पाकिस्तान क्यों बन गया टेररिस्तान?

एक दशक पहले की बात है। पाकिस्तान की राजधानी में मौजूद लाल मस्जिद में पाकिस्तान की सेना और रेन्जर्स ने एक आपरेशन किया था। इस आपरेशन में स्पेशल कमांडो सहित ६० हजार सैनिक लगाये गये थे जबकि दूसरी तरफ लाल मस्जिद के १३०० मुजाहिदों ने इस आपरेशन खिलाफ बंदूक उठाई। पाकिस्तान की राजधानी में सेना और इस्लामिक लड़ाकों के बीच जमकर जंग हुई युद्ध और जब जंग समाप्त हुई तो लाल मस्जिद के मुखिया अब्दुल राशिद गाजी सहित ८४ मुजाहिद मारे गये और ५० बंदी बनाये गये। सेना की तरफ से भी ११ लोगों की जानें गयीं। इस आपरेशन के बाद कनाडा के एक डाक्युमेन्ट्री मेकर हेमल त्रिवेदी और मोहम्मद अली नकवी ने एक डाक्युमन्ट्री बनायी “एमंग द बिलिवर्स”। इस डाक्युमेन्ट्री में लाल मस्जिद के वर्तमान इंचार्ज मौलाना अब्दुल अजीज का इंटरव्यु भी है। जब फिल्मकार उनसे पूछते हैं कि आप लोगों का भविष्य क्या है? तो मौलाना अब्दुल अजीज कहते हैं “हम नहीं बदल सकते। आपको लगता है कि आप हमें बदल सकते हैं तो यह आपकी भूल है।”

यहां मौलाना अब्दुल अजीज का “आप लोगों” से मतलब उस सभ्य समाज से है जो इस्लामिक आतंकवाद का शिकार है और “हम” से मतलब वो इस्लामिक जिहादी जो इक्कीसवीं सदी में भी मदरसों और मस्जिदोेें के जरिए इस्लाम की जंग लड़ रहे हैं। मौलाना अब्दुल अजीज अपने भाई अब्दुल राशिद के मरने के बाद लाल मस्जिद संभालते हैं और वहां उसी तरह की गतिविधियां फिर बहाल हो गयी हैं जैसी आपरेशन से पहले थीं। मदरसों में पांच हजार इस्लामिक लड़ाकों को तैयार किया जा रहा है जो इस्लाम की खातिर लड़ने और मरने के लिए तैयार रहेंगे।

पाकिस्तान को समझने के लिए कई सिरे हो सकते हैं लेकिन यह लाल मस्जिद का शिरा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर पाकिस्तान एक इस्लामिक मुल्क से एक आतंकी मुल्क में कैसे तब्दील हो गया कि उसे अपने ही देश की राजधानी में इस्लामिक मुजाहीदीनों से बाकायदा जंग करनी पड़ती है।

मुहम्मद अली जिन्ना भले ही पाकिस्तान के कायद ए आजम कहे जाते हों लेकिन एक दूसरा कायद भी है जो पाकिस्तान के लिए जिन्ना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उसका नाम था मौलाना मौदूदी। मौलाना मौदूदी अविभाजित भारत के औरंगाबाद में पैदा हुए थे लेकिन बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गये। पाकिस्तान बनने के बाद भले ही जिन्ना ने कह दिया हो कि सब अपना अपना मजहब मानने के लिए आजाद हैं और राज्य का किसी के मजहब से कोई मतलब नहीं है लेकिन जमात ए इस्लामी के प्रमुख मौदूदी ने बिल्कुल दूसरी बात कही। उन्होंने एक सच्चे मुसलमान का विचार सामने रखा जिसमें कहा कि सिर्फ मुसलमान होने से कोई मुसलमान नहीं हो जाता, उसे इस्लामिक कानूनों और नियमों का भी अक्षरश: पालन करना चाहिए। मौलाना मौदूदी के इसी विचार का विस्तार आम जन मानस में “पाकिस्तान का मतलब क्या? ला इलाह लिलल्लाह” के रूप में घर कर गया। मौलाना मौदूदी ही थे जिन्होंने मुजाहिद (इस्लाम के लड़ाकों) का विचार पुनर्जीवित किया और पाकिस्तान में मुसलमानों को दीन के लिए मुजाहिद होने का पैगाम दिया।

