बंटवारे की बंदरबांट और कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया

कॉमरेड यासिर रशीद हमदानी गुप्त कामरेड हैं। गुप्त मतलब अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं कर सकते इसलिए वकील बनकर पाकिस्तान में रहते हैं। आज से तीन साल पहले उन्होंने एक लेख लिखा। “कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान का समर्थन क्यों किया?” अपने लेख में हमदानी इस बात का क्रेडिट लेते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया ने न केवल पाकिस्तान का समर्थन किया बल्कि अपने साथी कामरेड डैनियल लतीफी, सज्जाद जहीर और अब्दुल्ला मलिक को जिन्ना की मदद करने के लिए भेजा। कॉमरेड डैनियल लतीफी ने १९४५-४६ के पंजाब इलेक्शन में लीग का मैनिफेस्टो लिखा। कम्युनिस्ट पार्टी के कॉमरेडों ने केवल इलेक्शन मैनिफेस्टो ही नहीं लिखा बल्कि पंजाब चुनाव में मुस्लिम लीग का प्रचार भी किया।

१९४४ में कॉमरेड सज्जाद जहीर ने पीपुल्स पब्लिशिंग बांबे से एक लेख “लीग यूनियन कान्फ्लिक्ट” जारी किया जिसमें उन्होंने अलग पाकिस्तान की मुहिम का समर्थन करते हुए लिखा “यह हर देशभक्त के लिए जरूरी है कि वह पंजाब में इस ‘लोकतांत्रिक’ आवाज की मदद करे और अपना समर्थन दे जो पंजाब में मुसलमान उठा रहे हैं। लीग ने उपनिवेशवाद की आखिरी निशानी पर निर्णायक हमला कर दिया है।” कॉमरेड सज्जाद जहीर यह बात तब बोल रहे थे जब पंजाब में मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान की मुहिम चला रही थी और सज्जाद जहीर इसे “लोकतांत्रिक” मांग बताकर इसका समर्थन करने की जनवादी अपील कर रहे थे।

कॉमरेड सज्जाद जहीर अनायास ऐसा नहीं कर रहे थे। इससे ठीक चार साल पहले कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया के पोलित ब्यूरो में यह निर्णय ले लिया गया था कि वो “हिन्दू” गांधी की बजाय “जनवादी” जिन्ना की मांग का समर्थन करेंगे। उस वक्त कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पीसी जोशी ने पोलित ब्यूरो की बैठक का विवरण देते हुए एक लेख लिखा “कांग्रेस एण्ड द कम्युनिस्ट।” इस लेख में पीसी जोशी लिखते हैं, “कांग्रेस के मास लीडर गांधी थे जबकि मुस्लिम लीग के मास लीडर जिन्ना थे। वे मुसलमानों के उसी तरह कायदे आजम थे जिस तरह हिन्दुओं के लिए गांधी महात्मा।” जाहिर है कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया ने गांधी को हिन्दुओं का नेता माना, पूरे देश का नहीं। यहां यह भी समझने की जरूरत है कि कम्युनिस्ट ब्रिटिश इम्पीरियलिज्म के खिलाफ तो थे लेकिन आजादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं। यह समझना महत्वपूर्ण है। क्योंकि अगर वो आजादी की लड़ाई का हिस्सा होते तो गांधी को छोड़कर जिन्ना का समर्थन कभी नहीं करते।

पीसी जोशी लिखते हैं कि जब पोलित ब्यूरो की बैठक में यह मसला आया कि मजहब के आधार पर जिन्ना का समर्थन कैसे किया जा सकता है तो सदस्योें ने जिन्ना को मास लीडर का तमगा दे दिया जिसके बाद सांप्रदायिकता के संरक्षण का उनका रास्ता आसान हो गया। हालांकि आजादी के बाद जो कम्युनिस्ट पाकिस्तान गये जल्द ही उनको प्रतिबंधित कर दिया गया लेकिन यही कम्युनिस्ट यहां भारत में उसी कांग्रेस की पीठ पर लद गये जिसके विरोध में उन्होंने मुस्लिम लीग का समर्थन किया था। पाकिस्तान में तो भूले बिसरे कॉमरेड इस बात का श्रेय लेते भी हैं कि पाकिस्तान बनाने में किस तरह से उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी लेकिन भारत में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया ने इस मुद्दे को कभी बहस का हिस्सा नहीं बनने दिया कि बंटवारे के वक्त उनकी क्या भूमिका थी?

समय आ गया है कि नये सिरे से इस बारे में शोध हो कि जिन्ना को “बहकाने” में कम्युनिस्ट पार्टी की क्या भूमिका थी? आखिर बंटवारे के सालभर के भीतर ही जिन्ना को यह महसूस हो गया कि उनसे “गलती” हो गयी है। इस बारे में विस्तार से विचार करने की जरूरत है कि जिन्ना से यह “गलती” करवाने में मुस्लिम लीग के साथ साथ कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया की कितनी “भयावह” भूमिका थी। क्योंकि वे बंटवारे के ऐसे अदृश्य गुनहगार हैं जो इतिहास में दिखते तो कहीं नहीं लेकिन उन्होंने इतिहास को लहूलुहान करने में सबसे अहम भूमिका निभाई है।

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