जिहाद की जद में पाकिस्तान

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्र के नाम एक संदेश दिया। इस संदेश का अमेरिका में क्या प्रतिक्रिया हुई यह तो ज्यादा पता नहीं चला लेकिन पाकिस्तान में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई। केवल प्रतिक्रिया ही नहीं हुई बल्कि चेन रियेक्शन हुआ। सबसे पहले मीडिया, फिर बुद्धिजीवी वर्ग, फिर शासन, फिर सेना और सबसे आखिर में जिहादी मुल्ला मौलवी। जाहिर है, प्रतिक्रिया में मतभेद दिखे लेकिन किसी ने डोनाल्ड ट्रम्प के “संदेश” का स्वागत नहीं किया। आखिर डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐसा क्या कहा है जिससे पाकिस्तान में इस तरह का चेन रियेक्शन हो रहा है।

अमेरिका के नाम अपने संदेश में डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ तौर पर पाकिस्तान से दो बात कही। एक अमेरिका जिन आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है उन्हें वह पाकिस्तान पनाह देना बंद करे और दो, अगर वह ऐसा नहीं करता है तो अमेरिका आतंकवादियों को खत्म करने के लिए उचित कार्रवाई करेगा। पाकिस्तान वही देश है जिसे साथ लेकर अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध शुरु किया था। लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तानी फौज की मदद लेने की बजाय इस्लाम का सहारा लिया और मुजाहिद (इस्लामिक लड़ाके) पैदा किया। पाकिस्तान की खुफिया एजंसी आईएसआई, मदरसों और सेना ने मिलकर ये मुजाहिद तैयार किये और “होली वार” के लिए अफगानिस्तान भेज दिया। करीब दो दशक के इस युद्ध में अमेरिका ने इस्लामिक कट्टरपंथ का सहारा लेकर सोवियत संघ को तो अफगानिस्तान से बाहर निकाल दिया लेकिन सोवियत संघ के बाहर निकलते ही उसने कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई का पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरु कर दिया।

९/११ की घटना के बाद अमेरिका को महसूस हुआ कि उन्होंने सोवियत संघ को हराने के लिए जिस भस्मासुर को पैदा किया था वह उन्हें ही खत्म करना चाहता है इसलिए जिस ओसामा बिन लादेन को कभी अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने “पवित्र योद्धा” बताया था वही ओसामा बिन लादेन उनका सबसे बड़ा दुश्मन और दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी हो गया। अमेरिका ने दस साल ओसामा का पीछा किया और आखिरकार २०११ में उसने पाकिस्तान के भीतर घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। यह वह समय था जब अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते में ६३ का आंकड़ा ३६ में तब्दील हो गया। अमेरिकी थिंक टैंक, खुफिया एजंसियों को लगा कि पाकिस्तान लगातार हमसे झूठ बोलता रहा कि ओसामा उनके यहां नहीं है लेकिन आखिरकार वह पाकिस्तान में ही पाया जाता है।

उस वक्त जहां एक तरफ अमेरिका ओसामा बिन लादेन को खोज रहा था वहीं दूसरी तरफ वह एक बार फिर पाकिस्तान को पैसे दे रहा था कि पाकिस्तानी फौज उसी तालिबान को मार दे जिसे पैदा किया था। पाकिस्तान ने यह काम किया भी और बीते करीब एक दशक से खैबर और वजीरिस्तान के इलाके में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहा है लेकिन ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मिलने के बाद से अमेरिका को शक हुआ कि क्या वह कार्रवाई कर भी रहा है या दिखावा कर रहा है? वह अमेरिका से पैसे भी ले रहा है और अफगानिस्तान में जिहाद की शुरुआत करनेवाले हक्कानी नेटवर्क का बचाव भी कर रहा है। इस वक्त तालिबान अफगानिस्तान के जिन इलाकों पर कब्जा करके बैठा है उसे पाकिस्तान से हक्कानी नेटवर्क के जरिए ही पाकिस्तान सपोर्ट कर रहा है।

अफगान वार के जितने धड़े थे वो या तो खत्म हो गये हैं या फिर अफगान सरकार का हिस्सा हो गये हैं। सिर्फ गुलुबुद्दीन हिकमतयार और जलालुद्दीन हक्कानी के धड़े ही एेसे हैं जो अब तक न तो खत्म हुए हैं और न अफगान सरकार के साझीदार हुए हैं। इसमें भी गुलुबुद्दीन हिकमतयार को अफगानिस्तान सरकार पाकिस्तान से निकालकर अफगानिस्तान ले जाने में सफल रही है जबकि हक्कानी नेटवर्क और तालिबान को आज भी पाकिस्तान समर्थन दे रहा है। यही वह बात है जो अफगानिस्तान और अमेरिका दोनों को अखर रही है।

लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति की चेतावनी के बाद भी पाकिस्तान ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है उससे लगता नहीं है कि वह आतंकवादियों को अपने समर्थन में कोई कमी लायेगा। पाकिस्तान में फादर आफ तालिबान कहे जानेवाले जमात ए इस्लामी के चीफ मौलाना शमी उल हक और सेना के चीफ कमर बाजवा ने एक ही तरह की प्रतिक्रिया दी है। दोनों ने अमेरिका को पाकिस्तान के मामलात में दखल न देने की दलील दी है। सेना प्रमुख ने तो यहां तक कहा कि “हमें अमेरिका से मदद नहीं चाहिए लेकिन वह यह माने कि हमने आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की है।” जबकि शमी उल हक ने किसी भी सूरत में जिहाद को जारी रखने की अपील करते हुए कहा है कि “हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।” सेना और मौलाना की तर्ज पाकिस्तान की सरकार ने ट्रम्प के बयान को एकतरफा बताया और ताजा हालात से निपटने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अपने विदेश मंत्री के साथ तत्काल सऊदी अरब के दौरे पर चले गये।

जाहिर है, पाकिस्तान ने जिन आंतकावादियों को पाला पोसा उन्हें खत्म नहीं करेगा। अफगानिस्तान में उसने तालिबान पैदा किया और आज भी उसे मदद कर रहा है। तीसरी बात ये कि उसके कश्मीर में सक्रिय गुड तालिबान को वह कहीं से कोई लगाम नहीम लगायेगा। अपने बनने के साथ ही उसने इस्लामिक आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का अहम हिस्सा बना लिया था और आज भी वह उससे पीछे हटने को तैयार नहीं। ऐसे में ट्रम्प की चेतावनी और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया सुनकर साफ दिखाई देता है कि जिस जिहाद को उसने अपनी फॉरेन पालिसी बनाई थी, उसकी जद में अब वह खुद आ गया है। अगर अमेरिका की बात मानकर गुड तालिबान के खिलाफ कार्रवाई करता है तो गुड तालिबान उसके खिलाफ खड़ा हो जाएगा और अगर वह ऐसा नहीं करता है तो अमेरिका उस पर “चढ़ाई” कर देगा।

अपनी आतंकी नीतियों के कारण पाकिस्तान आज ऐसी जगह आकर खड़ा हो गया है जहां उसके एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाईं। तिस पर शर्त ये है कि उसे रुकना नहीं है, चलते रहना है। गिरना उसकी नियति बन चुका है, अब यह उसे तय करना है कि वह कुएं में गिरना पसंद करेगा या खाईं में।

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