35 ए को पलट दो

कश्मीर की राजनीति में अब असली आतंक आ गया है। ऐसा आतंक कि दो धुर राजनीतिक विरोधी मुफ्ती और अब्दुल्ला एक हो गये हैं। बाकी दलों को भी एक करने की कोशिश की जा रही है। मसला है, संविधान की एनेक्सर धारा 35A। इधर सुप्रीम कोर्ट में एक गैर सरकारी संस्था द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की राय जानने के लिए नोटिस जारी कर दिया है। यह नोटिस तब जारी किया गया जब केन्द्र सरकार के वकील ने कहा कि “यह प्रावधान संवैधानिक सवाल खड़ा करता है।”

सुप्रीम कोर्ट में एटार्नी जनरल के इस रुख से महबूबा मुफ्ती के कान खड़े हो गये। सुप्रीम कोर्ट में एटार्नी जनरल का रुख साफ संकेत करता है कि केन्द्र सरकार धारा 35A से पूरी तरह सहमत नहीं है। इसी के बाद महबूबा ने अब्दुल्ला खानदान से अपनी राजनीतिक दुश्मनी को किनारे रखकर “संकट” की इस घड़ी में साथ आने का फैसला कर लिया। महबूबा और अब्दुल्ला दोनों ही पहले राउण्ड की धमकी दे चुके हैं कि अगर इस धारा से छेड़छाड़ की गयी तो कश्मीर में “तिरंगे” को हाथ लगानेवाला कोई नहीं बचेगा। “कश्मीर इतना अशांत होगा कि फिर कोई शांत करा नहीं पायेगा।”

इस धारा पर न सिर्फ केन्द्र को बल्कि राज्य सरकार को बहुत गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कश्मीर के लिए इस विशेष धारा ने ही कश्मीर का विनाश कर दिया है? महाराजा हरि सिंह ने पंडितों के दबाव में १९२७ में राज्य के लिए यह विशेष प्रावधान किया था कि राज्य से बाहर का कोई नागरिक यहां की सरकारी सेवाओं में शामिल नहीं हो सकता। बताने की जरूरत नहीं कि कश्मीर की सरकारी सेवाओं में कभी कश्मीरी पंडितों का एकाधिकार था और वो नहीं चाहते थे कि पंजाबी लोग उनकी सेवाओं में हिस्सेदार बने। यही प्रावधान आजादी के बाद जारी रखा गया और १९५४ में भारत के राष्ट्रपति ने एक विशेष आदेश के जरिए संविधान में यह पुछल्ला जोड़ दिया जिसे ३५ ए कहते हैं। यह इसलिए किया गया कि कश्मीर में स्थायी निवासी का ढांचा न बदले।

जाहिर है यह अब्दुल्ला परिवार की मांग के बाद ही किया गया जो कि उस वक्त “कश्मीर के शेर” थे। यह किया तो गया कश्मीरियत को बचाने के लिए लेकिन आज तिरसठ साल बाद अगर आप समीक्षा करेंगे तो पायेंगे कि इसी धारा ने कश्मीर का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। एक ऐसे वक्त में जब पूरी दुनिया के देशों ने अपने अपने यहां व्यापार और आवाजाही से जुड़े सख्त कानूनों को नरम किया है तब देश के ही भीतर का एक राज्य का अलग थलग रहना उसके लिए फायदे का नहीं बल्कि घाटे का सौदा साबित हुआ है। कश्मीर में निवेश की असीमित संभावनाएं हैं। खासकर पर्यटन, खाद्य प्रसंस्करण, मनोरंजन और आईटी के क्षेत्र में। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मुख्यमंत्री बनते ही जिन अमिताभ मट्टू को अपना विशेष सलाहकार बनाया था उन्होंने भी इन्हीं क्षेत्रों में निवेश की संभावना बताई थी और काम भी शुरु किया था। लेकिन मुफ्ती के मरने और नये सिरे से आतंकवादी उभार ने उनकी कोशिशों पर रोक लगा दी।

कश्मीर में आतंकवाद को खत्म करने के लिए जरूरी है कि वहां के नागरिकों को विकास की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जाए। कश्मीर का विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक यह कानूनी धाराएं मौजूद रहेंगी जो निवेशक को वहां निवेश करने से रोकती हैं। और जब तक कश्मीर में सामान्य पूंजी निवेश नहीं होता कश्मीर के हालात कभी नहीं बदलेंगे। सरकारी पैसे से तो सिर्फ भ्रष्टाचार का तंत्र विकसित होता है और आज कश्मीर में अस्थिरता का एक बड़ा कारण सरकारी पैसा है जो एक तरफ भ्रष्ट नेता और अफसर पैदा करता है तो दूसरी तरफ नाराज नागरिक। कश्मीर के विकास के लिए जरूरी है कि देश विदेश के निवेशक सीधे पूंजी निवेश करें ताकि उसका लाभ सीधे जनता तक पहुंचे और जनता उसका हिस्सेदार बने।

इसके लिए जरूरी है कि राज्य सरकार बजाय विरोध करने के इसका समर्थन करे। इसी में राज्य का हित है और राज्य के नागरिकों का भी। वरना कश्मीर एक ऐसा अंधा कुआं बना रहेगा जहां दिन के उजाले में भी उम्मीद की रोशनी कभी पहुंच नहीं पायेगी।

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