुमान के मुताबिक दो से तीन करोड़ शिया मुसलमान हैं। तैमूर रजा की जिस फेसबुक पोस्ट पर उसके खिलाफ शिकायत की गयी वह भी उसी मजहबी मानसिकता से जुड़ी है जो शिया सुन्नी के बीच बंटवारा करती है। ऐसे में उसे फांसी की सजा देना बहुसंख्यक सुन्नी जमात के लिए खुशी का पैगाम भी है।

पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा के मशाल खान को जब कुछ समय पहले उसके कालेज के ही कुछ लड़कों ने नबी निंदा के नाम पर जान से मार दिया था तो पाकिस्तान में इस पर खूब बहस हुई लेकिन तैमूर रजा को फांसी की सजा के ऐलान के बाद सन्नाटा है। इसके कारण समझ में आते हैं। एक तो तैमूर रजा शिया है और दूसरा उसको सैनिक अदालत ने दोषी पाया है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि उसे दोषी पाया गया या नहीं, सवाल एक स्वतंत्र समाज और स्वतंत्र सोच का है कि क्या कोई व्यक्ति अपने धर्म या मजहब के बारे में खुलकर बात भी नहीं कर सकता? कम से कम सोशल मीडिया के इस दौर में यह सजा बहुत चौंकानेवाली है।

पाकिस्तान के निर्माण की बुनियाद में ही नबी निंदा कानून की मांग छिपी हुई है। बंटवारे से बहुत पहले 1927 में लाहौर में इल्मुद्दीन नामक एक लड़के ने एक हिन्दू प्रकाशक को इसलिए मार दिया था क्योंकि उसने सुन लिया था कि उसने कोई ऐसी किताब प्रकाशित की है जिसमें उसके नबी की निंदा की गयी है। इल्मुद्दीन को भले ही ब्रिटिश प्रशासन ने फांसी दे दी हो लेकिन इस घटना के बाद अल्लामा इकबाल ने ऐसे अलग राज्य की मांग उठा दी जिसमें “इस्लाम की हिफाजत” की जा सके। इल्मुद्दीन को मुसलमानों ने गाजी घोषित कर दिया और इस अलग राज्य की मांग इतनी आगे बढ़ी कि द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत का जन्म हो गया। मुसलमानों ने कहा कि हम अलग संस्कृति हैं और हम हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते।

पाकिस्तान बनने के बाद तत्काल नबी निंदा कानून बनाया गया और इस्लाम की किताब कुरान और पैगंबर मोहम्मद की निंदा करनेवाले को सख्त से सख्त सजा देने का प्रावधान किया गया लेकिन उसमें भी मृत्युदंड का प्रावधान नहीं किया गया था। मृत्युदंड का प्रावधान किया जिया उल हक ने। 1986 में जिया उल हक ने इस्लामी उसूलों के मुताबिक पाकिस्तान बनाने की अपनी जिद में उन्होंने नबी निंदा कानून की धारा 295 में बदलाव करके उसमें नबी की निंदा करनेवाले को उम्र कैद या फिर फांसी की सजा देने का प्रावधान किया गया। 1991 में पाकिस्तान की फेडरल शरीया कोर्ट ने उम्रकैद को नाकाफी माना और आदेश दिया कि नबी निंदा के दोषी व्यक्ति को सिर्फ फांसी ही दी जानी चाहिए।

इन कानूनी प्रावधानों के बाद पाकिस्तान में नबी निंदकों की बाढ़ आ गयी। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ यह एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। पाकिस्तान में जितने नबी निंदक केस दर्ज हुए हैं उनमें आधे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं। इनमें आशिया बीबी का केस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछल चुका है। हाल में ही बलोचिस्तान में एक हिन्दू व्यापारी के खिलाफ भी नबी निंदा कानून के तहत केस दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। मामला सिर्फ अदालतों तक ही नहीं है। मदरसों के प्रभाव में लोग खुद भी सजा दे देते हैं। कुछ कत्ल लोगोंं ने खुद ही कर दिये और कुछ को अदालतों ने दोषी पाये जाने पर फांसी की सजा दे दी। हालांकि अब तक ऐसे किसी नबी निंदक को फांसी नहीं हुई है और ऊपरी अदालतों से राहत मिलती रही है लेकिन तैमूर के मामले में फैसला फौजी अदालत ने दिया है इसलिए इसे बदल पाना मुश्किल होगा।

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