दहेज, तलाक और मेहर मेहरारु

उत्तर भारत के ग्रामीण परिवेश में आज भी पत्नी को मेहरी या मेहरारू कहा जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि पत्नी, अर्धांगिनी या भार्या के लिए यह मेहरी या मेहरारू शब्द कहां से पैदा हो गये? अगर आपको बताया जाए कि यह भी इस्लाम की देन है तो हो सकता है आपको भरोसा न हो लेकिन जो अपनी पत्नी को बड़े प्यार से मेहरी या मेहरारू कहते हैं उन्हें अंदाज भी नहीं होगा कि इसका मतलब ये हुआ कि वो अपनी पत्नी को खरीद कर लाये हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस्लाम में औरत को मेहर देकर खरीदा जाता है। यहां शादी एक संबंध नहीं बल्कि एक संधि है। इस संधि को करते समय एक दस्तावेज तैयार होता है जिसे काजी तैयार करता है और दोनों उस पर अपनी सहमति देते हैं। जैसे किसी कंपनी को कोई ठेका मिले तो ठेकेदार और ठेका देनेवाले के बीच संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर लिया जाए वैसे ही।

इस संधि पत्र में पुरुष को यह एकाधिकार होता है कि वह जब चाहे तब अपनी तरफ से संधि पत्र निरस्त कर सकता है। इस निरस्तीकरण के लिए उसे तीन तलाक का हथियार दिया गया है। वह चाहे तो एक साथ तीन तलाक बोलकर उस हथियार का इस्तेमाल कर ले या फिर तीन महीने में एक एक बार तलाक बोलकर उस हथियार का इस्तेमाल करे। जो तीन महीने में एक एक बार तलाक बोलकर यह हथियार चलाता है कुरान उसकी इजाजत देता है। मुस्लिम समाज इसको तलाक उल अहसान कहता है। मतलब पुरुष जब धीरे धीरे तीन महीने में तलाक देता है तो वह औरत पर अहसान करता है।

जब तलाक की ऐसी स्थिति आती है तो महिला को क्या मिलता है? क्या उसे कोई गुजारा भत्ता दिया जाता है? क्या उसे पति की संपत्ति में हिस्सा दिया जाता है या फिर कोई ऐसी एकमुश्त राशि जिसके सहारे वह आगे अपना जीवन चला सके। बिल्कुल भी ऐसा कोई प्रावधान कुरान में नहीं है। पुरुष को जो कहा गया है वह यह कि मेहर की वह रकम उस औरत के पास रहने दे जिसे देकर उसने उस औरत को खरीदा था। मेहर की यही रकम जो शादी के वक्त निर्धारित की जाती है वह औरत को दे दी जाती है और उसे घर से विदा कर दिया जाता है।

१९८६ में राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम औरतों के लिए जो कानून बनाया था उसमें उन्होंने तीन महीने का गुजारा भत्ता देने का प्रावधान कर दिया था। मसलन, अगर कोई शौहर अपनी बीवी को तलाक देता है तो वह तीन महीने का गुजारा भत्ता भी उसे देगा। अगर वह ऐसा करता है तो भारतीय कानून के मुताबिक उसका तलाक बिल्कुल जायज और कानूनी हो जाता है। शायरा बानो के मामले में उसके पति ने तीन तलाक देने के बाद उसके गुजारे के लिए तीन महीने का गुजारा भत्ता दिया था। लेकिन शायरा ने तीन महीने का गुजारा भत्ता लेने की बजाय अदालत जाने का फैसला कर लिया और तीन तलाक को ही चुनौती दे दी।

यहां इस पूरे मामले में जिस एक बात का जिक्र नहीं आया वह यह कि शायरा का पति शादी के बाद से ही उसके परिवार से दहेज की मांग कर रहा था। जबकि इस्लाम में औरत से दहेज मांगने जैसी कोई प्रथा नहीं है। जहां मेहर देकर बीवी को खरीदा जाता हो, वहां दहेज देकर शौहर को क्यों बेचा जाएगा? कुछ लोग कह सकते हैं कि यह हिन्दुओं की बीमारी है जो इस्लाम में भी आ गयी है। यह बात सही है कि दहेज आज हिन्दुओं में दूल्हा खरीदने का औजार है लेकिन यह दहेज भी इस्लाम ने ही हिन्दुओं को दिया है। दहेज जैसी कोई प्रथा हिन्दुओं में नहीं थी। यहां कन्यादान की प्रथा है जिसमे लड़कियों को पहले बाप की संपत्ति में उनका हिस्सा मिलता है और फिर पति की संपत्ति में आधे की हिस्सेदार होती हैं। इस तरह उन्हें दोहरी संपत्ति मिलती है।

लेकिन पड़ोस के अफगानिस्तान में पठानों में ऐसा नहीं था। उन्होंने मेहर के अलावा लड़की खरीदने का एक और हथियार निकाला। जहेज। यह जहेज अफगानिस्तान के कुछ कबीलों में लड़की खरीदने के लिए इस्तेमाल होता था, आज भी होता है। संभवत: यही जहेज धीरे धीरे उत्तर भारत के समाज में दहेज बनकर फैला और उस वक्त में जब मुस्लिम आक्रमण चरम पर था और पुरुषों का अभाव था, उत्तर भारत के समाज में दहेज देकर अच्छा वर खरीदने की प्रथा ने जन्म लिया। भारत में जो वैदिक विवाह पद्धति चलन में है उसमें पति को धन देने का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। विवाह के जितने प्रकार बताये गये हैं उनमें भी कहीं कोई ऐसा उल्लेख नहीं मिलता कि वधू पक्ष वर पक्ष को धन दौलत देकर दूल्हा खरीदेगा।

फिर सवाल उठता है कि उत्तर भारत के समाज में यह दहेज नामक रोगाणु इतना भयावह कैसे हो गया कि सरकार को सख्त कानून बनाना पड़ा? निश्चित रूप से यह हिन्दुओं में एक ऐसी सामाजिक बीमारी बन गया कि इसका असर ये हुआ है कि मेहर देकर मेहरारू खरीदने वाला इस्लाम भी आज पैसा देकर शौहर खरीद रहा है। इस बीमारी से मुक्ति पाये बिना भारत में महिलाओं की न तो कम होती आबादी को रोका जा सकता है और न ही बीमार होते समाज को स्वस्थ्य बनाया जा सकता है। कानून का इस मामले में अब तक उपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हुआ है लेकिन अच्छी बात ये है कि सामाजिक रूप से उत्तर भारत में इस बारे में जागरुकता बढ़ रही है। लेकिन यहां दहेज या तलाक के बारे में बात करते समय एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि ये दोनों इस्लाम ने हिन्दुओ को सिखाया है। ठीक वैसे ही जैसे बाल विवाह जैसी बीमारी इस्लाम से हिन्दुओं में आ गयी। उम्मीद करनी चाहिए जैसे बाल विवाह के कोढ़ से यह समाज तेजी से मुक्त हुआ है वैसे ही दहेज नामक बीमारी से भी जल्द ही अपने आपको मुक्त कर लेगा।

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