फेल क्यों हो गयी तेजस एक्सप्रेस?

देश की पहली तेजस एक्सप्रेस फेल हो गयी है। उसे सवारी नहीं मिल रही है। ११०० यात्रियों की क्षमता होने के बावजूद इन दिनों वह पचास सौ यात्रियों को लेकर मुंबई से गोवा जाती है और गोवा से वापस मुंबई आती है। बहुत धूमधाम से शोर शराबे के बीच जिस तेजस ट्रेन को चलाया गया था वह छह महीने के भीतर ही सफेद हाथी क्यों साबित हो गयी?

तेजस एक्सप्रेस के असफल होने के कई पहलू हैं जिसमें सबसे पहली बात ये है कि इसे गलत रूट पर चलाया गया। मुंबई से गोवा कोई बिजनेस रूट नहीं है। यह पर्यटन रूट है और इस रूट पर ज्यादातर यात्री बंबई से गोवा घूमने ही जाते हैं। ऐसे में या तो वो फ्लाइट पकड़ते हैं या फिर ट्रेन से रातभर की यात्रा करते हैं। इसमें तेजस एक्सप्रेस कहीं फिट नहीं बैठती है।

दूसरी बात इसकी गति तो बढ़ाई गयी और यात्रा को दो घण्टे कम कर दिया गया लेकिन फिर भी नौ घण्टे से ज्यादा का समय लगता है। ट्रेन सुबह मुंबई से छूटती है और दोपहर बाद तीन बजे गोवा पहुंचती है। किसी भी यात्री के नौ घण्टे बैठकर यात्रा करना मुश्किल काम होता है। इस पर भी मुश्किल ये कि ट्रेन सुबह पांच बजे मुंबई छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से छूटती है जिसे पकड़ने के लिए जाहिर है किसी को सुबह चार बजे से पहले घर से निकलना पड़ेगा। कोई भी पर्यटक इतनी आपाधापी में यात्रा नहीं करता है लिहाजा गणेश उत्सव के दौरान जब यात्रा करना लोगों की मजबूरी थीं तभी ट्रेन की सीट भरी, उसके बाद जब लोगों को स्वेच्छा से यात्रा करना हुआ तो लोगों ने मुंह मोड़ लिया।

तीसरी और भारत के लिहाज से सबसे बड़ी गलती, ट्रेन का किराया शताब्दी से भी सवा गुना रखा गया। यह तेजस के लिए एक और मुश्किल चुनौती थी जिसे वह हासिल नहीं कर सकी। मुंबई से गोवा के बीच तेजस का किराया क्रमश: १६०० और ३१०० रुपया है। इस रूट पर यह किराया बहुत ज्यादा है वह भी तब दोनों शहर हवाई यातायात से बेहतर तरीके से जुड़े हैं। मुंबई से गोवा का हवाई किराया दो से तीन हजार रूपये के बीच बैठता है तो फिर भला इतना ही पैसा खर्च करके कोई नौ घण्टे ट्रेन में क्यों बितायेगा?

तेजस एक्सप्रेस को मुंबई और गोवा के बीच चलना भी नहीं था। इसका पहला रूट निर्धारित हुआ था दिल्ली से लखनऊ जो कि ट्रेन के लिए स्वर्णिम रूट कहा जाता है। लेकिन संभवत: सुरेश प्रभू इसे गोवा मुंबई रूट पर ले गये और इसका रूट, टाइम टेबल, किराया सब इतना अव्यावहारिक रखा गया कि तेजस को चक्कर आ गया। भारत में बुलेट ट्रेन की खबरों के बीच तेजस के असफल होने की खबर निराश करनेवाली है जो यह भी बताती है कि अगर ट्रेनों के साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया तो अच्छी से अच्छी योजना भी असफल हो जाती है। ठीक तेजस ट्रेन की तरह।

सुरेश प्रभू ने कई क्रांतिकारी योजनाएं लायीं जिनमें हमसफर और तेजस ट्रेन का संचालन भी शामिल है लेकिन उनकी किराया नीति बहुत अव्यावहारिक रही है। मसलन उन्होंने राजधानी, दूरंतो और शताब्दी ट्रेनों में डायनमिक प्राइसिंग प्रणाली लागू कर दिया था जिससे ट्रेन का किराया प्लेन से भी मंहगा बैठने लगा। नतीजा मुंबई से दिल्ली की राजधानी एक्सप्रेस जो कभी खाली नहीं रहती थी वह भी एक तिहाई से ज्यादा खाली सीटें लेकर यात्रा करने लगी। बाद में एक कमेटी बनाकर जांच की गयी तो पता चला कि ट्रेन के डॉयनमिक किराये की वजह से ऐसा हुआ है। डॉयनमिक किराया लगाकर रेलवे ने जितनी कमाई की उससे ज्यादा का का राजस्व गवां दिया। उम्मीद है नये रेलमंत्री ऐसे अव्यवाहरिक उपायों को दुरुस्त करेंगे ताकि रेलवे को भी घाटा न हो और मुसाफिर भी फायदे में रहे।

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