जिहाद की जद में पाकिस्तान-२

अमेरिका के लिए अभी तक जो भाषा पाकिस्तान के जिहादी और मदरसों के तालिबान बोल रहे थे अब अमेरिका के लिए वही भाषा पाकिस्तान सरकार और संसद बोल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान को “आतंकवादियों का संरक्षक” कहे जाने पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री से लेकर पाकिस्तानी संसद के स्पीकर तक सब अमेरिका को “ईंट से ईंट” बजाने की धमकी दे रहे हैं। टीवी स्टूडियो में बैठे कमेन्टेटर हों कि उर्दू अखबारों में कॉलम लिखनेवाले ‘विद्वान’ इस वक्त सब पाकिस्तानी होने से आगे बढ़कर सच्चे तालिबानी हो गये हैं और अपनी अपनी तरह से अमेरिका को धमका रहे हैं कि अगर उसने “पाकिस्तान में घुसने” की हिमाकत की तो उसका वही हाल होगा जो वियतनाम में हुआ था।

पाकिस्तानी संसद के सभापति ने अमेरिकी सरकार को सख्त जवाब देने की संसद की भावना से अवगत कराते हुए कहा कि “विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ अमेरिका के दौरे को स्थगित कर दें।” ख्वाजा आसिफ ने एक टीवी चैनल से बात करते हुए पुष्टि किया कि उन्होंने अपना अमेरिका का प्रस्तावित दौरा स्थगित कर दिया है। अब वो अमेरिका की बजाय चीन, रूस और तुर्की जा रहे हैं जहां वो ट्रंप के आरोप के बाद अपना पक्ष रखेंगे कि पाकिस्तान किसी भी तरह से आतंकवाद को संरक्षण नहीं देता है। ख्वाजा आसिफ ने साफ कहा कि “हम इस धमकी को हल्के में नहीं वे सकते।” ख्वाजा आसिफ ने यह भी याद दिलाया कि “अमेरिका की हमें लेकर दो आशंकाएं हैं, पहला परमाणु बम को लेकर और दूसरा हक्कानी नेटवर्क को लेकर। और ये दोनों मुद्दे वो पहले भी हमारे साथ उठाते रहे हैं।” ख्वाजा आसिफ मानते हैं कि अमेरिका अपनी गलतियों का कचरा अब उनके सिर डालकर अपने आप को सही साबित करना चाह रहा है।

विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ का आखिरी तर्क सिर्फ उनका ही तर्क नहीं है बल्कि यह हर पढ़े लिखे सच्चे पाकिस्तानी का तर्क है कि अफगानिस्तान में अमेरिका तालिबान से लड़ाई नहीं जीत पाया तो अब अपनी असफलता पाकिस्तान के सिर डालकर खुद को बचाना चाहता है। तो क्या सचमुच ऐसा ही है? बिल्कुल नहीं। सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। और सच्चाई ये है कि एक तरफ पाकिस्तान अमेरिका से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर पैसे लेता रहा और दूसरी तरफ उसी पैसे से अफगान तालिबान की मदद करता रहा। अफगानिस्तान में अमेरिका के कमांडर जॉन निकल्सन ने अपने सुप्रीम कमांडर ट्रम्प की बात का प्रमाण देते हुए कहा कि क्वेटा और पेशावर में पाकिस्तान अफगान तालिबान को पाल रहा है उनके पास इस बात के सबूत हैं।” साफ है अमेरिकी राष्ट्रपति ने अगर पाकिस्तान को आतंकवाद को पालने पोसने का आरोप लगाया है तो यह बिल्कुल तथ्यहीन बात नहीं है। पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि जिस अमेरिकी पैसे से उन्होंने मुजाहिद पैदा किये थे, कम से कम अमेरिका को उन मुजाहिदीनों की जानकारी तो होगी ही कि वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं?

