धर्म का नहीं, झगड़ा नस्ल का है

IMG_20170906_101929रोहिंग्या लोगों पर एक बार फिर “अत्याचार” की खबरें दुनियाभर की मीडिया में सुर्खियों में हैं। भारत और पाकिस्तान के कुछ मुसलमान उम्मा के नाम पर रोहिंग्या मुसलमानों के लिए छाती पीट रहे हैं। वो इसे मानवता का ‘संकट’ बता रहे हैं। सवाल ये उठता है कि अगर यह मानवता से जुड़ा मामला है तो पूरे मानव समाज को रोना चाहिए लेकिन मुसलमान इसे मुसलमान पर अत्याचार बताकर अकेले अकेले क्यों सियापा कर रहा है? वास्तव में रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या क्या है? क्या बौद्ध धर्म से जुड़े लोग सचमुच आतंकवादी हो गये हैं और रोहिंग्या मुसलमानों का कत्लेआम कर रहे हैं?

मामला पूरी तरह से एकपक्षीय नहीं है। द्विपक्षीय है। बर्मा के जिस राखिन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों और राखिन बौद्धों के बीच दशकों से जंग चल रही है उसमें कभी मुसलमानों का दांव लगता है तो कभी बौद्धों का। रोहिंग्या बंगाली मूल के लोग हैं जिन्हें ब्रिटिश सरकार के समय वहां ले जाकर बसाया गया था जब बर्मा ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था। इसमें मुसलमान और हिन्दू दोनों थे। एक ब्रिटिश लेखक फ्रांसिस हैमिल्टन ने १७९९ में रोहिंग्या लोगों को एक हिन्दुस्तानी के तौर पर चिन्हित किया और बताया कि बर्मा में उन्होंने तीन ऐसी भाषाएं खोजी हैं जो हिन्दुओं द्वारा बोली जाती है।

बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों की वही समस्या है जो बांग्लादेश में बिहारी मुसलमानों के साथ और पाकिस्तान में मोहाजिर मुसलमानों के साथ है। मुसलमान होने के बावजूद न तो बांग्लादेश बिहारी मुसलमानों को स्वीकार कर पाया है और न पाकिस्तान हिन्दुस्तानी मोहाजिरों को। फिर भला यही देश बर्मा से यह उम्मीद क्यों करते हैं कि वो बंगाली रोहिंग्या मुसलमानों को स्वीकार कर लेगा?

बर्मा के जिस रेखिने प्रांत में ये लोग बसे या बसाये गये वहां आज इनकी आबादी चालीस प्रतिशत से अधिक है। वो लंबे समय से राखिन पर अपना दावा कर रहे हैं और बर्मा से अलग होने का अलगाववादी आंदोलन भी समय समय पर चलाते रहते हैं। जब ब्रिटिश बर्मा को अलग कर रहे थे तब भी उन्होंने कोशिश किया था कि उन्हें बंगाल के साथ जोड़ दिया जाए लेकिन ब्रिटिशर्स ने बर्मा का वैसा बंटवारा करना ठीक नहीं समझा जैसा बाद में उन्होंने भारत का किया।

बर्मा के लोग मानते हैं कि रोहिंग्या बाहरी हैं और उन्हें देश छोड़कर चले जाना चाहिए। दूसरी तरफ रोहिंग्या लोग राखिन पर अपना दावा करते हैं और उसे अलग देश बनाने का आंदोलन चलाते हैं। जो रोहिंग्या बर्मा से बाहर ब्रिटेन या सऊदी अरब चले गये हैं वो अलग अलग संगठन बनाकर राखिन को अलग देश बनाने के लिए सक्रिय हैं। जाहिर है, यह बात राखिन जाति से जुड़े लोगों को अखरती है और वो ऐसे किसी भी अभियान का विरोध करते हैं।

बाकी जगहों की तरह रोहिंग्या मुसलमानों ने यहां भी अपना विस्तार करने के लिए इस्लाम के वही परंपरागत हथियार चुने जिससे उनकी तादात सौ फीसद पहुंच जाए। उन्होंने बर्मी राखिन लड़कियों को अगवा करना और लव जिहाद की योजना पर काम करना शुरु कर दिया। पहले ही नस्लीय भेदभाव के बीच ऐसी घटनाओं ने आग में घी काम किया। इसके विरोध में राखिन में एक बौद्ध आंदोलन खड़ा हुआ जिसे 969 आंदोलन कहा जाता है। इस आंदोलन के अगुवा बने असिन विराथू। बौद्ध संत असिन विराथू ने म्यामांर (बर्मा) में प्रदर्शन किया और मुसलमानों से बौद्ध लड़कियों के शादी पर रोक के लिए कानून की मांग की। उन्होंने मांग रखी कि अगर कोइ मुस्लिम लड़का राखिन लड़की से शादी करता है तो उसे बौद्ध धर्म स्वीकार करना पड़ेगा। कानून तो नहीं बना लेकिन विराथू को व्यापक जनसमर्थन मिलने लगा। इसका परिणाम यह हुआ बौद्ध मठ ने “शांति” कायम करने का काम अपने हाथ में ले लिया।

बौद्ध मठ से जुड़े सन्यासियों के इस “शांति कर्म” का म्यामांर सरकार ने समर्थन भी नहीं किया तो विरोध भी नहीं दर्शाया। बर्मा सरकार का मानना है कि रोहिंग्या लोग बर्मा के नागरिक नहीं है इसलिए उन्हें नागरिकों वाले अधिकार नहीं दिये जा सकते। इस बीच रोहिंग्या मुसलमानों ने एक आतंकी संगठन का निर्माण कर लिया। अराकान रोहिंग्या साल्वेसन आर्मी। अराकान में ही रोहिंग्या मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी रहती है। खबर ये भी है कि इस आतंकी संगठन को बनाने में सउदी अरब में बैठे लोगों ने मदद की है। बांग्लादेश के एक अखबार एशियन एज का दावा है कि इस आर्मी को पाकिस्तान की जमात ए इस्लामी भी मदद कर रहा है। ताजा उबाल इसी साल्वेसन आर्मी के हमलों के कारण आया है जब २५ अगस्त से वह लगातार सेना और पुलिस के ठिकानों पर हमले कर रही है। इन हमलों को रोकने के लिए सेना और पुलिस कार्रवाई कर रही है जिसके कारण म्यामांर से बंगाली मुसलमान पलायन करके बांग्लादेश की तरफ आ रहे हैं। अनुमान है कि अब तक सवा लाख लोग बांग्लादेश पहुंच चुके हैं।

इस समस्या को बौद्ध मुस्लिम समस्या के रूप में देखने की बजाय रोहिंग्या और राखिन के टकराव के रूप में देखेंगे तो तस्वीर ज्यादा साफ नजर आयेगी क्योंकि इस झगड़े में अल्पसंख्यक रोहिंग्या हिन्दू भी शिकार हो रहे हैं। बर्मा का यह संघर्ष धर्म से ज्यादा जाति, भाषा और नस्ल का है। धर्म इस झगड़े में अहम भूमिका निभा जरूर रहा है लेकिन न बौद्ध उतने दोषी हैं जितने बताये जा रहे हैं और न मुस्लिम उतने निर्दोष जितना दिखाये जा रहे हैं।

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