भारत के लिए बुलेट ट्रेन कितना जरूरी है?

800px-E6-E5-Coupling_in_omiya_2013032014 सितंबर को गुजरात में साबरमती से मुंबई के बीच पहली बुलेट ट्रेन के भूमिपूजन के साथ ही एक सवाल खड़ा किया जाने लगा है कि जहां रेलवे की दशा ठीक नहीं है वहां एक लाख करोड़ खर्च करके पांच सौ किलोमीटर के लिए बुलेट ट्रेन बनाने का क्या तुक है? यह सवाल ज्यादातर वो लोग उठा रहे हैं जो मोदी के हर काम पर सवाल उठाते हैं इसलिए उनके द्वारा उठाये जानेवाले सवाल का कोई खास मतलब नहीं है लेकिन फिर भी यह सवाल मन में आता ही है कि महज पांच सौ किलोमीटर के लिए एक लाख करोड़ रूपये का खर्च क्या तर्कसंगत है?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए दो बातें समझने की जरूरत है। पहला, यह तकनीकि का खर्च है सिर्फ ट्रेन ट्रैक बिछाने का नहीं और दूसरा भारत जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है अब उसके लिए अपरिहार्य हो गया है कि वह तेज परिवहन के साधनों पर निवेश करे। नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण के बाद भारत में तेजी से शहरीकरण बढ़ा है। विश्व बैंक भी यही चाहता है कि भारत में ज्यादातर लोग शहरों में रहें और भारत सरकार भी इसी दिशा में काम कर रही है। इससे जहां दुनिया की कंपनियों के लिए संगठित बाजार मुहैया होगा वहीं भारत सरकार के लिए भी ढांचागत विकास करने में आसानी होगी।

इसलिए बीते बीस पच्चीस सालों से एकदम से केन्द्र सरकारोंं का जोर ढांचागत विकास पर चला गया है जिसमें शहरों को शहरों से जोड़ने की कई योजनाएं चलायी जा रही हैं। इसमें हवाई यात्रा और सड़क मार्ग को दुरुस्त करने के उपाय किये जा चुके हैं या किये जा रहे हैं लेकिन रेलवे एक ऐसा क्षेत्र है जहां बुनियादी काम भी नहीं हुआ है। आज भी भारत की तेज से तेज गति की ट्रेन 80 किलोमीटर की औसत गति से दौड़ती है। ऐसे में एक शहर से दूसरे शहर के बीच  जाने में लंबा वक्त लगता है। इसलिए मोदी सरकार ने एक तरफ जहां वर्तमान पटरियों को सुधारने का काम शुरु किया वहीं दूसरी तरफ पहले से चली आ रही द्रुत गति रेलवे को गति देने का काम किया और मोदी ने सरकार बनने के तीन साल बाद ही भूमिपूजन कार्यक्रम संपन्न करवा दिया। केन्द्र की मोदी सरकार का प्रयास है कि इस पटरी पर 15 अगस्त 2022 तक बुलेट ट्रेन दौड़ जाए।

अतीत में इस तकनीकि को अगर भारत में लाया गया होता तो आज हमारे लिए बुलेट ट्रेन कोई आश्चर्य का विषय नहीं होता। लेकिन अब अगर वर्तमान में यह तकनीकि आ रही है तो निश्चित रूप से इसका फायदा भविष्य में जरूर होगा। ऐसी रेल तकनीकि का विरोध करना भारत को अंधकार में धकेलने जैसा है। 

मोदी को यह पूरा भरोसा है कि 2019 का चुनाव भी वही जीतनेवाले हैं इसलिए वो दस वर्षीय योजनाएं बना रहे हैं और उस पर काम कर रहे हैं। बुलेट ट्रेन की समयसीमा भी इसी हिसाब से तय की गयी है। सरकार के स्तर पर जिस तरह के प्रयास हो रहे हैं उसे देखकर लगता है कि वो इस समयसीमा में ही बुलेट ट्रेन बनाने में कामयाब भी होगें। नेशनल हाईस्पीड रेल अथारिटी लिमिटेड ने काम करना शुरु कर दिया है और उसके 300 इंजीनियर जापान में ट्रेनिंग ले रहे हैं। इसी तरह जापान से 100 इंजीनियर भारत में आकर यहां इस परियोजना को पूरा करने के लिए सक्रिय हैं। रेल मंत्रालय ने जो समयसीमा घोषित की है उसके मुताबकि जून 2018 में निर्माण कार्य की शुरुआत होगी और जून 2021 तक इस रूट पर ट्रेनों का ट्रायल शुरु कर दिया जाएगा। मतलब सिर्फ तीन साल में ट्रैक और स्टेशनों का निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

लेकिन यह परियोजना सिर्फ मुंबई अहमदाबाद के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। यह परियोजना समूचे भारत के लिए महत्वपूर्ण है। जापान की ट्रेन तकनीकि का फायदा समूची रेल व्यवस्था को मिलेगा। एक बार कोई तकनीकि आप हासिल कर लेते हैं तो फिर उसे आप अपनी जरूरत के हिसाब से हर जगह इस्तेमाल करते हैं। और यही बात इस पहले बुलेट ट्रेन के लिए भी लागू होती है। भारत सरकार जापान से सिर्फ बुलेट ट्रेन ही नहीं ले रही बल्कि बुलेट ट्रेन की तकनीकि ले रही है। आनेवाले समय में भारत सरकार न केवल अपनी क्षमताओंं से बुलेट ट्रेन का ट्रैक बिछा सकेगी बल्कि सबंधित तकनीकि का विकास भी भारत में होगा। इससे भारत के दूसरे शहरों को तेज गति परिवहन के माध्यम से आपस में जोड़ने में बहुत आसानी हो जाएगी।

शहर तेग गति परिवहन से जुड़ेंगे तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बड़े शहरों पर बोझ कम होगा और छोटे शहरों का विकास होगा। मसलन अगर कोई व्यक्ति दो घण्टे में अहमदाबाद से मुंबई पहुंचता है और काम करके  उसी दिन वापस भी लौट सकता है तो जाहिर सी बात है वह अपने शहर में रहना पसंद करेगा। शुरुआत में भले ही किराया मंहगा है लेकिन जैसे जैसे रूट का विस्तार होगा किराया भी सस्ता होगा। मसलन, मुंबई अहमदाबाद रूट का विस्तार जिस दिन दिल्ली तक हो जाएगा, मुंबई अहमदाबाद का किराया अपने आप सस्ता हो जाएगा। इसी तरह पहली बार निर्माण लागत जरूर ज्यादा है लेकिन अब इसके बाद बनने वाले रूटों की निर्माण लागत आधी रह जाएगी।

चीन में 2007 में जब पहली बुलेट ट्रेन चली थी उस साल 61 लाख लोगों ने बुलेट ट्रेन का सफर किया था, आज चीन में बुलेट ट्रेन का दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है और बीते साल 2016 में 144 करोड़ लोगों ने हाईस्पीट ट्रेन में सफर किया। वह भी तब जब उनकी परंपरागत रेलवे पहले की ही भांति काम कर रही है। न सिर्फ काम कर रही है बल्कि चीन अपनी परंपरागत रेलवे को भी सुधारने का काम कर रहा है। इसलिए सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने का कोई मतलब नहीं है। बुलेट ट्रेन से किसी को घाटा हो न हो फायदा सबको होगा क्योंकि इसकी तकनीकि की वजह से समूचे रेलतंत्र को सुधारने में मदद मिलेगी।

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