चरवाहों की चमत्कारी जमीन

बाइबिल में इजरायल को चरवाहों की पवित्र जमीन कहा गया है। फिलिस्तीन का सबसे बड़ा शहर रामल्ला में जो राम है उसका मतलब होता है भेड़। भेड़ों को यहां बहुत पवित्र नजरिये से देखा जाता है जैसे भारत में गाय को। कारण ये कि यहां भेड़ें अर्थव्यवस्था का आधार हैं। वैसे तो सामान्य अर्थों में जब चरवाहों की जमीन कहा जाता है तो इसे भेड़ों के चरवाहों से ही समझा जाता है लेकिन चरवाहों की इस जमीन का दूसरा गहरा अर्थ भी है। बाइबिल कहती है कि हम सब भेड़े हैं। भेड़ मतलब सामान्य आदमी और इनको हांकने के लिए (दिशा दिखाने के लिए) जो देवदूत आये वो हुए चरवाहे।

चरवाहों की यह जमीन है बहुत चमत्कारी। यहां की मिट्टी में कुछ तो खास है। इब्राहिम, मूसा, ईसा इसी जमीन में पैदा हुए। यहीं से निकलकर ये लोग देश दुनिया के दूसरे हिस्सों तक इनका नाम भी पहुंचा और चमत्कार भी। इब्राहिम हों कि ईसा। ये दोनों ही चमत्कार पुरुष थे। शायद इसीलिए अरब में मोहम्मद आये तो उन्होंने इस चमत्कार से ही लड़ने का पहला काम किया। कुरान में बार बार अरब के मुसलमानों को यह संकेत दिया गया कि तुम्हारी किताब उनकी किताब (तौरात) से बेहतर है। अरब के लोगों पर इजरायल की जमीन का असर उतरे इसलिए भी शायद कुरान में इजरायल को दुश्मन करार दिया गया।

शायद अरबी लोगों को यह बात महसूस होती थी कि यहूदी सोच समझ, जीवन स्तर में हमसे श्रेष्ठ हैं इसलिए उनको मिटाकर अपनी श्रेष्ठता कायम करने की जंग लड़ी जाती रही। इब्राहिम के कारण पूरे अरब पर जबर्दस्त हिब्रू सभ्यता का असर रहा होगा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अल्लाह शब्द भी अरबी का शब्द नहीं है। हिब्रू का शब्द है जो अरबी में आया। यानी अरब के पास ईश्वर के लिए अपना कोई शब्द भी नहीं था, वह भी उन्होंने उसी हिब्रू से उधार लिया जिसके संहार के लिए घोेड़े पर सवार हुए थे।

यहूदियों के खिलाफ अरबी लोगों की यह घुड़सवारी मोहम्मद से लेकर सलादीन तक चलती रही। जाहिर है अरबी योद्धा यहूदियों पर भारी पड़े और उन्हें सदियों भटकने के लिए मजबूर करके रखा। जंग तो आज भी लड़ी जा रही है लेकिन अब क्योंकि खुद सऊदी अरब को ईरान से लड़ना है इसलिए उसने इजरायल के साथ गुपचुप कूटनीतिक संबंध स्थापित कर लिये हैं। अरब और यहूद का वह ऐतिहासिक युद्घ अब अरब और ईरान की जंग बन गया है। मजेदार तो यह है कि अभी भी हमारे यहां मुल्ला मौलवी मस्जिदों में यह तकरीर करना नहीं भूलते कि कैसे शिया मशलक यहूद की पैदाइश है। जबकि आज वही इजरायल ईरान को बर्बाद करने के लिए खड़ा है।

खैर, इसे इस्लाम और यहूद की जंग मानने की बजाय अगर आप अरब सभ्यता और हिब्रू सभ्यता की जंग के रूप में देखेंगे तो तस्वीर ज्यादा साफ नजर आयेगी। ऐसे में भारत जैसे देश की कोई खास भूमिका बनती नहीं है क्योंकि हम न तो अरब हैं और न ही यहूद। भारत को वही करना चाहिए जो वह कर रहा है। अरब, इजरायल, फिलीस्तीन और ईरान चारों से अपनी सहूलियत के मुताबिक रिश्ता रखे। बाकी उनका आपस का सभ्यतागत झगड़ा है। वो सदियों से लड़ते आये हैं और सदियों तक लड़ते रहेंगे। इसमें यहां बैठा कोई मुसलमान अगर इस्लाम के नाम पर तलवार भांजता है तो उसकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। या फिर कोई हिन्दूवादी बगल वाले मुसलमान से खार खाकर हिन्दू यहूदी भाई का नारा देता है तो उसकी बुद्धि पर उससे ज्यादा तरस खाना पड़ेगा।

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