लब्बैक या रसूल अल्लाह

पिछले साल दिवाली के मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कराची गये थे। कराची में उन्होंने हिन्दुओं की एक दीवाली मिलन समारोह को संबोधित किया जिसमें उन्होंने कहा था कि “जन्नत और दोजख के फैसले करनेवाले हम कौन होते हैं? यह फैसला तो उस परवरदिगार के हाथ में है।” यह कहकर उन्होंने हिन्दुओं के साथ रिश्ता कायम करने की कोशिश की थी कि “एक राज्य का जिम्मा सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करने का होता है, और वो यही करने की कोशिश कर रहे हैं।” यह रिश्ता बनाने की कोशिश उन्होंने इसलिए भी की क्योंकि डेढ़ साल बाद पाकिस्तान में चुनाव होनेवाले थे और पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में हिन्दू अल्पसंख्यकों के कुछ लाख वोट अभी भी हैं। लेकिन वो डेढ़ साल बाद वाले चुनाव में हिस्सा ले पाते इससे पहले ही अगस्त २०१७ में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनसे कुर्सी छीन ली।

उस वक्त नवाज शरीफ के इस जन्नत दोजख वाले फैसले पर पाकिस्तान के कट्टरपंथी मुस्लिम जमातों में जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई थी। प्रतिक्रिया देने वालों में एक खादिम हुसैन रिजवी भी थे जिनका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित हुआ था। अपने वीडियो में उन्होंने हिन्दुओं की तुलना संडास (शौचालय) से करते हुए कहा था कि हिन्दुओं से किसी तरह का रिश्ता रखा जा सकता है तो सिर्फ इतना जितना मजबूरीवश शौचालय से रखना पड़ता है। उसने शरीफ के इस बयान की निंदा की कि शरीफ ने जन्नत और दोजख के इस्लामी फैसले के खिलाफ जाकर बयान दिया। उसने कहा कि जन्नत और दोजख के फैसले तो अल्लाह और उनके रसूल ने कर दिया है और जो गैर मुस्लिम हैं वो दोजख जाएंगे, फिर ये (शरीफ) कौन होता है इसमें दखल देनेवाला?

नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री पद से हटाये जाने के बाद उनकी संसदीय सीट एनए १२० पर दोबारा इसी सितंबर में चुनाव करवाये गये जहां इस बार उनकी पत्नी कुसलुम नवाज मैदान में उतरीं। हालांकि कुसलुम नवाज को कैंसर है और वो अपने इलाज के लिए लंदन में हैं लेकिन नामांकन उन्होंने ही भरा। वो चुनाव जीत भी गयीं लेकिन नेशनल एसेम्बली की सीट नंबर १२० पर इस बार शरीफ परिवार की जीत से बड़ी खबर फिर वही खादिम हुसैन रिजवी बन गये जिन्होंने पिछले साल नवाज शरीफ को चुनौती दी थी।

खादिम हुसैन रिजवी नाम से भले शिया मुसलमान लगते हों लेकिन वो हैं नहीं। वो सुन्नी मुसलमान हैं और सुन्नी इस्लाम के अपेक्षाकृत उदार फिरके बरेलवी से संबंध रखते हैं। बरेलवी समुदाय सुन्नी इस्लाम के देओबंदी जमात के मुकाबले उदार समझे जाते हैं और कट्टरपंथी सुन्नी मुसलमान उन्हें बुतपरस्त कहकर काफिर भी करार देते हैं। लेकिन खादिम के साथ ऐसा नहीं है। वो बरेलवी फिरके को एक कट्टरपंथी धड़े के रूप में सामने रखते हैं। पाकिस्तान में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करनेवाले उनके अंगरक्षक मुमताज कादरी को जब गिरफ्तारी हुई तो उसे बचाने के लिए रिजवी ने लब्बैक या रसूल अल्लाह (अल्लाह के पैगंबर के लिए हम तैयार हैं) नामक एक मुहिम शुरू की। उसकी मुहिम चली जरूर लेकिन वह मुमताज कादरी को फांसी से बचा नहीं पाया। मुमताज कादरी की फांसी के बाद रिजवी ने अपनी मुहिम बंद नहीं की बल्कि उसे राजनीतिक शक्ल दे दिया। नेशनल एसेम्बली की सीट नंबर १२० के लिए उसने पहली बार उम्मीदवार मैदान में उतारे और दुनिया यह देखकर दंग रह गयी कि रिजवी की पार्टी लब्बैक या रसूल अल्लाह या तहरीक ए लब्बैक तीसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है।

कुसलुम नवाज जीत जरूर गयीं लेकिन उनकी जीत का अंतर बहुत कम हो गया। कुसलुम नवाज को नवाज शरीफ के ६३ फीसदी के मुकाबले ४९ फीसदी वोट मिले। दूसरे नंबर की पार्टी तहरीक ए इंसाफ के वोट शेयर में कोई खास अंतर नहीं आया जबकि दो कट्टरपंथी पार्टियों को क्रमश: ७ प्रतिशत और ५ प्रतिशत वोट मिले। इसमें ७ प्रतिशत वोट पानेवाली पार्टी रिजवी का का राजनीतिक दल है जिसने आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा के अमीर हाफिद सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग से भी ज्यादा वोट हासिल किया। मिल्ली मुस्लिम लीग को ५ प्रतिशत वोट मिले।

खादिम हुसैन रिजवी की इस शानदार सफलता के बाद रायटर एजंसी ने उनसे बातचीत की तो खादिम हुसैन रिजवी ने कहा कि अब वह २०१८ के चुनाव की तैयारी कर रहा है। रिजवी मानता है कि पाकिस्तान सच्चा इस्लामिक मुल्क नहीं बन सका है जिसे सच्चा इस्लामिक मुल्क बनाने की जरूरत है। यह तभी हो सकता है जब पाकिस्तान में शरीया आधारित कानून हटाकर सीधे शरीयत लागू कर दिया जाए। रिजवी कहता है कि इससे लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। शरीयत लागू होते ही भ्रष्टाचार एक दिन में खत्म हो जाएगा। रिजवी का कहना है कि उसकी पार्टी जीतेगी तो वह महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर जाने और काम करने पर रोक लगा देगी। कुछ इसी तरह का दावा हाफिज सईद की पार्टी भी कर रही है कि पाकिस्तान में शरीयत लागू करने से ही वह अपने उद्देश्य को हासिल कर सकेगा जिसके लिए पाकिस्तान की स्थापना की गयी थी।

पाकिस्तान में यही वो कट्टरपंथी मजहबी ताकतों का उभार है जिससे अमेरिका डरता है। अमेरिका इसलिए डरता है क्योंकि अगर ये ताकतें सत्ता के द्वार तक पहुंचती हैं तो दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन जाएंगी। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में हिस्सा लेने पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी के सामने भी इस चिंता को रखा गया कि ऐसी मजहबी ताकतों के उभार के बाद वह अपने परमाणु हथियारों की सुरक्षा कैसे करेगा? अब्बासी ने फिर भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार सुरक्षित हाथों में हैं लेकिन क्या यह भरोसा वैसा ही नहीं है जैसे पाकिस्तान ने कभी यह भरोसा दिलाया था कि वह परमाणु बम नहीं बना रहा है? खादिम रिजवी और हाफिज सईद की पोलिटिकल पार्टी बनाने और चुनावी मैदान में उतरने से शक और बढ़ जाता है कि क्या पाकिस्तान के रहते दुनिया का भविष्य सुरक्षित है?

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