पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेलवे का कायाकल्प

देश में रेलवे आने के दस साल बाद ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेलवे पहुंच गयी थी। 1862 में ब्रिटिश सरकार ने कलकत्ता से बनारस तक रेलवे लाइन बिछाई थी। इसके बाद एक अलग अवध रुहेलखण्ड रेलवे कंपनी का निर्माण किया गया और उस कंपनी ने 1882 में बनारस से लखनऊ के बीच रेलवे लाइन बिछाकर ट्रनों का परिचालन शुरु कर दिया था। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेलवे के पहुंचने के डेढ़ सौ साल बाद भी यहां रेलवे के ढांचागत विकास के नाम पर न के बराबर काम हुआ है। जैसे हर क्षेत्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश की उपेक्षा की गयी वैसे ही रेलवे के क्षेत्र में भी इसकी घोर उपेक्षा हुई है। देवगौड़ा, गुजराल और मोरारजी देसाई को छोड़ दें तो देश का हर प्रधानमंत्री या तो इसी क्षेत्र से निर्वाचित हुआ है या फिर यहां से चुनाव लड़कर संसद पहुंचा है। दो दो रेल मंत्री इसी इलाके से हुए लेकिन रेलवे के विकास के नाम पर कोई कोई बुनियादी काम नहीं हुआ।

जबकि हकीकत ये है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश इतने प्रधानमंत्री देने के बाद भी पलायन प्रदेश बना हुआ है। संभवत: देश में यह वह इलाका है जहां से सबसे ज्यादा लोग रोजी रोटी की तलाश में घर छोड़कर बाहर जाते हैं। इसके बावजूद रेलवे के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कुछ खास नहीं किया गया। जैसे हर क्षेत्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश की उपेक्षा हुई वैसे ही रेलवे के क्षेत्र में भी हुई। इस पूर्वी उत्तर प्रदेश से दो दो रेलमंत्री हुए। पहले लाल बहादुर शास्त्री और उसके बाद कमलापति त्रिपाठी। लेकिन रेलवे के हालात में बहुत परिवर्तन नहीं आया। कुल बुनियादी ढांचे का जो विकास दिखता है वह बनारस रेलवे स्टेशन के नये भवन का निर्माण है जिसे कमलापति त्रिपाठी ने अपने कार्यकाल के दौरान करवाया था। लेकिन बहुत कुछ ऐसा था जिसे किया जाना था।

दिल्ली हावड़ा लाइन पर इस इलाके के आने के कारण यह तो हुआ कि 1968 में ही इलाहाबाद से मुगलसराय के बीच रेलवे लाइन का दोहरीकरण और विद्युतीकरण कर दिया गया लेकिन उसके बाद सब ठप। इस इलाके की रेल लाइनों का न तो दोहरीकरण हुआ, न विद्युतीकरण और न ही स्टेशनों पर बुनियादी जरूरतों का ढांचागत विकास कि लोग रेलवे का इस्तेमाल अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए भी कर पाते। वह रेलवे लाइन जो बनारस और लखनऊ के बीच 1882 में ही बन गयी थी उसका ढांचागत विकास आज तक नहीं हो पाया है जबकि इसी रेलवे लाइन पर अमेठी भी पड़ता है और रायबरेली भी जहां से नेहरू गांधी परिवार के शासक चुनकर आते रहे और देश को चलाते रहे।

लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के हालात बदले ही नहीं है, पलट गये हैं। इसका सारा श्रेय जाता है रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा को जो कि इसी इलाके में गाजीपुर से चुनकर आये हैं। नरेन्द्र मोदी बनारस से जीते और मनोज सिन्हा गाजीपुर से। मनोज सिन्हा रेल राज्यमंत्री बने और मंत्रालय संभालते ही उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेलवे की गिरी हालत को संभालने का काम शुरु कर दिया। बाकी देश में रेलवे की दशा चाहे जैसी हो लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूरी दुर्दशा है इसलिए इस इलाके पर दशकों पहले विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत थी। देर से ही सही, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मनोज सिन्हा को रेल राज्य मंत्री बनाये जाने से इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई।

