बीजेपी को बहुत याद आते हैं बाल ठाकरे

अमरनाथ में तीर्थयात्रियों पर हमले के बाद सोशल मीडिया पर अचानक से बाल ठाकरे उभर आये। कुछ हिन्दूवादियों को बाल ठाकरे का वह बयान याद आ गया जो उन्होंने नब्बे में दिया था। उस वक्त कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था और आतंकवादियों ने धमकी दिया कि वो अमरनाथ यात्रा नहीं होंने देंगे। इस धमकी के बाद बाल ठाकरे ने एक बयान दिया था कि अगर अमरनाथ यात्रा बंद हुई तो कोई हजयात्री बंबई से हजयात्रा पर नहीं जा पायेगा। आज सत्ताइस साल बाद हिन्दूवादियों द्वारा ठाकरे को याद करने का कारण है।

गुजरात दंगों के बाद मोदी की हालत उस जयंत जैसी हो गयी थी जिसने सीता के पैर में चोंच मार दिया था। हर कोई इन्हें हट हट कर दुत्कार रहा था और कोई नेता अपने पास खड़ा नहीं कर रहा था क्योंकि वाजपेयी जी उनसे नाराज हो गये थे। तब ऐसे समय में सिर्फ एक नेता था जो उनके साथ खड़ा हुआ। वह थे बाल ठाकरे। बाल ठाकरे ने मातोश्री में बुलाकर मोदी का स्वागत किया और आडवाणी से साफ कहा, “मोदी गया तो गुजरात गया।” संभवत: बाल ठाकरे के ही कहने पर प्रमोद महाजन ने मोदी बचाओ अभियान चलाया और अंतत: मोदी के सीएम की कुर्सी बच गयी।

यह बाल ठाकरे की अपनी सोच, समझ और कार्यशैली थी। जो कहते थे उस पर अडिग रहते थे। लेकिन ये संघी बैकग्राउण्ड वाले नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता थोड़े सी आत्मग्लानि में जीते हैं। थोड़ी सी क्या पूरी की पूरी आत्मग्लानि में ही जीते हैं। इसलिए इन लोगों में आत्मबल नाम की कोई चीज होती नहीं है। ये सब इतने कमजोर और भीरु होते हैं जरा सा आलोचना होने पर डिनायल मोड में चले जाते हैं। ना जी ना। हमारा कोई नाता नहीं उनसे।

राम मंदिर मुद्दे पर इनकी यही कमजोरी दिखी। पाकिस्तान के मुद्दे पर इनकी यही कमजोरी दिखी। धारा 370 पर यही कमजोरी दिखी और अब गाय के मुद्दे पर भी इनका यही भगोड़ापन नजर आ रहा है। ये बहुत कमजोर, भीरु और आत्मग्लानि से भरे लोग हैं। इन्हें कोई कह दे कि कौवा कान ले गया तो ये कान को नहीं टटोलते। कौवे के पीछे दौड़ लगा देते हैं।

ऐसे मेे आज इन्हीं में से कुछ लोगों को बाल ठाकरे याद आ रहे हैं तो गलत याद नहीं आ रहे। जिन छद्म नेताओं को इन्होंने अपना आदर्श मान लिया उन्होंने इनको धोखा दिया। फिर वो चाहे लौह पुरुष आडवाणी हों कि महाबली मोदी। इन सबमें एक रोग घर कर गया कि पागल समर्थकों की भीड़ का नेता होना कोई अच्छी बात नहीं है। इससे सर्व स्वीकार्यता नहीं बन पाती। इसलिए एक को जिन्ना सेकुलर नजर आ गये और दूसरे को गौ रक्षक गुण्डे।

आप बाल ठाकरे की आलोचना कर सकते हैं, उन्हें हिटलर और कम्युनल भी बता सकते हैं लेकिन बाल ठाकरे को पता था कि वो अपने राजनीतिक विरोधियों के लीडर नहीं हैं। बाल ठाकरे अपने समर्थकों के लीडर थे। आडवाणी और मोदी की तरह विरोधियों में अपनी स्वीकार्यता का शोक उन्हें कभी व्याप्त नहीं हुआ। इसलिए बाल ठाकरे मरने के बाद भी जिन्दा है और…………….!

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