संप्रदाय में संप्रदाय स्वामी नारायण संप्रदाय

मंगलवार यानी २ नवंबर को पीएम मोदी जिस स्वामीनारायण संप्रदाय की हीरक जयंती में शामिल होने गांधीनगर गये थे, वह संप्रदाय अपने आप में एक तिलिस्म है। दिल्ली के लोग इस संप्रदाय के बारे में इतना जानते हैं कि अब दिल्ली में एक स्वामीनारायण मंदिर या अक्षरधाम मंदिर बन गया है जो धार्मिक महत्व से ज्यादा पर्यटन के आकर्षण की वजह से जाना जाता है। लेकिन कौन हैं ये स्वामी नारायण? ये दुनियाभर में फैले अक्षरधाम मंदिरों का रहस्य क्या है? यह स्वामीनारायण संप्रदाय गुजरात में इतना प्रभावी क्यों है जबकि देश के बाकी हिस्सों में इसकी कोई खास उपस्थिति नहीं है?

स्वामीनारायण संप्रदाय को हम आमतौर पर जिस रूप में जानते हैं वह इस संप्रदाय का पटेल संस्करण है क्योंकि स्वामीनारायण संप्रदाय के इस धड़े को गुजरात के पटेल समुदाय के लोग नियंत्रित करते हैं। इसकी स्थापना भी एक पटेल ने किया था और इसके प्रमुख आचार्य भी पटेल ही होते हैं। लेकिन पटेल ही स्वामीनारायण संप्रदाय के इकलौती संतान नहीं हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय आज पांच हिस्सों में बंटा हुआ है जिन्हें गादी कहा जाता है।

इस बंटवारे की शुरुआत होती है खुद स्वामीनारायण से। स्वामी नारायण अर्थात घनश्याम पांडे का जन्म अयोध्या के पास छपैया में हुआ था। घनश्याम पांडे के माता पिता का देहांत बहुत छोटी उम्र में हो गया था, सिर्फ ११ साल की अवस्था में। माता पिता के देहांत के बाद उन्होंने घर छोड़ दिया और सन्यास की तलाश में घर से निकल गये। अगले दस साल वो देशभर में यात्रा करते रहे और गुरु की तलाश करते रहे। घनश्याम पांडे अब नीलकण्ट वर्णी के नाम से जाने जाते थे। भारत और नेपाल घूमते हुए वो गुजरात पहुंचे जहां उद्धव संप्रदाय के स्वामी रामानंद से उन्होंने दीक्षा ली। २१ वर्ष की अवस्था में वो नीलकण्ठ वर्णी से स्वामी सहजानंद हो गये।

अपने गुरु के देहावसान के बाद वो उद्धव संप्रदाय के प्रमुख बने और उन्होंने स्वामी नारायण का मंत्र प्रदान करना शुरु किया। इसीलिए कालांतर में स्वामी सहजानंद स्वामीनारायण के नाम से जाने गये। और उनकी शिक्षाओं को माननेवाला संप्रदाय स्वामी नारायण संप्रदाय के नाम से जाना गया। स्वामीनारायण की मृत्यु बहुत कम उम्र में (सिर्फ ४९ साल) हो गयी थी। १८३० में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने संप्रदाय को दो गद्दियों में विभक्त कर दिया जिसमें एक नर नारायण गादी और दूसरी लक्ष्मी नारायण देव गादी। स्वामीनारायण ने व्यवस्था दी कि इन दोनों संप्रदायों के प्रमुख उनके परिवार का ही कोई व्यक्ति होगा इसलिए उन्होंने अपने भाई के दो बेटों को क्रमश: दोनों गद्दी सौंप दी। आज भी यह परम्परा कायम है और इन दोनों गादियों का प्रमुख आचार्य पांडे परिवार से ही नियुक्त होता है।

स्वामीनारायण संप्रदाय के लक्ष्मी नारायण गादी जिसे वडतल गादी भी कहा जाता है यहीं से एक सन्यासी ने दीक्षा ली जिनका नाम था डूंगर पटेल। डूंगर पटेल संस्कृत के बड़े विद्वान थे और शास्त्रों पर अच्छी पकड़ रखते थे। यही डूंगर पटेल जिन्हें शास्त्री जी महाराज के नाम से जाना जाता था उनका वडतल गादी से विवाद हुआ तो उन्होंने स्वामीनारायण संप्रदाय के भीतर एक नया संप्रदाय स्थापित कर दिया जिसे बोचसणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के नाम से जाना जाता है। शास्त्री जी महाराज चाहते थे कि स्वामीनारायण मंदिरों में राधा स्वामी या सीताराम की मूर्तियों की बजाय संप्रदाय के संस्थापक भगवान स्वामीनारायण की मूर्ति मुख्य रूप से स्थापित की जाए। यह स्वामीनारायण संप्रदाय में बहुत बड़ी बहस का मुद्दा बन गया और इस पर सहमति नहीं बन पायी और आखिर में शास्त्री जी महाराज वहां से अलग हटकर 1905 में बीएपीएस की स्थापना की और बोचसण में पहला मंदिर बनाया जिसमें अक्षर पुरुषोत्तम के रूप में स्वामीनारायण और गुणातीतानंद स्वामी की मूर्तियां स्थापित कीं।

इस तरह स्वामीनारायण संप्रदाय के तीन संप्रदाय हो गये। क्योंकि गुजरात में पटेल समुदाय ताकतवर समुदाय है इसलिए बीएपीएस की मान्यता बाकी मूल दो समुदायों से ज्यादा हो गयी जिसकी स्थापना खुद स्वामीनारायण ने किया था। आज स्वामीनारायण संप्रदाय के पांच संप्रदाय हैं और सब अपने अपने स्तर पर काम करते हैं। इसमें आज दुनिया में सर्वाधिक चर्चा पटेलों के प्रभुत्व वाले बीएपीएस की होती है जिसके लंदन और अमेरिका में भी मंदिर हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय के इस बीएपीएस विभाग को सबसे ज्यादा प्रचार मिला प्रमुख स्वामी जी के नेतृत्व में जिनका पिछले वर्ष देहावसान हो गया है। अब इसका नेतृत्व पटेल समुदाय के ही एक सन्यासी करते हैं।

लेकिन बीएपीएस के इस हीरक जयंती में मोदी के शामिल होने का सिर्फ धार्मिक ही नहीं राजनीतिक महत्व भी है। राजनीतिक रूप से हार्दिक पटेल का उभार और कांग्रेस के पाटीदारों की राजनीति में घुसपैठ से बीजेपी के लिए जो खतरा पैदा हो रहा था वह बहुत हद तक कम हो जाएगा। बीएपीएस के साथ मोदी का पुराना रिश्ता है और वो प्रमुख स्वामी के करीबी रहे हैं। जाहिर है, मोदी के वहां जाने से उन्हें इसका राजनीतिक फायदा भी मिलेगा और पटेल वोटबैंक को भी साधने में मदद मिलेगी।

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