लखनऊ में मेट्रो की राजनीति

IMG_20170905_151738लखनऊ मेट्रो में मायावती का जिक्र तो कहीं नहीं आता लेकिन लखनऊ मेट्रो के चप्पे चप्पे पर अखिलेश यादव के निशान नजर आयेंगे। मेट्रो के रंग रोगन से लेकर टिकट खिड़की और दरवाजे तक। मेट्रो को लाल हरा वाला “समाजवादी रंग” अखिलेश यादव ने ही दिया था। यह अखिलेश यादव ही थे जिन्होंने एक बीमारू राज्य में मेट्रो के सपने को साकार करने में जीतोड़ मेहनत की और विश्व रिकार्ड कायम करते हुए दो साल में ट्रायल रन भी शुरु करवा दिया था। बस उनका दुर्भाग्य ये हुआ कि उनकी पार्टी चुनाव हार गयी और जब लखनऊ मेट्रो के पहले चरण के उद्घाटन का मौका आया तो उनका नाम और उपस्थिति दोनों नदारद थी।

लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में मंच से जो भाषण हुए उसमें सिर्फ बीजेपी से जुड़े नेताओं के नाम ही लिये गये। मुख्यमंत्री योगी ने पीएम मोदी से लेकर सीईओ तक के योगदान का उल्लेख किया गया लेकिन किसी ने न तो मायावती का नाम लिया और न ही अखिलेश यादव का। जबकि हकीकत ये है कि लखनऊ मेट्रो का सपना मायावती ने देखा था और अपने कार्यकाल में उसे अखिलेश यादव ने पूरा किया। लेकिन जैसा कि राजनीतिक दलों में अक्सर होता है कि श्रेय लेने के चक्कर में वो दूसरे दलों को दरकिनार कर देते हैं, यहां भी वैसे ही हुआ।

जैसे आज दिल्ली में शायद ही कोई इस बात को जानता हो कि दिल्ली में मेट्रो रेल बनाने की शुरुआत मदन लाल खुराना ने किया था जिसे कांग्रेस की शीला दीक्षित ने आगे बढ़ाया। इसी तरह लखनऊ में मेट्रो की पहल मायावती ने किया था २००९ में। दिल्ली मेट्रो ने सितंबर २००८ में राज्य सरकार को लखनऊ में मेट्रो बनाने का प्रस्ताव किया था। २००९ में मायावती ने प्रदेश के अलग अलग हिस्सों के लिए ४००० करोड़ का पैकेज घोषित किया। इसी पैकेज में लखनऊ के लिए लखनऊ मेट्रो की सौगात भी थी। उसी समय लखनऊ डेवलपमेन्ट अथारिटी और दिल्ली मेट्रो के बीच एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुआ कि आठ महीने के भीतर लखनऊ के लिए दिल्ली मेट्रो विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करेगा। ढाई साल के भीतर लखनऊ मेट्रो ने डीपीआर तैयार कर दिया और मेट्रो रूट प्लान के साथ उसने अपनी विस्तृत रपट जुलाई २०११ में राज्य सरकार को सौंप दिया।

इसके बाद राज्य में चुनाव आ गये और लखनऊ मेट्रो का काम राज्य सरकार की मंजूरी के इंतजार की लाइन में लग गया। मार्च २०१२ में राज्य में मायावती की बुरी तरह हार हुई और अखिलेश यादव की सरकार बन गयी। सरकार बनने के करीब साल भर बाद अखिलेश यादव ने लखनऊ मेट्रो की फाइल जून २०१३ में पास करते हुए लखनऊ में मेट्रो बनाने की शुरुआत कर दी। दिसंबर २०१३ में केन्द्र सरकार ने भी प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी और मार्च २०१४ में विधिवत लखनऊ मेट्रो का काम शुरु हो गया। लखनऊ मेट्रो के लिए अखिलेश यादव ने मेट्रो मैन के नाम से मशहूर ई श्रीधरन को सलाहकार नियुक्त किया और श्रीधरन की अगुवाई में लखनऊ मेट्रो ने निर्धारित समय सीमा तीन साल से कम सिर्फ दो साल में ही निर्माण का एक हिस्सा पूरा करके ट्रायल रन शुरु कर दिया। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दिसंबर २०१६ में लखनऊ मेट्रो के एक छोटे से हिस्से पर ट्रायल रन भी शुरु हो गया।

अगर आप लखनऊ मेट्रो की इस टाइमलाइन को देखेंगे तो समझ जाएंगे कि यह शुद्ध रूप से दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन की पहल थी जिसे मायावती ने मंजूरी दिया था। बाद में अखिलेश यादव ने इस पूरी परियोजना को यह कहकर हाइजैक करने की कोशिश किया कि जैसे यह सिर्फ उनकी राज्य सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है। जबकि केन्द्र सरकार इसके लिए बराबर धन मुहैया करा रहा था और यूरोपीयन इन्वेस्टमेन्ट बैंक से इसके लिए लोन लिया गया था। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश ने लखनऊ मेट्रो को समाजवादी मेट्रो कहकर प्रचारित किया। जबकि यह परियोजना मायावती ने मंजूर किया और केन्द्र सरकार की पहल से राज्य सरकार ने आगे बढ़ाया था। इस परियोजना में राज्य और केन्द्र सरकार का बराबर का योगदान है। फिर भी आज जब लखनऊ मेट्रो के पहले चरण का उद्घाटन हुआ तो उसमें मायावती और अखिलेश का नामों का उल्लेख न आना अखरता है। कम से कम राज्य में आधारभूत ढांचे के विकास में राजनीतिक दलों को ऐसी राजनीति से बचना चाहिए। फिर वो चाहें अखिलेश यादव हों कि योगी आदित्यनाथ।

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