​योग के युग पतंजलि: परमहंस माधवदास

माधवदास न होते तो हमारे दौर में योग का पुनर्जागरण न होता। ऋषियों की साधना गुफाओं तक सिमटकर जैसे सदियों से बची हुई हुई थी वैसे ही न जाने और कितनी सदियों तक बची रहती। लेकिन सौ साल की उम्र में परमहंस माधवदास (बंगाली बाबा) ने महसूस किया कि वक्त आ गया है जब दुनिया को योग की शिक्षा दी जाए। और इसकी शुरूआत हुई आज से एक सौ दस साल पहले, गुजरात में।
परमहंस माधवदास ने अपने दो शिष्य चुने जिन्हें उन्होंने योग की शिक्षा दी। एक थे, मणि हरिभाई देसाई और दूसरे थे जगन्नाथ गुणे। दोनों ही गुजरात से थे। परमहंस माधवदास ने अपने दोनो शिष्यों से एक ही बात कही। जब तक योग के फायदे लोगों को पता नहीं होंगे कोई योग नहीं करेगा। इसलिए योग पर रिसर्च करो। इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करो कि यह मनुष्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

माधवदास की ही प्रेरणा से मणि देसाई ने योग से लोगों का इलाज शुरू किया। उनका पहला ठिकाना बना मुंबई में दादाभाई नौरोजी का घर। यहीं रहकर उन्होंने लोगों की बीमारियों का योग से उपचार शुरू किया। लेकिन यहां रहकर उन्होंने ज्यादा दिन काम नहीं किया। मणिभाई अब स्वामी योगेन्द्र हो गये थे और जल्द ही उन्होंने योग का पहला रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थापित कर दिया। इस तरह दुनिया का पहला योग रिसर्च इंस्टीट्यूट 1918 में मुंबई में स्थापित हुआ जो आज भी योग रिसर्च इंस्टीट्यूट के नाम से जाना जाता है। इसके दो साल बाद ही उन्होंने योग का दूसरा रिसर्च इंस्टीट्यूट अमेरिका में बनाया।

इधर बंगाली बाबा के दूसरे शिष्य जगन्नाथ गुणे ने योग की शिक्षा लेने के बाद मुंबई के ही पास लोनावाला में दूसरा योग रिसर्च इंस्टीट्यूट बनाया 1924 में। जगन्नाथ गुणे बाद में कुवलयानंद के नाम से जाने गये और लोनावाला का उनका रिसर्च इंस्टीट्यूट कैवल्यधाम के नाम से जाना जाता है।

दोनों ही रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बंगाली बाबा के निर्देशानुसार योग को गुफाओं से निकालकर लैबोरेटरी का सब्जेक्ट बनाया। व्यापक स्तर पर विभिन्न रोगों पर योग के प्रभाव का शोध किया गया। तब से लेकर आज तक योग के शरीर पर पड़नेवाले प्रभाव को लेकर लगातार शोध हो रहे हैं। उन्हीं शोध का नतीजा है कि पूरी दुनिया ने माना है कि योग का शरीर और मन पर सकारात्मक असर होता है। आज योग के नाम दुनिया का एक दिन निर्धारित हो गया है। लेकिन आज यह यह सब कुछ न होता अगर बंगाली बाबा न होते। यह योग दिवस परमहंस माधवदास को समर्पित है जिन्होंने इसे कंदराओं से बाहर निकालकर आम आदमी के लिए सुलभ करवाया।

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