हवा में उड़नेवाली ट्रेन

जापान के शहर टोक्यो से नागोया की दूरी ३४६ किलोमीटर है। अगर आप इस दूरी को पैदल पूरा करना चाहें तो ७२ घण्टे का समय चाहिए। सड़क से जाना चाहें तो पांच से छह घण्टे। ट्रेन से जाना चाहें तो डेढ़ घंटे और हवाई जहाज से जाना चाहें तो एक घण्टे का समय लगता है। जापान के लोग इस एक निश्चित दूरी को अलग अलग प्रकार से नापते हैं। जिसके पास जैसी सुविधा और समय हो वह उसके मुताबिक अपनी यात्रा को पूरी करता है। सड़क, रेल और हवाई यातायात के तीनों साधन मौजूद हैं। अब पैदल तो शायद टोक्यों से नागोया नहीं जाते लेकिन हवाई यातायात मौजूद होने के बावजूद ट्रेन से ही सफर करना पसंद करते हैं। इस पसंद का ध्यान रखते हुए जापान की रेल कंपनी टोक्यो से नागोया के लिए हर दस पंद्रह मिनट पर ट्रेन सेवा प्रदान करती है।

किसी के भी मन में सवाल उठ सकता है, खासकर भारत में बुलेट ट्रेन का विरोध करनेवाले लोगों के मन में कि अगर उसी दूरी को जापान की एयरलाइंस कंपनिया मात्र एक घंटे में नाप लेती हैं तो फिर लोग ट्रेन में सफर करके आधा घंटा अतिरिक्त क्यों बर्बाद करते हैं? वह भी तब जब रेलवे का किराया एयरलाइन्स से ज्यादा है। इस सवाल का जवाब तो जापानी ही बेहतर दे सकते हैं लेकिन जो जवाब बिना पूछे सुनाई पड़ता है वह यह कि वो हवाई जहाज के मुकाबले तेज गति वाली ट्रेन में चलना पसंद करते हैं। यह शायद मनुष्य का स्वभाव है कि वह आसमान में तेज गति से उड़ने की बजाय जमीन पर तेज गति से दौड़ने में ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। और शायद इसीलिए जापान अपनी ट्रेन तकनीकि में लगातार नये नये सुधार करते हुए उसकी गति को हवाई जहाज के करीब लेकर पहुंच गया है।

साठ के दशक में जब जापान में पहली बार तेज गति ट्रेन का संचालन शुरु किया गया उसी समय उन्होंने एक और संभावित तकनीकि का परीक्षण शुरु कर दिया था। मैग्लेव ट्रेन। साठ के दशक में शुरु हुआ मैग्लेव परीक्षण आज पांच दशक बाद ४२ किलोमीटर के ट्रैक के रूप में एक हकीकत है जहां परीक्षण के तौर पर प्रतिदिन मैग्लेव ट्रेन चलायी जाती है और लोग इस ट्रेन का आनंद लेने के लिए यहां आते हैं और टिकट खरीदकर इसका अनुभव लेते हैं। जापान सरकार इस ट्रैक का विस्तार करके एक तरफ टोक्यो और दूसरी तरफ नागोया से जोड़ रही है ताकि २०२७ में इस साढे तीन सौ किलोमीटर की यात्रा को सिर्फ ४० मिनट में पूरा किया जा सके।

साढ़े तीन सौ किलोमीटर की इस दूरी को चालीस मिनट में पूरा करने के लिए जरूरी है कि तेज गति ट्रेन की वर्तमान रफ्तार को बढ़ाकर पांच सौ किलोमीटर प्रति घंटे कर दिया जाए। यह परंपरागत ट्रैक पर संभव नहीं था इसलिए एक बिल्कुल नयी तकनीकि को संभव बनाया गया जो चुंबक के प्रतिकर्षण के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें ट्रेन में सिर्फ टेक आफ के लिए रबर के पहिए लगाये गये हैं ताकि हवाई जहाज की तरह ट्रेन पटरी पर अपनी जगह से दौड़ लगा सके। ट्रेन के जगह छोड़ते ही चुंबक सक्रिय हो जाते हैं और ट्रेन पहिए पर चलने की बजाय हवा में उड़ने लगती है। ट्रेन के चुंबकीय ट्रैक पर कुछ सेन्टीमीटर के अंतर पर यह ट्रेन हवा में उड़ते हुए अब तक ६०३ किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार हासिल कर चुकी है।

सिर्फ यह मैग्लेव ट्रेन ही हवा में नहीं उड़ती बल्कि इस ट्रेन की पूरी प्रणाली को हवाई जहाज और हवाई अड्डों की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है जिसमें स्टेशन में प्रवेश से लेकर ट्रेन में सवार होने तक सबकुछ अत्याधुनिक हवाई यात्रा जैसा ही होगा। एक तरफ जब भारत २०५० तक तेग गति ट्रेनों का हीरक चतुर्भुज तैयार करने की तैयारी कर रहा है तब जापान मैग्लेव ट्रेन का पांच सौ किलोमीटर लंबा ट्रैक बिछा रहा है। क्योंकि यह तकनीकि और ट्रैक दोनों बहुत मंहगे हैं इसलिए फिलहाल पचास साल तक ऐसी किसी तकनीकि का भारत आना मुश्किल है लेकिन अब तक अगर रेल सेवा के विकल्प के रूप में हवाई सेवा सामने आयी है तो भविष्य में हवाई सेवा के विकल्प के रूप में रेलवे अपनी दावेदारी नये सिरे से कर रहा है। इसमें जापान ही अगुवा देश है। उसी ने दुनिया को सफल बुलेट ट्रेन दिया और अब वही सबसे पहले मैग्लेव ट्रेन का व्यावहारिक इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। जर्मनी ने जरूर इस तकनीकि पर काम किया है लेकिन आज तक वो इसे धरातल पर उतार नहीं सके हैं।

इसलिए भारत जैसे विशाल देश में दूरी को नापने के लिए नयी नयी तकनीकि में निवेश बहुत जरूरी है। अच्छा तो यह होता कि भारत खुद ऐसी तकनीकि का आविष्कार करता लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि आविष्कार नहीं किया तो अब निवेश भी नहीं करेगा। भारत के बढ़ते शहरीकरण को देखते हुए ट्रेन की तेज गति तकनीकि में निवेश भारत की लक्सरी नहीं बल्कि मजबूरी बन गया है। ऐसे में हाईस्पीड ट्रेन के साथ साथ मैग्लेव और हाईपरलूप जैसी संभावनाओं को आज नहीं तो कल भारत को तलाशना ही पड़ेगा।

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