फिर इस्लाम डाल पर

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14 अगस्त 1947। जिन्ना कराची में पाकिस्तान की पहली कान्सचुएट एसेम्बली को संबोधित करने के लिए खड़े हुए। उन्होंने कहा, “आप आजाद हैं। आप अपने मंदिर जाने के लिए आजाद हैं। आप अपनी मस्जिद जाने के लिए आजाद हैं। या जहां जाना चाहे वहां जाने के लिए आजाद हैं। राज्य का इससे कोई लेना देना नहीं है कि आपका धर्म क्या है या फिर आपकी जाति या नस्ल कौन सी है।” जिन्ना ने जोर देकर कहा, “हम इस सिद्धांत के साथ शुरुआत कर रहे हैं कि हर नागरिक समान नागरिक है

अगर जिन्ना के इस भाषण को ही हम आधार मानें तो फिर

सवाल ये उठता है कि अगर जिन्ना को एक ‘सेकुलर स्टेट आफ पाकिस्तान’ ही चाहिए था तो फिर उन्होंने इस्लाम के नाम पर अलग देश ही क्यों मांगा? जिस तरह का भाषण जिन्ना ने 14 अगस्त को कराची में दिया उसी से मिलता जुलता भाषण 15 अगस्त को नेहरू ने दिल्ली में दिया। नेहरू ने सिर्फ भाषण ही नहीं दिया बल्कि उस दिशा में काम भी किया। नेहरू चाहते तो बड़े स्तर पर देश का “हिन्दूकरण” कर सकते थे, जैसा कि पाकिस्तान में किया गया। लेकिन नेहरू ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। उन्होंने देश के बुनियादी विकास को अपना लक्ष्य बनाया।
जहां तक जिन्ना का सवाल है तो वो भी कोई ऐसे कट्टर इस्लामिक व्यक्ति नहीं थे। दांव पेंच, राजनीति ये सब करते हुए भी निजी जीवन में वो एक ब्रिटिश जीवनशैली वाले व्यक्ति थे। उन पर बहुत कुछ नया शोध हो चुका है जो बताता है कि जिन्ना लंदन से लौटना ही नहीं चाहते थे। अपने मित्र अल्लामा इकबाल की मौत के बाद उनका मुस्लिम लीग की राजननीति से भी मोहभंग हो गया था। लेकिन वो लौटे और पाकिस्तान की मांग के साथ लौटे। मुसलमान के नाम पर उन्होंने पाकिस्तान लिया और कई लाख बेगुनाह लोगों के कत्ल के जिम्मेदार बने।

आजादी के सत्तर साल बाद एक बार फिर से इतिहास के अनछुए तथ्यों को परखने की जरूरत है। जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद जो पाकिस्तान बनाना चाहते थे, पाकिस्तान वह नहीं बन पाया। पाकिस्तान वह बन गया जो जिन्ना पाकिस्तान बनने से पहले बनाने की मांग करते थे। सत्तर साल बाद वाले पाकिस्तान में आतंकवादियों और जिहादियों की बात छोड़िये पाकिस्तान का चीफ जस्टिस “हिन्दुओं” का नाम लेने में अपनी तौहीन समझता है। इधर भारत में मुसलमान फिर से नये सिरे से कसमसा रहा है। फतवे जारी कर रहा है कि राष्ट्रगान उसके लिए हराम है। तो क्या हम सत्तर साल में घूम फिरकर फिर वहीं खड़े हो गये हैं जहां से चले थे?

इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है क्योंकि आजादी के सत्तरवें साल में ही ठीक 14 अगस्त को ही समाजवादी पार्टी से जुड़ा एक छुटभैया नेता मवैया अली सीना ठोंककर ये कहता है कि उनके लिए इस्लाम पहले है, राष्ट्र बाद में। अगर किसी मसले में इस्लाम और राष्ट्र के कानून आमने सामने खड़े होते हैं तो वह राष्ट्र के कानूनों की परवाह नहीं करेगा, इस्लामी कानूनों का पालन करेगा। मवैया खान अकेला नहीं है। आजादी के सत्तर साल बाद उसकी जमात बड़ी हुई है और अब मुखर भी हो रही है। उनके वोटबैंक का प्रभाव ऐसा कि राजनीतिक दल खुलकर उनके दो कौमी नजरिए का सपोर्ट भी करते हैं।

यह समस्या अकेली भारत में ही खड़ी हो रही है ऐसा नहीं है। इस्लामिक देश होने के बाद भी पाकिस्तान में यह समस्या लगातार विकराल होती जा रही है कि पाकिस्तान सच्चे अर्थों में इस्लामिक मुल्क नहीं बन पाया है। तो क्या यह मान लिया जाए कि सत्तर सालों में भारत उपमहाद्वीप में इस्लामिक कट्टरता सन सैंतालिस के मुकाबले कई गुना ज्यादा बढ़ गयी है? दुर्भाग्य से इसका जवाब शायद हां है। इतिहास की नयी रोशनी में यह बात साबित होती है कि पाकिस्तान जिन्ना का धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक दांव था जिसके जरिए वो कांग्रेस से अपना बकाया हिसाब चुकता कर रहे थे। दुर्भाग्य से आज सत्तर साल बाद भारत में ही कई हिन्दू और मुस्लिम जिन्ना सिर उठा रहे हैं जो बीजेपी से अपना राजनीतिक हिसाब चुकाने के लिए मुस्लिम सांप्रदायिकता को संरक्षण दे रहे हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा खतरे की बात यह है कि सत्तर साल बाद अब इस्लाम जिस “राजनीतिक शुद्धता” की तरफ आगे बढ़ रहा है वह ज्यादा कट्टर मजहबी दांव है। उधर पाकिस्तान में कट्टरपंथी नेताओं की अगुवाई में नये पाकिस्तान की मुहिम और इधर धर्म की आड़ में राष्ट्र को खारिज करने की चाल उपमहाद्वीप के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं कर रहे हैं।

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