वो खुद गाजीपुर से आते हैं इसलिए गाजीपुर पर उनका विशेष ध्यान स्वाभाविक है लेकिन आज 5,500 करोड़ की परियोजनाएं पूर्वी उत्तर प्रदेश में चल रही हैं जिन्हें समयबद्ध तरीकों से पूरा भी किया जा रहा है। आनेवाले वित्तीय वर्षों में अभी और पूंजी निवेश की जरूरत पड़ेगी ताकि इस इलाके में दशकों से उपेक्षित पड़े रेलवे ढांचे को कम से कम देश के औसत पर लाया जा सके। जिन रेलवे लाइनों का दोहरीकरण बहुत पहले हो जाना चाहिए था उन्हें अब मोदी सरकार पूरा करवा रही है। इसमें बनारस लखनऊ रेलवे लाइन और बनारस से भदोही जंघई होते हुए इलाहाबाद रेलवे लाइन प्रमुख है। इसके अलावा छपरा से बलिया गाजीपुर बनारस ज्ञानपुर होते हुए इलाहाबाद तक भी रेलवे लाइन के दोहरीकरण का काम शुरु किया जा चुका है। इसी तरह बनारस से जौनपुर सुल्तानपुर के रास्ते लखनऊ रेलवे लाइन का भी दोहरीकरण किया जा रहा है। जौनपुर फाफामऊ ऊंचाहार लाइन के दोहरीकरण की मंजूरी भी मिल गयी है। मतलब पूर्वी उत्तर प्रदेश की हर प्रमुख लाइन का दोहरीकरण का काम तेजी से चल रहा है और उम्मीद करनी चाहिए 2019 तक इन रेल लाइनों के दोहरी करण का काम पूरा हो जाएगा। यह इसलिए भी बहुत जरूरी था क्योंकि इस इलाके की ज्यादातर लाइनों पर अस्सी प्रतिशत से ज्यादा ट्रैफिक का भार है और इकहरी लाइन होने से न केवल यात्री ट्रेनों में विलंब होता है बल्कि मालगाड़ी भी निर्धारित समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाती है। अब दोहरीकरण होने के बाद यात्री गाड़ी और मालगाड़ी दोनों को फायदा होगा।

इसके अलावा एक और जरूरी कदम जो उठाया गया है वह है रेलवे का विद्युतीकरण। आजादी के सत्तर साल बाद भी इस इलाके में सिर्फ कानपुर इलाहाबाद मुगलसराय के बीच रेलवे का विद्युतीकरण किया गया था। वह भी इसलिए क्योंकि इस पर सवारी और मालगाड़ियों का सबसे ज्यादा बोझ है। लेकिन अब न सिर्फ ऊंचाहार इलाहाबाद जंघई और भदोही के रास्ते बनारस पहुंचनेवाले रेलवे का विद्युतीकरण हो गया है बल्कि इलाहाबाद से ज्ञानपुर बनारस गाजीपुर और बलिया होते हुए छपरा पहुचनेवाली रेलवे लाइन के दोहरीकरण के साथ साथ विद्युतीकरण का काम चल रहा है। इससे निश्चित रूप से इलाहाबाद मुगलसराय रूट की भीड़ को कम करने में मदद मिलेगी। इसी तरह लखनऊ रायबरेली प्रतापगढ़ जंघई रूट के भी विद्युतीकरण का काम शुरु कर दिया गया है। आगामी कुछ सालों में लखनऊ बनारस न सिर्फ दोहरी लाइन से जुड़ जाएंगे बल्कि डीजल की बजाय इलेक्ट्रिक इंजन से ट्रेने चल सकेंगी। बनारस से जौनपुर सुल्तानपुर होते हुए लखनऊ पहुंचनेवाली लाइन के विद्युतीकरण का काम पहले ही पूरा किया जा चुका है।

रेलवे लाइन सुधारने के साथ साथ मनोज सिन्हा के कार्यकाल में नयी ट्रेनों का परिचालन और स्टेशनों का बुनियादी ढांचा सुधारने का काम भी किया जा रहा है। दिल्ली गोरखपुर हमसफर एक्सप्रेस के साथ दिल्ली गाजीपुर सुहैलदेव एक्सप्रेस, दिल्ली बनारस महामना एक्सप्रेस, गाजीपुर बांद्रा एक्सप्रेस, गाजीपुर कलकत्ता एक्सप्रेस जैसी नयी ट्रेनें चलायी गयी हैं। ट्रेनों में आईसीएफ रेक की बजाय एलएचबी कोच लगाये जा रहे हैं ताकि दुर्घटना की स्थिति में जानमाल का नुकसान कम से कम हो। रेल कोच फैक्ट्री रायबरेली में डिब्बों के उत्पादन को नियमित कर दिया गया है जिससे अब यह फैक्ट्री साल में एक हजार एलएचबी कोच का निर्माण पूरा कर सकेगी।

पूर्व की कांग्रेस सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की हमेशा घोर उपेक्षा की थी। रेलवे के क्षेत्र में भी यही हाल था। २०१४ तक उत्तर प्रदेश का रेल बजट में सालाना हिस्सा हजार करोड़ के आसपास रहता था लेकिन साल २०१५-१६ में बजट में पांच गुना बढ़ोत्तरी की गयी और यह बढ़त साल दर साल जारी है। कहना न होगा कि मोदी सरकार में मनोज सिन्हा के प्रयास से पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेलवे के भीतर बुनियादी बदलाव जमीन पर दिख रहा है। उम्मीद करनी चाहिए कि रेलवे का यह प्रयास अगले एक दशक तक इसी तरह जारी रहेगा ताकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग विकास की जिस रेलगाड़ी में बैठने से दशकों पीछे छूट गये कम से कम अब उसमें सवार हो सकें।

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