ब्रिक्स में भारत की बड़ी जीत

IMG_20170905_120529ब्रिक्स डिक्लेरेशन में जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा का नाम आना काम कर गया। इसलिए नहीं कि भारत ने नाम लिया बल्कि इसलिए कि रूस और चीन ने इस पर अपनी सहमति दे दी। अब पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने माना है कि हमारी धरती पर ये आतंकी संगठन सक्रिय हैं और हमें अपना घर ठीक करना पड़ेगा। उन्होंने ये भी माना कि नेशनल एक्शन प्लान के तहत उनके खिलाफ जो कार्रवाई होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई।

एक निजी टीवी जियो न्यूज से बात करते हुए ख्वाजा आसिफ ने कहा कि हम बार बार अपने दोस्तों की परीक्षा नहीं ले सकते। यहां उनका दोस्तों से मतलब चीन से था जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जैश ए मोहम्मद के चीफ मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने से रोकने के लिए अपने वीटो पॉवर का इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन अब जबकि उसने ब्रिक्स देशों में यह मान लिया है कि जैश ए मोहम्मद आतंकी संगठन है तब उसके लिए फिर से मसूद अजहर को बचाने के लिए वीटो पॉवर का इस्तेमाल करना मुश्किल होगा।

इस ताजा घटनाक्रम का दबाव पाकिस्तान के विदेश मंत्री पर साफ दिख रहा है। जब उनसे पत्रकार ने पूछा कि कल तक चीन ब्रिक्स घोषणापत्र में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों का नाम आने से रोक रहा था लेकिन आज वो खुद अपनी सहमति दे रहा है तो वो कहते हैं कि “चीजें बदलती रहती हैं। हमें अपना घर ठीक करना पड़ेगा।” ख्वाजा आसिफ कहते हैं कि हमें अपनी आनेवाली नस्लों को सुरक्षित करने के लिए यह करना पड़ेगा। तो क्या अब सचमुच पाकिस्तान हाफिद सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसी अपनी “पूंजी” को नष्ट कर देगा जिन्हें सेना और आइएसआई ने मदद देकर तैयार किया है? क्या अब सचमुच कट्टरपंथी इस्लामिक संस्थाओं और संगठनों पर पूरी तरह रोक लग जाएगी जो कि भारत और अफगानिस्तान में जाकर आतंकी वारदातों को अंजाम देते रहे हैं?

ख्वाजा आसिफ की इस स्वीकारोक्ति से भारत की कूटनीतिक जीत भले हुई हो लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथ पाकिस्तान में इतने गहरे पैठा हुआ है कि उसे जड़ से उखाड़ने जाएंगे तो पाकिस्तान ही मिट जाएगा। यह बात सही है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन भले पाकिस्तान का बचाव करे लेकिन पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता में चीन यह मुद्दा उठाता रहा है लेकिन चाहकर भी पाकिस्तान बहुत कुछ कर नहीं पाता है। पाकिस्तान में आतंकवाद और इस्लाम एक दूसरे से चीनी पानी की तरह घुल मिल गये हैं। अब उनको अलग करने के लिए बहुत बुनियादी बदलाव करने की जरूरत है। इस बुनियादी बदलाव में कश्मीर में जिहाद की नीति और अफगानिस्तान में तालिबान को समर्थन को बंद करना पड़ेगा। जो फिलहाल लगता नहीं कि पाकिस्तान कर पायेगा।

पाकिस्तान की जो आतंकी तंजीमें अस्सी के दशक में जिहाद के नाम पर पैदा हुई हैं उनका अपना एक राजनीतिक रसूख है। लाखों की तादात में उनके समर्थक हैं जो न सिर्फ कश्मीर में जिहाद को पाकिस्तान का पवित्र कर्म मानते हैं बल्कि अफगानिस्तान में तालिबान शासन उनके एजंडे पर है। इन आतंकी संगठनों ने अब तीसरा ख्वाब भी देख लिया है। पाकिस्तान को सच्चा इस्लामी निजाम बनाने का ख्वाब। ये आतंकी संगठन मानते हैं कि अभी पाकिस्तान में जो लोकतंत्र है वो कुफ्र है और हमें राजनीतिक रूप से ताकतवर होकर इस कुफ्र को खत्म करना है। इसके लिए वो राजनीतिक दल बना रहे हैं। अब तक दो आतंकी संगठन अपने अपने राजनीतिक दल बना चुके हैं।

पाकिस्तान के राजनीतिक दलों के लिए यह ज्यादा बड़े खतरे की घंटी है। अभी तक वो आतंकी संगठनों का सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन अब आतंकी संगठन उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए उनके भीतर घबराहट है। ऐसे में चीन और रूस द्वारा लश्कर और जैश को आतंकी संगठन मान लेना पाकिस्तान के लिए मुश्किल पैदा करेगा क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद पाकिस्तान इन्ही दोनों देशों के पास अपनी फरियाद लेकर जानेवाला था। अब अगर यही दोनों मान रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालता पोसता है तो भला वो कि मुंह से आतंकवाद के खिलाफ अपनी कुर्बानी का राग अलापेंगे?

फिर भी यह ब्रिक्स में भारत की बड़ी दीत है कि उसने चीन से उस कागजात पर दस्तखत ले लिये जिस पर आतंकी संगठन के रूप में जैश और लश्कर का नाम लिखा था। इस कारण पाकिस्तान भी यह स्वीकार करने को मजबूर हो रहा है कि ये जिहादी तंजीमें पाकिस्तान में बैठकर कार्रवाई को अंजाम देती हैं। पाकिस्तान की यह स्वीकारोक्ति जितनी स्वागतयोग्य है उसकी तरफ से ठोस कार्रवाई की पहल उससे ज्यादा स्वागतयोग्य होगी। क्या पाकिस्तान आतंकवाद को अपनी राष्ट्रीय नीति बनाकर रखेगा या फिर आतंकवाद के खिलाफ चार साल पहले घोषित नीति पर अमल करेगा? उसकी कार्रवाई ही उसकी बात का ठोस सबूत देगी वरना पाकिस्तान में झूठ बोलना भी एक राष्ट्रीय नीति है।

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