चौधरी बनने के चक्कर में चित्त

IMG_20170614_202804अपने यहां एक कहावत है। चौबे गये छब्बे बनने, दूबे बनकर लौट आये। मतलब दो पल्ले से भी गंवा बैठे। यह कहावत इस वक्त पाकिस्तान पर बिल्कुल सटीक बैठती है। मुस्लिम उम्मा का चौधरी बनने के चक्कर में जो रही सही औकात है वह भी जा रही है।

ताजा मामला कतर पर सऊदी प्रतिबंध का है। सऊदी अरब ने कतर पर आरोप लगाया है कि वह आतंकवाद का समर्थन कर रहा है इसलिए सऊदी अरब और मिस्र ने संयुक्त रूप से कतर की कतरब्यौंत कर दी। सऊदी की अपनी शिकायत है। कतर ईरान का समर्थक है तो मिस्र की शिकायत है कि कतर मुस्लिम ब्रदरहुड को पैसा देता है जो मिस्र में सेकुलर शासक अल सीसी के खिलाफ एक खतरा है। लिहाजा उसने भी इस मुहिम में सऊदी का साथ दे दिया।

लेकिन पाकिस्तान चौधरी बनने के चक्कर में बुरी तरह फंस गया है। दो साल पहले जब सऊदी अरब ने यमन पर हमला किया था उस वक्त पाकिस्तान से अपनी सेना भेजने के लिए कहा था। पाकिस्तान ने सेना भेजने से मना कर दिया। उस वक्त उसका नजरिया था कि वह अरब के शिया सुन्नी के झगड़े में नहीं पड़ेगा। लेकिन इस बार वह यह नहीं कह पा रहा है। कारण? कारण यह कि सऊदी ने कुछ महीने पहले आतंक के खिलाफ सुन्नी देशों की एक अरब नाटो बनाने का ऐलान किया। बीते महीने सऊदी में उस अरब नाटो की पहली बैठक हुई जिसमें अमोरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी आमंत्रित किये गये थे।

इस बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तो शामिल हुए ही (हालांकि उन्हें बोलने नहीं दिया गया) लेकिन पाकिस्तान के पूर्व फौजी जनरल राहिल शरीफ भी विशेष तौर पर निमंत्रित किये गये थे। जनरल राहिल शरीफ को अरब नाटो का कमांडर बनाया गया है। लेकिन इसी बैठक में सऊदी ने ईरान को आतंकवादी नंबर एक घोषित कर दिया जिसके बाद पाकिस्तान की हालत खराब हो गयी। अब न तो वह इस अरब नाटो को उगल सकता है, और न ही निगल सकता है।

अगर वह अरब नाटो में शामिल होता है तो ईरान से दुश्मनी होती है जो उसके लिए घाटे का सौदा होता है। पाकिस्तान में दो से तीन करोड़ शिया मुसलमान हैं और ईरान का बार्डर पाकिस्तान की कमजोर कड़ी बलोचिस्तान से लगता है। पाकिस्तान को पूरा भरोसा है कि अगर वह ईरान के खिलाफ अरब नाटो में शामिल होता है तो न सिर्फ देश के भीतर के शिया विद्रोह कर देंगे बल्कि ईरान के बार्डर पर भी हालात सामान्य नहीं रहेंगे। ग्वादर पोर्ट पर चीन की गतिविधियों के बाद बलोचिस्तान पहले ही संवेदनशील मसला है। अगर वह सुन्नी समूह में जुड़ जाता है तो ईरान से पक्की दुश्मनी हो जाएगी।

लेकिन अब अगर वह अरब नाटो से बाहर निकलता है या राहिल शरीफ को वापस बुलाता है तो सऊदी अरब नाराज हो जाता है जो पाकिस्तान के बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय को पसंद नहीं आयेगा। ऐसे में सउदी किंग का यह साफ साफ पूछ लेना कि पाकिस्तान स्पष्ट करे कि वह सऊदी अरब के साथ है या कतर के साथ, पाकिस्तान की हालत और पतली कर देता है। मुस्लिम उम्मा का चौधरी बनने के चक्कर में पाकिस्तान सही जगह जाकर फंस गया है। अरब की वह राजनीति जिसके मूल में कबीलाई मानसिकता है, वह न कभी खत्म हुआ है और न कभी खत्म होगा। हां, पाकिस्तान जैसे चिड़िमार चौधरी जरूर उम्मा की भेंट चढ़ जाएंगे।

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