काला धन कहां गया?

दिल्ली मेट्रो की हैरिटेज लाइन का ट्रायल रन अगस्त २०१६ से शुरु हो गया था। मेट्रो की समयसीमा के मुताबिक पांच किलोमीटर लंबी इस लाइन को दिसंबर २०१६ में जनता के लिए शुरु होना था लेकिन तभी नवंबर में देश में नोटबंदी की घोषणा हो गयी। दिल्ली मेट्रो के एमडी ने घोषणा किया कि मेट्रो का काम अब समय पर पूरा नहीं हो पायेगा क्योंकि नोटबंदी की मार से कैशलेस मेट्रो भी नहीं बच सका है। उसके पास मजदूरों को देने के लिए नकद राशि नहीं है इसलिए मेट्रो तय समय से छह महीने देरी से अपनी हैरिटेज लाइन को शुरु कर पाया।

लेकिन सब कारोबारी दिल्ली मेट्रो जैसे भाग्यशाली नहीं थे। कुछ उत्पादक उस समय ऐसे डूबे जो शायद फिर कभी उबर नहीं पायेंगे। आठ नवंबर की रात आठ बजे पीएम मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी एक आपातकाल जैसी घोषणा थी। उसे मोदी ने उसी अंदाज में घोषित भी किया। “आज रात १२ बजे के बाद पांच सौ और हजार रूपये के नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे।” टीवी पर आये राष्ट्र के नाम इस संदेश ने राष्ट्र को जड़वत कर दिया। नोटबंदी की घोषणा करके अगले दिन पीएम मोदी जापान चले गये और चुटीले अंदाज में अपनी सफलता से जापान के अनिवासी भारतीयों को अवगत भी कराया। लेकिन जब मोदी लौटकर आये तब उन्हें अंदाज लगा कि यहां तो हाहाकार मचा हुआ है।

सरकार बैंकों के जरिए नोट बदली कर रही थी और बैंकों के सामने लोग लंबी लंबी कतार लगाकर खड़े थे। घर की गृहिणी से लेकर देश के गृहमंत्रालय तक सब कतार में थे। मोदी यह तो समझ गये कि उनका दांव उल्टा पड़ गया है और नोटबंदी से निपटने के उनके इंतजाम नाकाफी साबित हुए हैं। इसलिए उन्होंने जनता को एक बार फिर संबोधित करने का फैसला किया। इस बार सार्वजनिक मंचों से उन्होंने जो कुछ बोला वह सिर्फ जनता को भ्रमित करने के लिए था क्योंकि उन्हें संभवत: यह महसूस हो गया था कि हालात बिगड़े तो लूटपाट शुरु हो जाएगी जो कि हो सकता है गृहयुद्ध की शक्ल भी ले ले। इसलिए एक साथ उन्होंने आम जन को भरोसे में लिया और दुश्मनों की साजिश से सावधान रहने की भी सलाह दिया। मोदी का फार्मूला कामयाब रहा और तीन चार महीने की उथल पुथल के बाद कैश की पहुंच सामान्य हो गयी।

काला धन और सफेद धन जैसी कोई चीज नहीं होती। जो होता है वो है टैक्स मनी और नॉन टैक्स मनी। सरकार जिसे काला धन कहती है असल में वह व्यापारियों वह गैर टैक्स पूंजी होती है जिस पर सरकार टैक्स वसूलना चाहती है और व्यापारी किसी भी तरह से उस पूंजी को टैक्स से बचाना चाहते हैं।

लेकिन इसी समय उन्होंने एक काम और किया। उन्होंने नोटबंदी को काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताना शुरु किया। उनका कहना था कि इससे जो काला धन जहां है वहीं समाप्त हो जाएगा। लेकिन मोदी के इस भरोसे को अब रिजर्व बैंक आफ इंडिया झूठ साबित कर रहा है। अपनी सालाना रिपोर्ट में ३० अगस्त को रिजर्व बैंक ने कहा है कि नोटबंदी के बाद सरकारी खजाने में पांच सौ और एक हजार रूपये के ९८.९६ फीसदी नोट वापस लौट आये हैं। आंकड़ों के मुताबिक जिस वक्त नोटबंदी की घोषणा हुई उस वक्त पांच सौ और एक हजार रूपये के नोट के रूप में १५.४४ लाख करोड़ रूपया चलन में था। नोटबंदी के बाद निर्धारित समय सीमा में रिजर्व बैंक के पास १५.२८ लाख करोड़ रूपया वापस लौट आया है। मतलब १६,००० करोड़ रूपया ही पांच सौ और एक हजार रूपये के नोट की शक्ल में ऐसा था जो कालाधन साबित हुआ और बैंक के पास वापस नहीं लौटा। तो क्या इसी १६,००० करोड़ रूपये को ‘बर्बाद’ करने के लिए मोदी ने देश के नागरिकों को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया था?

