अड़ियल योगी का अस्वीकार्य रवैया

कई बार ऐसा होता है कि आपका चुप रहना आपके बोलने से बेहतर साबित होता है। अगर बोलकर बात बिगड़ती है तो आदमी को चुप ही रहना चाहिए। गोरखपुर अस्पताल में अस्पताल प्रशासन की लापरवाही से हुई तीस बच्चों की मौत पर योगी चौबीस घण्टों तक चुप रहे। उनके पूर्व निर्धारित कार्यक्रम अबाध रूप से चलते रहे। ट्वीट पर ट्वीट आते रहे लेकिन उसमें गोरखपुर की घटना का कहीं कोई जिक्र नहीं। कोई संवेदना के दो शब्द नहीं।

लेकिन शाम होते होते उनका ट्वीटर एकाउण्ट खामोश हो गया। शायद उन्हें अंदाज लग चुका था कि गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में जो मौतें हुई हैं वो रोजमर्रा वाली मौते नहीं हैं। सिर्फ पांच छह घण्टों के भीतर तेइस बच्चे सिर्फ इसलिए जिन्दगी का संघर्ष नहीं कर पाये क्योंकि उनको कृतिम रूप से दी जा रही ऑक्सीजन खत्म हो गयी थी। अस्पताल के डॉक्टर अपनी तरफ से कोशिश कर रहे थे कि जैसे भी हो सके थमती सांसों के डोर को थाम लिया जाए। आसपास के अस्पतालों से डॉक्टरों ने अपने पैसे से ऑक्सीजन सिलेण्डर मंगवाये। लेकिन ये सारे उपाय कुछ नौनिहालों की जिन्दगी बचाने के लिए नाकाफी साबित हुए।

अगले दिन सुबह तक जब तक ऑक्सीजन की सप्लाई अस्पताल को हो पाती आग अस्पताल के बाहर फैल चुकी थी। अस्पताल प्रशासन के घपले घोटालों के सबूत ११ अगस्त की रात में ही सोशल मीडिया पर तैर गये थे। इसके बावजूद राज्य सरकार के मुख्यमंत्री योगी का पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं आया। वो इलाहाबाद गये। वहां केन्द्रीय मंत्रियों के साथ गंगा कार्यक्रम में शामिल हुए। भोज खाया। वापस लौटकर लखनऊ आये तब जाकर प्रेस कांफ्रेस किया और सप्लायर के माथे सारा दोष मढ़कर दोषमुक्त हो गये। जब पत्रकारों ने सवाल जवाब किया तो सरकार और अपने रुख को सही साबित करने के लिए लाल पीले भी हुए और पत्रकारों को ही आदेश जारी किया कि वो आंकड़ों को सही तरीके से सामने रखें।

अस्पताल में प्रशासन की लापरवाही से अबोध बच्चों की मौत पर उस तरह की शैली में बात नहीं जाती जिस शैली में किसी आतंकवादी या गुण्डे की मौत पर की जाती है। कई बार संवेदनशील मुद्दों पर बिना दोषी हुए भी मुखिया को व्यवस्था का दोष स्वीकार करना पड़ता है। यही उसे सच्चा जनप्रतिनिधि बनाता है। उन्हें समझना होगा कि मुख्यमंत्री होना महंथ होने जैसा बिल्कुल नहीं है।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि योगी को गोरखपुर में जो हुआ उससे कोई लेना देना नहीं है। यह तो योगी ही हैं जो दो दशक से इस महामारी से लड़ने में जनता की मदद कर रहे हैं। उन्हें मालूम था जुलाई अगस्त और सितंबर का महीना इन्सेफिलाइटिस जिसे स्थानीय लोग जापानी बुखार कहते हैं, उसके प्रकोप का महीना है। इसलिए इन दो महीनों में उन्होंने मेडिकल कालेज का दो बार दौरा किया। शासन प्रशासन बैठक ली और इस बीमारी से लड़ने में जो भी मदद चाहिए उन जरूरतों का जायजा लिया। इतने के बावजूद एक भ्रष्ट अधिकारी ने उनकी कोशिशों को पलीता लगा दिया और योगी के दामन पर वह दाग लग गया जिससे वो दो दशक से लड़ते रहे हैं।

योगी एक ईमानदार व्यक्ति और सख्त प्रशासक की छवि रखते हैं इसमें किसी को शक नहीं लेकिन अभी जन राजनीति के बहुत सारे गलियारों से गुजरना है जहां बिना उनकी गलती के उनके ऊपर आरोप लगेंगे, उनको दोषी बताया जाएगा और उन्हें वह स्वीकार भी करना होगा। सत्ता में बैठा व्यक्ति खुद निर्दोष होते हुए भी कई बार दोष स्वीकार करता है क्योंकि कोई एक व्यक्ति सत्ता नहीं होता। किसी और का दोष भी सीएम या पीएम के माथे पर ही जाता है जिसे उसे विनम्रता से स्वीकार करके कठोरता से ठीक करना होता है। ऐसे वक्त में जब पूरा प्रदेश इस दर्दनाक हादसे से आहत है तब योगी और उनके मंत्रियों को अपनी सरकार के ठीक होने का अड़ियल रुख नहीं अपनाना चाहिए। आखिर अस्पताल भी तो सरकार का ही हिस्सा है। अगर अस्पताल प्रशासन के एक भ्रष्ट अधिकारी की करतूत नौनिहाल बच्चों ने अपनी जान देकर चुकाई है तो क्या इसके लिए राज्य सरकार दोषी नहीं है? अस्पताल के प्रमुख ने मुख्यमंत्री को धोखे में रखा तो यह उनका अपना विभागीय मामला है। लेकिन दोष जितना अस्पताल प्रशासन को दिया जाएगा उससे कम राज्य सरकार को नहीं दिया जाएगा।

ऐसे में बीजेपी के मंत्री और मुख्यमंत्री खुद को सही बताकर सिर्फ जनता के गुस्से का शिकार ही बनेंगे और कुछ नहीं। योगी और उनके स्वास्थ्य मंत्री ने प्रेस कांफ्रेस करके जो सफाई दी है वह निंदनीय है। दूसरों को दोष देकर और खुद को क्लीन चिट देना यह सत्ता में बैठे व्यक्ति का काम नहीं होता। उम्मीद है योगी और उनके मंत्री सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी समझेंगे और ईमानदारी के अहंकार से मुक्त होकर संवेदनशीलता दिखायेंगे। वरना भारतीय राजनीति में किसी की हवा बनते तो देर लगती है, हवा होते देर नहीं लगती।

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