पाकिस्तान ने सबसे बड़ी गलती यह कि उसने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ “होली वार” में मुजाहीदीनों के जरिए हिस्सा लिया। उस वक्त जनरल जिया दुनिया से झूठ बोलते रहे कि अफगानिस्तान में लड़नेवाले किसी मुजाहीदीन का पाकिस्तान से कोई रिश्ता है। वे उन ‘पवित्र’ लड़ाकों की भलाई के लिए सिर्फ अल्लाह से दुआ करने के अलावा किसी और मदद से इन्कार करते थे। लेकिन जैसे ही अफगानिस्तान से सोवियत संघ पीछे हटा अमेरिका उसी तालिबान के खिलाफ खड़ा हो गया जिसे उसने डॉलर देकर पैदा किया था। अब तक जिया मारे जा चुके थे लेकिन जिया के उत्तराधिकारी जिया की अफगान नीति को जारी रखे हुए थे। अब जब अमेरिका ने पाकिस्तान को उन्हीं तालिबान को खत्म करने की बात शुरु की तो पाकिस्तान ने एक बार फिर उसी अमेरिका से पैसे लेकर तालिबान को मारने का भरोसा दिया। लेकिन यहां अमेरिका को शक हुआ और वह शक पाकिस्तान में पहले ओसामा और फिर बाद में तालिबान कमांडरों के मौजूद होने से और पुख्ता हो गया कि पाकिस्तान तालिबान को मार नहीं रहा बल्कि उन्हें पाल रहा है।

इसके बाद से अमेरिका की पाकिस्तान नीति में सख्ती आनी शुरु हो गयी। पहले अमेरिकी थिंक टैंक और विदेश नीति से जुड़े लोगों ने पाकिस्तान पर शक जाहिर करना शुरु किया और अब राष्ट्रपति ने भी उसे एक ऐसा सिरदर्द मान लिया है जो लाइलाज बीमारी है। तो क्या अमेरिका इस लाइलाज बीमारी का इलाज करने जा रहा है? अभी पक्के तौर पर कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन संकेत यही हैं कि अमेरिका से अदावत की हिम्मत को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान चीन के और करीब चला जाएगा। जो वैश्विक परिदृश्य उभर रहा है उसमें अमेरिका को इकलौती महाशक्ति मानकर रूस अपना जो हथियार डाल चुका है चीन उसे उठाकर आगे बढ़ने की चाहत रखता है। इस चाहत का रास्ता पाकिस्तान होकर गुजरता है। पाकिस्तान में बन रहा चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कारिडोर के जरिए ही चीन सीधे यूरोप, अरब और अफ्रीका के बाजारों तक अपनी ‘सस्ती’ पहुंच सुनिश्चित करनेवाला है। इसमें पाकिस्तान का कोई फायदा हो न हो, चीन सीधे तौर पर अमेरिका को चुनौती दे देगा। इसके साथ ही ग्वादर पर बंदरगाह बनाने से चीन को सामरिक मजबूती स्थापित करने में भी मदद मिलेगी।

अमेरिका यह ‘संकट’ देख समझ रहा है इसलिए वह चीन को साउथ चाइना सी के साथ साथ पाकिस्तान में भी घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिका का पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रवैया साफ संकेत करता है कि जैसे उसने सोवियत संघ को अफगानिस्तान में खत्म किया संभवत: वैसे ही चीन को पाकिस्तान में खत्म करने की नीति बना चुका है। इसकी पहली कड़ी ये होगी कि पाकिस्तान को आतंकवाद का संरक्षण देनेवाला देश घोषित किया जाए और अगली कड़ी में नाटो सैनिकों को वहां कार्रवाई करने का रास्ता साफ किया जाए। जाहिर है पाकिस्तान भागकर चीन और रूस को दखल देने की अपील करेगा और वो दोनों दखल देंगे भी। इसलिए लड़ाई तो होगी अमेरिका और चीन के बीच लेकिन जंग का मैदान बनेगा पाकिस्तान। इस लड़ाई में अमेरिका स्थानीय असंतोष को भी भड़कायेगा जो कि पाकिस्तान में पहले ही सिंध, बलोच और मोहाजिर राष्ट्रीयता के नाम पर मौजूद है। इसके संकेत मिलने भी लगे हैं कि अमेरिका सीधे सिन्धी, बलोची और मोहाजिरों तक अपनी पहुंच बना रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के पाले पोसे तालिबान भी पाकिस्तान बचाने के लिए मैदान में उतरेंगे। इसका नतीजा यह होगा कि पाकिस्तान में कई स्तरों पर टकराव शुरु होगा। कौन किससे लड़ेगा पता नहीं, लेकिन सब लड़ रहे होंगे।

पाकिस्तान इस खतरे को समझ तो रहा है लेकिन जैसे अब तक इस्लाम के नाम पर उसने असंख्य मूर्खताएं की हैं इस बार भी कर रहा है। अपने पड़ोसियों के घरों में टूट फूट की कूटनीति करनेवाला खुद टूटफूट का शिकार होने की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसे कोई रोक भी नहीं सकता। संभवत: यही उसकी नियति है।

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