मोदी का दावा था कि नोटबंदी से तीन लाख करोड़ रूपये का काला धन बर्बाद हो गया है। अब रिजर्व बैंक के आंकड़े सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मोदी ने तीन लाख करोड़ रुपये वाला झूठ बोला देश से? अगर हां, तो उन्होंने क्या अपने गलत फैसले को सही साबित करने के लिए यह झूठ बोला? कम से कम रिजर्व बैंक के आंकड़े सामने आने के बाद तो यही लगता है कि उन्होंने बिगड़ते हालात को संभालने के लिए बहकाने के लिए जनता से जो बहुत से जुमले कहे थे, उनमें से यह भी एक जुमला ही था। मोदी की नोटबंदी की योजना काले धन के खिलाफ कोई कार्रवाई रही भी हो तो इसे बैंकों ने ही बेकार साबित कर दिया। जनता को दस पांच हजार पकड़ाकर बड़े स्तर पर उन्होंने काले धन को सफेद करने का काम किया। इसके अलावा कैश रखनेवाले कारोबारियों ने दूसरे कई रास्तें से अपने नोटों की अदला बदली कर ली। ले देकर एक नौकरशाही की कैश मनी अटकी थी क्योंकि वो बैंक में जमा कराने जाते तो उनसे पूछा जाता कि यह पैसा वो कहां से कमाकर लाये हैं। नोटबंदी पर मोदी सरकार की आखिरी कैबिनेट बैठक ने उनका रास्ता भी साफ कर दिया और नौकरशाहों के लिए आदेश निकाला गया कि अगर वो कैश की अदला बदली करते हैं तो उनसे यह नहीं पूछा जाएगा कि यह पैसा उन्होंने कैसे कमाया।

अगर देश में काले धन के खिलाफ सचमुच यह सर्जिकल स्ट्राइक होती तो कम से कम नौकरशाहौं को इस तरह की छूट नहीं दी जाती। देश में कैश के सबसे बड़े कारोबारियों में भ्रष्ट नौकरशाह ही आते हैं। इसलिए इतना तो साफ हो गया था कि यह काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक नहीं बल्कि सफेद धन के खिलाफ डिजिटल स्ट्राइक था। उसका पहला चरण नोटबंदी था और दूसरा चरण जीएसटी। सरकार काले धन के कारोबारियों से ज्यादा सफेद धन के व्यापारियों के पीछे पड़ी थी। आज सरकार जो आंकड़े बताकर वाहवाही लूट रही है वह सफेद धन के खिलाफ डिजिटल स्ट्राइक के ही नतीजे हैं। रही नोटबंदी की सफलता की कहानी तो इस साल अप्रैल जून की तिमाही में उत्पादन की बढ़त गिरकर ५.७ प्रतिशत रह गयी है। मोदी कोई दावा करें लेकिन सच्चाई यही है कि नोटबंदी का निर्णय जनता के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक थी जिसे बहाने बना बनाकर सही साबित करने की कोशिश की जा रही है। नोटबंदी और जीएसटी दोनों का फायदा बड़े पूंजीपतियों और सरकार हो हुआ है जो मोदी की कुल आर्थिक नीति का सार है। उनकी कोशिश ऐसी आर्थिक संरचना की है जिससे लोग कमजोर हो जाएं और देश मजबूत हो जाए। ऐसा करने के लिए जरूरी है कि सौ करोड़पति पैदा करने से अच्छा है कि एक अरबपति पैदा किया जाए जो खुद भी कमाये और सरकार को टैक्स भी दे। मोदी वही मजबूत देश बनाने में लगे हैं।

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