यही वह जमीन थी जिस पर आगे चलकर पाकिस्तान के हुक्मरानों ने तालिबान और अफगान मुजाहिदीन की फसल तैयार की। शिया समुदाय से संबंध रखनेवाले भुट्टो हों या कि कट्टरपंथी सुन्नी संप्रदाय से ताल्लुत रखनेवाले जिया उल हक। शासन प्रशासन में शुद्धतावादी इस्लाम घर कर गया था। मौलाना मौदूदी ने एक ऐसी जमीन तैयार कर दी थी कि उसके बाद जो आया उसने आतंक की फसल लहलहाई भी और काटी भी। यह आतंकवाद एक तरफ भारत को लहूलुहान करता रहा तो दूसरी तरफ अफगानिस्तान में साम्यवाद से लड़ने पहुंच गया। इसके बाद पाकिस्तान में तो जैसे आतंकवाद ही राष्ट्रीय विचारधारा हो गयी और सबसे अहम विदेश नीति भी। जनरल जिया उल हक के बाद चाहे वो बेवजीर भुट्टो आयीं हों या फिर नवाज शरीफ। आतंकवाद की राष्ट्रीय नीति से किसी ने छेड़छाड़ नहीं की क्योंकि इसे वहां की सेना का संरक्षण हासिल हो चुका था।

जनरल मुशर्ऱफ वो पहले शख्स थे जिन्होंने इससे भिड़ने की हिम्मत दिखाई। लाल मस्जिद आपरेशन हो या वजीरिस्तान में ड्रोन हमलों की अनुमति। यह मुशर्ऱफ ही थे जिन्होंने इस्लामिक आतंकवाद को किनारे रखकर कश्मीर पर पहल करने की कोशिश की। वो ये सब इसलिए कर पा रहे थे क्योंकि वो खुद सेना के जनरल रह चुके थे। लेकिन अब तक मौलाना मौदूदी का शुद्ध इस्लाम पाकिस्तान की नसों में इतना गहरा उतर चुका था कि एक दो आपरेशन से उसका कुछ नहीं बिगड़नेवाला था। पाकिस्तान के खान पान, जीवन, रहन सहन जिस पर अस्सी के दशक तक भारत का जबर्दस्त असर दिखता था, वह भी जिया उल हक के दौर से जो गायब होना शुरु हुआ और आज पाकिस्तान भारत से टूटा हुआ एक हिस्सा नहीं बल्कि अरब का सांस्कृतिक हिस्सा हो चुका है। उसने अपने आप को पूरब की सरहद से पूरी तरह तोड़कर सुदूर पश्चिम के नज्द कबीले से जोड़ लिया है।

इसलिए सुषमा स्वराज अगर संयुक्त राष्ट्र की सभा में खड़े होकर आज पाकिस्तान को यह याद दिला रही हैं कि भारत के पास जो कुछ है वह पाकिस्तान के पास क्यों नहीं है तो यह उपदेश ही बेवकूफाना है। पाकिस्तान को वह चाहिए भी नहीं जिसका दम सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र में भर रही है। पाकिस्तान को शुद्ध अरबी संस्कृति और बहावी इस्लाम चाहिए था, और वह उसने हासिल कर लिया है। उसे नबी निंदा करनेवालों के लिए एक मौत की सजा देने वाला कानून चाहिए था, उसे भी उसने बना लिया है। अब उसे और क्या चाहिए? चिंता तो भारत सरकार को करनी है कि जिस तरह पश्चिम से आनेवाली शुष्क रेत ने पाकिस्तान को बंजर कर दिया है उस रेत के झोंके देओबंद तक पहुंच रहे हैं। अच्छा हो कि सुषमा स्वराज पाकिस्तान को नसीहत देने की बजाय अपनी जमीन के उन मस्जिदों और मदरसों की तरफ देखें जो एक अदद मौदूदी की तलाश में भटक रहे हैं ताकि ये भी शुद्ध इस्लाम वाली कमी को पूरा कर सकें। अगर ऐसा नहीं करतीं तो कोई आश्चर्य नहीं भविष्य में इसी संयुक्त राष्ट्र सभा में कोई और देश भारत से पूछ रहा होगा कि आखिर भारत हिन्दुस्तान से टेररिस्तान कैसे बन गया?

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