शाह बानो से शायरा बानो तक: महिला संघर्ष के तीन दशक

यह १९७८ की बात है। शाह बानो तब ६२ साल की हो चुकी थीं जब उनके पति मोहम्मद खान ने उन्हें तलाक दे दिया। मोहम्मद खान पेशे से इंदौर में वकालत करते थे और शाह बानो से उनके पांच बच्चे थे। शाह बानो की ढलती उम्र ने मोहम्मद खान को किसी और महिला के प्रति आकर्षित कर दिया जो उम्र में उनसे डेढ़ दशक छोटी थी। इस्लामिक कानूनों के मुताबिक उन्होंने उस महिला से निकाह किया और शाह बानो को गुजारे के लिए दो सौ रूपया महीना देने लगे। कुछ समय बाद शाह बानो ने गुजारे के लिए पांच सौ रूपये महीने की मांग की क्योंकि पांच बच्चों के साथ दो सौ रूपये में गुजारा नहीं हो रहा था।

उनकी यह मांग अहमद खान को इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने शाह बानो को तलाक देकर घर से निकाल दिया और जो दो सौ रूपया महीना देते थे, वह भी बंद कर दिया। मजबूर होकर शाह बानो इंदौर कोर्ट चली गयीं जहां अदालत ने मोहम्मद खान को बीस रूपये महीना गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। मोहम्मद खान करते तो वकालत थे लेकिन कानून का निजी जीवन में कोई दखल बर्दाश्त नहीं करते थे। इसलिए इंदौर अदालत के फैसले के विरोध में मोहम्मद खान हाईकोर्ट चले गये। हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता खत्म करने की बजाय रकम बढ़ाकर १७९ रूपये मासिक निर्धारित कर दी। मोहम्मद खान ने हाईकोर्ट के फैसले को भी नहीं माना और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट में लंबी सुनवाई के बाद १९८५ में मुख्य न्यायाधीश वाईएस चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने हाईकोर्ट का गुजारा भत्ता देने का आदेश बरकार रखा।

अब मोहम्मद खान अदालतों की शरण में जाने की बजाय कौम की शरण में चले गये। कौम उनके साथ खड़ी हो गयी क्योंकि यह पौने दो सौ रूपये का मामला भर नहीं था। यह इस्लामिक सिद्धांत का मामला बन चुका था। सुन्नी मुसलमान अहमद खान के साथ खड़े हो गये और गुजारा भत्ता को गैर इस्लामिक बताते हुए तीन तलाक को निजी अधिकार बताया। पूरे देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि तत्कालीन राजीव गांधी सरकार झुक गयी और उसने १९८६ में “मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा” करते हुए एक ऐसा कानून बना दिया जिसने अदालत के आदेश की “हत्या” कर दी।

तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने जो कानून बनाया उसके मुताबिक कोई मुस्लिम महिला जिसे तलाक दिया गया हो वह इद्दत (तलाक से तीन महीने तक) के दौरान ही गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। एक बार इद्दत पूरी हुई तो मुस्लिम अपनी परित्यक्ता पत्नी को गुजारा भत्ता देने का जिम्मेवार नहीं है। यह कानून अब भी मौजूद है और शाह बानो प्रकरण के करीब तीस साल बाद उत्तराखण्ड की सायरा बानो की लड़ाई के लिए यही कानून जिम्मेवार हो गया।

छत्तीस साल की शायरा बानो उत्तराखण्ड के हल्द्वानी की रहने वाली हैं। दो साल पहले एक दिन इलाहाबाद में काम करनेवाले उनके पति ने उन्हें उसी तरह तीन तलाक दे दिया जैसे शाह बानो को मोहम्मद खान ने दिया था। शायरा कुछ नहीं कर सकती थीं। वो अपने बच्चों के साथ मायके आ गयीं। कुछ दिनों बाद उनके पति अपने बच्चों को भी उनके पास से लेकर चले गये। फिर बाद में १५००० रूपये का एक चेक भिजवा दिया। यह १५००० हजार रूपये का चेक कानूनी रूप से वही गुजारा भत्ता था जिसका कानून राजीव गांधी सरकार ने बनाया था। पहले से ही डिप्रेशन में जी रही शायरा बानो ने वह चेक भुनाया नहीं बल्कि अपने पास रख लिया। इसके बाद उन्होंने और उनके परिवार ने तय किया कि वो इस जलालत के खिलाफ जंग लड़ेंगे। क्या एक पूरी जिन्दगी को बर्बाद करने का मोल सिर्फ तीन महीने का गुजारा भत्ता होता है?

लेकिन उन्होंने शाह बानो की तरह गुजारा भत्ता मांगने की लड़ाई नहीं शुरु की बल्कि उस तीन तलाक वाली तलवार को ही तोड़ने का फैसला किया जो मुस्लिम महिलाओं के सिर पर हर समय लटकती रहती है। २३ फरवरी २०१६ को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक, हलाला और बहुपत्नी विवाह के खिलाफ केस दायर कर दिया।

मनोविज्ञान में मास्टर्स की डिग्री लेनेवाली शायरा ने गहरे अवसाद के बीच भी अपने आप पर काबू पाया और सुप्रीम में करीब सवा साल के संघर्ष के बाद वह निर्णय पा लिया जिससे उनकी जिन्दगी में कोई फर्क पड़े न पड़े लेकिन लाखों सिरों से तीन तलाक की तलवार हट गयी है। सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक पर अस्थाई रोक और सरकार को कानून बनाने की सलाह मिलने के बाद जब पत्रकारों ने शायरा से पूछा कि अब उन्हें कैसा महसूस हो रहा है तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि आनेवाली पीढ़ियां वह टार्चर नहीं भोगेंगी जो वो खुद भोग रही हैं।

शाह बानो से शुरु हुआ मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष शायरा बानो मामले में निर्णय से एक निर्णायक मोड़ पर तो आ गया है लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। कानून बनने और संसद से पारित होने तक उनका यह संघर्ष जारी रहेगा और शायद उसके बाद अपना हक पाने का संघर्ष शुरु होगा। इस बीच उनकी राह में अभी बहुत सारे मजहबी रोड़े आनेवाले हैं जिससे न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं को बल्कि सरकार को भी निपटना होगा। लेकिन केन्द्र की मोदी सरकार का रुख वह नहीं दिखता जो राजीव गांधी सरकार का था। उस दौर में अब इस दौर में एक फर्क और है। टेलीवीजन मीडिया और सोशल मीडिया के कारण मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम मुल्लों का वर्चस्व तोड़ने में भी बहुत मदद मिल रही है। आज वो खुद संवाद कर सकती हैं और समाज भी सीधे उनसे संवाद कर सकता है। इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि वक्त आ गया है जब मुस्लिम महिलाएं अपने संघर्ष से अपना हक हासिल कर सकेंगी

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