एक चिट्ठी अनाम कश्मीरियों के नाम

यह खुला खत कश्मीर के उस अनाम आम आवाम के नाम है जो बीते सात दशक से आजादी के उन्माद का शिकार रही है। वह जिसके नाम पर सबसे ज्यादा राजनीति हुई है, लेकिन इस राजनीति में सबसे ज्यादा उसने ही सफर किया है।

जैसा कि आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में इस वक्त एक जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही है। सुनवाई का मुद्दा है कि क्या कश्मीर में संविधान का विशेष प्रावधान धारा 35 ए रहना चाहिए या हटा देना चाहिए। जनहित याचिका दाखिल करनेवाले याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस धारा के कारण कश्मीर पूरी तरह से देश का हिस्सा नहीं बन पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और केन्द्र सरकार दोनों को संदेश भेजा है कि दोनों अपना अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करें।

अभी केन्द्र सरकार की तरफ से कोई जवाब तो नहीं आया है कि लेकिन राज्य की महबूबा मुफ्ती सरकार हिल गयी है। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती न केवल राज्य में अपने प्रबल राजनीतिक विरोधी अब्दुल्ला खानदान से सुलह कर ली है बल्कि दिल्ली आकर वो प्रधानमंत्री से भी भी मिलकर जा चुकी हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि अगर धारा 35ए को हटा लिया गया तो राज्य में ऐसी अशांति आयेगी जिसे कोई संभाल नहीं पायेगा। कुछ इसी तरह की बात फारुख अब्दुल्ला ने भी कही है कि राज्य में अमन चैन के लिए जरूरी है कि इस धारा के साथ छेड़छाड़ न की जाए।

कश्मीर के निवासियों को यह समझने की जरूरत है कि उनके ये नेता जो कह रहे हैं क्या उससे सचमुच कश्मीर के निवासियों को कोई फायदा होनेवाला है? अब तक 63 सालों से इस धारा के संरक्षण में कश्मीर का कौन सा विकास हो गया है? कौन सी कश्मीरियत बची रह गयी है? आज कश्मीर आतंक का घर बन गया है जहां हिंसा और उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला चल रहा है। कश्मीर के निवासियों को यह सोचने की जरूरत है कि जिन उपायों से उनकी विशेषता बचाने की कोशिश की गयी आज वही उपाय उनके लिए जेलखाना बन गये हैं। ऐसे वक्त में जब पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज बनती जा रही है और सूचना, संचार, निवेश के जरिए एक दूसरे की मदद कर रही है तब कश्मीर का यह रुख उसे केवल भारत से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से अलग थलग कर देता है।

सरकारी पैसे का जो तंत्र विकसित हुआ है उससे सिर्फ भ्रष्टाचार पैदा हो रहा है। इस भ्रष्टाचार में सरकारी कर्मचारियों, नेताओं और ठेकेदारों का हिस्सा तो है लेकिन आम कश्मीरी का कोई हिस्सा नहीं है। उसे अलगाववाद और इस्लामियत के भंवर जाल में उलझा कर रख दिया गया है। यह भंवरजाल एक कश्मीरी के लिए कितना घातक है इसका अंदाज इसी से लग सकता है कि हिन्दुओं के बाद अब कश्मीर से मुसलमानों का पलायन शुरु हो गया है। इस चक्रव्यूह को तोड़ना है तो कश्मीरियों को खुद आगे आकर अपने नेताओं से पूछना होगा कि आखिर इन विशेष प्रावधानों का उसे क्या फायदा हुआ है? क्या उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी में खुशहाली आयी है या उसकी समस्या दिन रात बढ़ी हैं? जिस कश्मीरी विशिष्टता को बचाने के लिए ये प्रावधान किये गये थे उससे कश्मीरी देश ही नहीं पूरी दुनिया में अलग थलग पड़ गया है। क्या आज के इस भूमंडलीकरण के दौर में कोई समाज खुद को इतना अलग थलग रखकर जीवित रह सकता है?

कश्मीर की हकीकत ये है कि कश्मीर के नाम पर कश्मीरियों का ही सबसे ज्यादा शोषण किया गया है। कश्मीरी इस शोषण के खिलाफ खड़ा न हो जाए इसलिए उनको इस्लाम और अलगाववाद के भंवर में फंसाकर रखा गया है। धारा 370 हो या आर्टिकल 35ए ये दोनों ही आज कश्मीर के लिए बेमतलब हो गये हैं। लेकिन कश्मीरी नेताओं की साजिश और जिद के कारण आज आम कश्मीरी सफर कर रहा है। सरकारी पैसे का जो भ्रष्ट तंत्र है उससे कश्मीरी नेताओं और नौकरशाहों की जेब तो गरम होती है लेकिन आम कश्मीरी के हिस्से में क्या आता है? जिहाद?

उम्मीद है, इस बार कश्मीरी आवाम इस बारे में सोचेगी और जिन्दगी के असल सवालों से खुद भी रूबरू होगी और अपने नेताओं को भी रुबरु करवायेगी। इसी में आम कश्मीरी का हित है। कश्मीर का हित है। भारत का हित है और समूची दुनिया का हित है। कश्मीर के लोगों को अंदाज भी नहीं है कि उनके नेताओं ने उनका क्या हक हासिल करने से उन्हें रोक रखा है।

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