ईरान के खिलाफ अमेरिकी फरमान

IMG_20170612_1444291979 में खोमैनी ने ईरान में तख्तापलट किया तो आनन फानन में शाह के साथ साथ अमेरिका भी वहां से बाहर निकल गया। उसके दूतावास में दो हजार लोग थे। सब वापस चले गये। सिर्फ सौ लोग बचे रह गये। इन सौ लोगों को कुछ ईरानी छात्रों ने दूतावास में बंदी बना लिया। शर्त ये रखी गयी कि अमेरिका शाह को ईरान भेज दे तो ये बंदी छोड़ दिये जाएंगे। लंबी कहानी है लेकिन पंद्रह महीने की जोड़ तोड़ के बाद आखिरकार ये बंदी रिहा हुए।

इधर अमेरिका ने ईरान में हुए इस्लामी तख्तापलट और अमेरिकी नागरिकों को बंदी बनानेवालों को सबक सिखाने के लिए सद्दाम हुसैन को शह दे दिया कि वह ईरान पर हमला कर दे। सद्दाम हुसैन ने वही किया। सद्दाम के हमले के बाद ईरान ने हथियार की मजबूरी में फिर अमेरिका की तरफ हाथ बढ़ाया क्योंकि इस्लामी निजाम को सोवियत कम्युनिज्म कबूल न था। ईरान का जो पैसा अमेरिकी रक्षा विभाग में फंसा था उसके बदले उसे हथियार चाहिए था और अमेरिका को अपने कर्मचारी।

सौदाहो गया लेकिन वहां से ईरान जिस युद्ध में धंसा तो आठ साल इराक से लड़ता रहा। दोनों में शिया बहुलता है और अपने निर्वासन के दौरान खुद खोमैनी कर्बला में रह चुके थे लेकिन मौका मिलते ही जंग में कूद गये और अमेरिका दोनों को हथियार देता रहा। उधर ईरान से खाली होते ही इराक कुवैत में घुस गया और उसके बाद क्या हुआ यह हमारी पीढ़ी जानती है। वही अमेरिका जो ईरान के खिलाफ इराक को शह दे रहा था अब इराक के खिलाफ जस्टिस की जंग लड़ने लगा। सद्दाम हुसैन के शासन को बर्बाद कर दिया और ईरान में शिया निजाम के खिलाफ खड़ा अमेरिका इराक में सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद शियाओं को ही सत्ता सौंप देता है।

अब एक बार फिर अमेरिका की ईरान पर चढ़ाई है। अमेरिका यह बात कभी नहीं भूलेगा कि उसे किस तरह से वहां से बाहर निकाला गया था। इसलिए इस बार ईरान के खिलाफ उसने सऊदी अरब को अपना साथी बनाया है। सीधे तौर पर अमेरिका भले ही ईरान में लड़ता हुआ न दिखाई दे लेकिन सऊदी अरब के पीछे अमेरिका ही खड़ा नजर आयेगा। सऊदी अरब ने अभी कुछ दिन पहले जिस अरब नाटो का गठन किया है उसमें उसने घोषित तौर पर ईरान को आतंकी देश कहा है। ईरान के साथ अरब देशों में जिनके भी थोड़े बेहतर संबंध हैं सऊदी उनको सजा दे रहा है। कतर के खिलाफ प्रतिबंध लगाकर उसने अपनी मंशा साफ कर दी है कि अगर आप ईरान के साथ हैं तो हमारे साथ नहीं हो सकते।

ईरान में खोमैनी की शासन परंपरा को खत्म करने के लिए अमेरिका सऊदी अरब के साथ खड़ा है तो सऊदी अरब को इजरायल के साथ जाने में भी कोई परहेज नहीं है। बीते कुछ सालों से सऊदी अरब और इजरायल अपने साझा दुश्मन ईरान को सबक सिखाने के लिए कूटनीतिक संबंध बनाने से भी परहेज नहीं कर रहे।

जाहिर सी बात है मामला राजनीतिक कम, धार्मिक ज्यादा है। खोमैनी ने जिस धार्मिक शासन की स्थापना की है उसे नापसंद करने के सबके अपने अपने कारण हैं। सऊदी को इस्लाम में दूसरा आयतोल्ला (ईश्वर का दूत) नहीं चाहिए तो यहूदी अमेरिका और इजरायल कभी शिया के साथ मिलकर सुन्नी से लड़ेंगे तो कभी सुन्नी के साथ मिलकर शिया से।

अमेरिका खोमैनी को जीते जी तो खत्म नहीं कर सका लेकिन खोमैनी के मरने के बाद उन्हें जरूर खत्म कर देगा। हसन रुहानी का अपेक्षाकृत उदार शासन और ईरान में हिजाब निकाब के प्रति बढ़ती नफरत उसे एक बार फिर उसी आजादी की तरफ ले जा रही है जहां फरवरी 1979 के पहले खड़ा था।

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