कश्मीर में पाकिस्तान का जिहाद

१९६३ की बात है। कश्मीर के हजरत बल दरगाह से एक अफवाह फैलाई गयी कि पैगंबर मोहम्मद का पवित्र बाल जो यहां रखा था, वह गायब हो गया है। देखते ही देखते यह अफवाह पूरी कश्मीर घाटी में फैल गया। नतीजा ये हुआ कि आजादी के बाद पहली बार घाटी में हिन्दुओं पर संगठित रूप से हमला हुआ। 

यह घटना पाकिस्तान के लिए उम्मीद की नयी रोशनी थी। तत्काल १९६४ में पाकिस्तान में एक कश्मीर कमेटी का गठन किया गया जिसमें सेना के अधिकारी और खुफिया ब्यूरो के लोग शामिल किये गये। इस कमेटी को नाम दिया गया कश्मीर कमेटी। इस कश्मीर कमेटी को कश्मीर में स्थानीय लोगों की भावनाएं भड़काने का काम सौंपा गया। जनरल अयूब खान ने यह महसूस कर लिया था कि अगर कश्मीर में मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का दिया जाए तो कश्मीर में पाकिस्तान का काम बन जाएगा। 

दो दशक के बाद वही हुआ। अस्सी के दशक में फिर से इस्लामिक उभार आया और पाकिस्तान ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया। घाटी में निजामे मुस्तफा का नारा लगा और रातों रात घाटी से हिन्दुओं को समूल रूप से बाहर कर दिया गया। यह सब अनायास नहीं हुआ था। कश्मीर घाटी में पाकिस्तान ने पचास के दशक में ही जिहाद को एक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। पहली बार कर्नल अयूब खान ने दस लाख रूपये का फंड कश्मीरी मुसलमानों को दिया था। यही अयूब खान जब राष्ट्रपति बनते हैं तो १९६५ का युद्ध लड़ते हैं। 

कश्मीर घाटी के मुसलमान जिनकी बुनियाद सूफी इस्लाम में थी और जिन्होंने १९४७ में कबाइली हमले से अपनी जान माल बचाने के लिए भारतीय फौज का स्वागत किया था, वही कश्मीरी मुसलमान धीरे धीरे जिहादी होते गये। उन्हें जिहाद की शिक्षा देने में पाकिस्तान ने अरबों रूपये खर्च किये और देखते ही देखते पचास साठ साल में कश्मीर एक ऐसा जिन्न बन गया है जो बोतल में बंद होने को तैयार नहीं है। 

इस जिन्न को पालने पोसने में कांग्रेस की सरकारों और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने अपनी जबर भूमिका निभाई है। कांग्रेस ने अलगाववादी नेताओं को महत्व देकर जैसे तैसे हालात पर थोड़ा बहुत काबू रखने में कामयाबी जरूर पायी लेकिन वो भूल गये कि मसला तात्कालिक है ही नहीं। यह पाकिस्तान की एक दीर्घकालिक जंग है और यह तब तक लड़ेगा जब तक कश्मीर हासिल न कर ले या फिर खुद पाकिस्तान ही खत्म न हो जाए। कांग्रेस और सोशलिस्ट नेताओं की इस भूल ने कश्मीर समस्या को नासूर बना दिया। हवाला और दूसरे जायज नाजायज तरीकों से पैसा घाटी पहुंचता रहा है और जिहाद की फैक्ट्रियां चलती रहीं। अफगान वार से खाली हो चुके पाकिस्तान के आतंकी संगठन नये सिरे से कश्मीर में सक्रिय हो गये। 

इन परिस्थितियों में वामपंथी बुद्धिजीवियों ने कश्मीर की आग में घी डालने का काम किया। अरुन्धती रॉय और पंकज मिश्रा जैसे लेखकों ने जिहादियों से लड़ रही भारतीय सेना को कमजोर करने के लिए वहां लोगों के साथ ज्यादती का रोना रोया। यह बात तो सही है कि जहां कहीं भी सैनिक हस्तक्षेप होगा वहां मानवाधिकार का संकट खड़ा होना मुमकिन है। लेकिन इन लेखकों ने कभी ये नहीं बताया कि सेना यहां क्योंकर आना पड़ा? वो कौन से हालात हैं जिसकी वजह से सेना को यहां आना पड़ा और उन परिस्थितियों का निर्माण किसने किया और क्यों? 

ये सवाल कल भी वाजिब थे और आज भी। कश्मीर में पाकिस्तान ने जिहाद के जो बीज बोये हैं वो फल दे रहे हैं। भारत सरकार की अब तक की कुल रणनीति सिर्फ पत्ते और टहनियों को काटने की है। जो आतंकवादी बनकर बंदूक लिये घर से निकल जाता है सेना उसका पीछा करके उसे मार देती है। अगर सेना ऐसा न करे तो वह जिहादी सेना के कुछ लोगों तो मार देता है। कश्मीर में यह एक अंतहीन सिलसिला बन गया है। इससे पार पाने के लिए भारत सरकार को टहनियां और पत्ते छांटने की बजाय आतंकवाद की जड़ पर प्रहार करना पडे़गा। यह जड़ कहां और इसे कौन खाद पानी दे रहा है इसे सरकार भी जानती है और सभ्य समाज भी। जब तक पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित जिहाद की फैक्ट्री बंद नहीं की जाती और कश्मीर का सूफी इस्लाम वापस दोबारा घाटी में नहीं लौटता, कश्मीर के हालात में कोई खास बदलाव दिखाई नहीं देगा। 

अच्छी बात यह है कि वर्तमान मोदी सरकार इस दिशा में सक्रिय दिख रही है। कश्मीर में हवाला कारोबार की जांच, पाकिस्तान से रिश्तों में कठोरता और सीमा पर बढ़ी हुई चौकसी ऐसे उपाय हैं जिससे पाकिस्तान के हौसले पस्त होंगे। लेकिन सवाल तो फिर भी वही बना रहेगा, आखिर कब तक?

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