बदली विश्व मानसिकता का शिकार हुए रोहिंग्या

पहले तो यह मानिए कि रोहिंग्या मुश्किल में हैं। सचमुच उन पर आपदा आई हुई है। बूढे, बच्चे, औरतें कई कई किलोमीटर पैदल चलकर, नदी पारकर बांग्लादेश पहुंच रहे हैं। न रहने का ठिकाना, न खाने का और न आगे जाने का। वो बस निकल पड़े हैं, कहां पहुंच जाएंगे कुछ पता नहीं। लेकिन उनकी इस दशा के लिए जिम्मेवार कौन है? क्या बौद्ध लोग जिम्मेवार हैं या फिर म्यामांर सेना जिम्मेवार है?

यह दोनों बातें मान लेना समस्या का सरलीकरण होगा। रोहिंग्या मुसलमान की इस दुर्दशा के लिए इस्लाम के नाम पर ही आतंक फैलानेवाले कुछ लोग जिम्मेवार हैं जिन्होंने दूर पाकिस्तान और सऊदी अरब में बैठकर अराकान लिबरेशन आर्मी पैदा किया। जिहादी इमाम भेजे और अपने ट्रैनर भी जिन्होंने इन्हीं रोहिंग्या लोगों में से कुछ लोगों को आतंक की ट्रेनिंग दी। जिनके हाथ में रोटी कमाने का हुनर था उनके हाथ में बंदूक थमा दी। क्यों थमा दी?

क्योंकि इस्लाम खतरे में था। मुसलमान खतरे में रहे तो रहे लेकिन इस्लाम खतरे में नहीं रहना चाहिए। इसी इस्लाम को बचाने के लिए २५ अगस्त को अराकान लिबरेशन आर्मी ने पुलिस और सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला कर दिया। अगर कोई पूछे कि क्या जरूरत थी? तो जवाब यही मिलेगा कि इस्लाम खतरे में था। लेकिन इस कार्रवाई ने म्यांमार सेना को मौका दे दिया। उन्होंने गांव के गांव उजाड़ दिये। आग लगा दी। घर खेत खलिहान सब धू धू कर जल गया और रोहिंग्या लोगों को वहां से जान बचाकर भागना पड़ा।

मुसलमानों के साथ समस्या ये है कि उन्होंने संसार को इस्लामियत और इंसानियत में बांट रखा है। उनकी अपनी अलग विश्व व्यवस्था है जहां सिर्फ मुसलमान के लिए ही जगह है। इसलिए दुनिया में जहां कहीं मुसलमान के साथ समस्या होती है तो मुसलमान का दिल रोता है। वो इंसान के लिए नहीं रोता। इसलिए भारत का मुसलमान यजीदियों के लिए नहीं रोता, कश्मीरी पंडितों के लिए नहीं रोता लेकिन रोहिंग्या के लिए रोता है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि अगर इंसानी बिरादरी के लिए मुसलमान बिरादरी नहीं रोती है तो मुसलमान बिरादरी के लिए इंसानी बिरादरी क्यों आंसू बहाये?

लेकिन इसके बाद की कहानी भी इससे कम भयावह नहीं है। आखिर क्या कारण है कि इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने जब इराक में यजीदियों पर हमला किया तो पूरी दुनिया सिहर गयी, दुनिया के हर बड़े देश मदद के लिए आगे आये और यजीदियों का पलायन देखकर अमेरिका भी कुर्दों की मदद करने के लिए तैयार हो गया कि वो इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों से मुकाबला कर सकें। ऐसा कुछ रोहिंग्या लोगों के मामले में क्यों नहीं हुआ? क्यों चीन ने म्यांमार की कार्रवाई का समर्थन कर दिया और क्यों अमेरिका चुप बैठ गया? क्यों बांग्लादेश अपनी आबादी का हवाला देकर बंगाली मुसलमानों को ही अपने यहां लेने को तैयार नहीं है और क्यों योरोप से कोई देश मदद करने आगे नहीं आया? ऐसा क्यों हो रहा है कि सिर्फ कट्टरपंथी मुसलमान ही रोहिंग्या का रोना रो रहे हैं और बाकी दुनिया देख सुनकर भी चुप है?

ऐसा इसलिए हो रहा है कि मुसलमान के प्रति आम जनमानस की धारणा बदल रही है। बीते दो तीन दशकों में आतंकवाद के नाम इस्लामिक कट्टरपंथियों का ऐसा नंगा नाच दुनिया देख रही है जैसा कि सभ्य समाज कल्पना भी नहीं कर सकता। पहले ओसामा बिन लादेन और फिर आइसिस और बोको हरम का उभार। दीन वालों ने दुनिया को इस्लाम के नाम पर एक से एक वीभत्स दृश्य दिखाये हैं। यूरोप के देश जो कि अब तक इस्लाम को लेकर सशंकित नहीं थे लेकिन अब वो भी सशंकित हो चुके हैं। ब्रिटेन में हो रही घटनाएं हों, फ्रांस में हुए हत्याकांड हो या फिर जर्मनी में शरणार्थियों का उपद्रव हो इन घटनाओं ने मुसलमान को कटघरे में खड़ा किया है।

नयी मीडिया चंद मिनट में दुनिया की किसी कोने में हो रही घटना को पूरी दुनिया के सामने खोलकर रख देता है। याद करिए ढाका के कैफे पर हुए हमले को जिसमें स्कूल से निकले लड़कों ने इस्लाम के नाम पर मौत का नंगा नाच किया था। पूरी दुनिया ने टीवी पर देखा और सोशल मीडिया पर सच्चाई को जाना। दुनिया यह भी देख रही है कि ऐसे इस्लामी हमलों पर मुसलमान उसी इस्लाम को बचाने में लग जाता है जिसके नाम पर ऐसे हमले होते हैं। इसलिए अंदर ही अंदर संसार का मानस मुसलमान के खिलाफ हो रहा है। रोहिंग्या मामले में संसार के लोगों कि संदेहास्पद चुप्पी इस्लाम के के लिए खतरे की घंटी हो न हो मुसलमानों के लिए जरुर खतरे की घंटी है।

इसलिए यह मुसलमानों को शिकायत करने की जरूरत नहीं है कि दुनिया रोहिंग्या के मामले में चुप क्यों है बल्कि उन्हें आत्ममंथन करने की जरूरत है कि दुनिया चुप क्यों है? क्या यह म्यामांर की सेना को संसार का मौन समर्थन है? मुसलमानों ने इसे जिस तरह से इंसानी संकट को इस्लामी संकट बताकर इसका प्रचार किया है उससे भी रोहिंग्या के मामले में लोग चुप्पी साध गये। जहां तक भारत का सवाल है तो भारत जैसे देश जो कर सकते थे कर रहे हैं, उन्हें मानवीय स्तर पर मदद पहुंचा रहे हैं लेकिन वो भी अपने यहां रोहिंग्या को आने नहीं देना चाहता है। जो कट्टरपंथी लोग सरकार के इस कदम की आलोचना कर रहे हैं उनसे एक सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या वो वास्तव में मानवीय आधार पर ही रोहिंग्या को भारत लाना चाहते हैं या फिर पीछे कोई जमाते इस्लामी सक्रिय है? आखिर जब कोई इस्लामी मुल्क रोहिंग्या के लिए अपने दरवाजे नहीं खोल रहा है तो मुसलमान गैर मुस्लिम देशों से यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि बदलती हुई विश्व मानसिकता में वह मुस्लिम शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल देगा?

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