गोरखपुर में मौत का मातम

एक आवाक कर देने वाली घटना की परतें उठाना शुरु करते हैं तो परत दर परत अवाक होते जाते हैं। भारी मन और सजल आंखों से सन्नाटे में समा जाते हैं। किसे दोष दें? किसे गलत कहें? किसे दोष देकर किसे दोषमुक्त कर देगें? उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में यूं तो हर साल इन्सेफिलाइटिस से पांच सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है, लेकिन इस साल अस्पताल प्रशासन की लापरवाही के कारण उन संघर्षरत जिन्दगियों में से कुछ की आक्सीजन खत्म हो गयी। नतीजा, दो दिन से मानवता गमगीन है।

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज का नाम ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर रखा गया है जो एक स्वतंत्र और खुशहाल भारत चाहते होंगे। बाबा राघव दास मेडिकल कालेज इस काम में पीछे भी नहीं रहा। यही वह कालेज है जिसकी लैब में यह पाया गया कि मैगी में खतरनाक रसायन मिलाया जाता है। यही वह कालेज है जो दशकों से इस इलाके में इन्सेफिलाइटिस जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ रहा है। लेकिन इसी अस्पताल में चार दिनों के भीतर साठ बच्चों की मौत की खबर से देश दहल गया।

इस अवाक कर देनेवाली खबर आने से ठीक पहले नौ अगस्त को खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने गोरखपुर प्रवास के दौरान अस्पताल का दौरा किया था। योगी गोरखपुर से हैं इसलिए वो जानते हैं कि इन्सेफिलाइटिस बीमारी का कहर इस क्षेत्र में कितना घातक है। उन्होंने वहां एक आइसीयू का भी उद्घाटन किया और वार्डों में जाकर रोगियों का हाल भी जाना। लेकिन इस दौरे में अस्पताल प्रशासन ने उनसे यह बात छिपा ली कि भुगतान न होने के कारण यहां आक्सीजन सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

यहां से अस्पताल प्रशासन का गोरखधंधा साफ दिखाई देता है। १ अगस्त २०१७ को अस्पताल प्रशासन को आक्सीजन सप्लाई करनेवाली कंपनी पुष्प सेल्स पत्र लिखती है कि अगर उनके बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया तो वो आक्सीजन सप्लाई करने में असमर्थ होंगे। पुष्प सेल्स ने अपने आपूर्तिकर्ता आइनेक्स का हवाला देते हुए लिखा कि भुगतान न होने की शक्ल में वह कंपनी लिक्विड आक्सीजन न देने की बात पहले ही कह चुकी है। इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन कंपनी का बकाया ६५ लाख का भुगतान नहीं करता है।

१० अगस्त को आक्सीजन डिपार्टमेन्ट के तीन कर्मचारियों ने चिट्ठी लिखकर बताया कि पुष्प सेल्स ने भुगतान न होने की सूरत में आक्सीजन सप्लाई रोक दी है और तत्काल आक्सीजन की व्यवस्था करें। लेकिन इस चेतावनी पर भी दिन में कोई कार्रवाई नहीं हुई और अगले चौबीस घण्टो में तीस बच्चों ने दम तोड़ दिया। यहां यह महत्वपूर्ण है कि जब आक्सीजन की कमी नहीं थी तब भी अस्पताल में बच्चों की मौत हो रही थी। नौ अगस्त को योगी अस्पताल में थे और उस दिन भी अस्पताल के रिकार्ड में नौ बच्चों की मौत दर्ज की गयी जबकि उस दिन आक्सीजन की वहां कोई कमी नहीं थी।

सिक्के का एक दूसरा पहलू ये भी है कि अस्पताल के कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला है। किसी डिपार्टमेन्ट में तीन महीने से तो किसी में छह महीने से कर्मचारी और डॉक्टर बिना वेतन के काम कर रहे हैं। जिसका सीधा सा मतलब है कि कहीं न कहीं सरकार भी दोषी है और अस्पताल को फंड रिलीज नहीं कर रही है।

गोरखपुर में इन्सेफिलाइटिस से बच्चों की मौत कोई नया हादसा नहीं है। अस्पताल दौरे से यह भी साफ दिख रहा है कि योगी इस खतरे को लेकर लापरवाह नहीं है लेकिन यह भी सच है कि राज्य सरकार और अस्पताल प्रशासन दोनों ने लापरवाही भी की है। सरकार का कहना है कि ऑक्सीजन के भुगतान के लिए पैसा जारी किया जा चुका है, फिर सवाल ये उठता है कि कंपनी तक वह पैसा क्यों नहीं पहुंचा और उसने आपूर्ति रोक दी? क्या वो मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल हैं जिन्होंने घटना के तुरंत बाद इस्तीफा दे दिया?

कोई न कोई कड़ी तो है जो कमजोर है और जिसकी कीमत नौनिहालों ने अपनी जान देकर चुकाई है। उस कमजोर कड़ी को तत्काल दूर किया जाना चाहिए।इससे उन नौनिहालों का जीवन तो वापस नहीं आ जाएगा जो चले गये लेकिन कम से कम उनकी कुर्बानी का फायदा दूसरी जिन्दगियों को जरूर मिलेगा।

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