आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास

८ नवंबर २०१६। भारतीय लोकतंत्र की एक काली रात जब भारत के “सनकी शासक” ने देश में आर्थिक आपातकाल लागू कर दिया। इस सनकी शासक को इस बात का कोई अंदाज नहीं था कि वह जो करने जा रहा है, उसका क्या परिणाम निकलेगा। वह इतना निश्चिंत था कि नोटबंदी की घोषणा करके अगले ही दिन जापान की यात्रा पर चला गया। यहां लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे और वहां यह “सनकी शासक” अनिवासी भारतीयों के सामने नोटबंदी पर चुटकुले सुनाकर ठहाके मार रहा था। अचानक से आई नोटबंदी की इस आफत से न जाने कितनी शादियां होने के पहले ही टूट गयीं, न जाने कितने कारोबार ठप हो गये, न जाने कितने लोग बेरोजगार हुए और न जाने कितने लोग लुट पिट गये। इस निर्णय के कारण करीब सौ लोग तो अपनी जान से हाथ धो बैठे। भारत का यह सनकी शासक जब तक भारत लौटकर आता और उसे वास्तविक स्थिति का अंदाज लगता तब तक हालात बेकाबू हो चुके थे।

इस आर्थिक आपातकाल के सालभर बाद भी सनकी शासक को यह अहसास नहीं हुआ कि यह एक व्यर्थ की कवायद थी जिसने एक चूहे को पकड़ने के लिए पहाड़ खोद डाला था लेकिन वह चूहा भी हाथ नहीं आया था। लेकिन सनकी शासक ने फैसला किया कि वह अपनी गलती स्वीकार करने की बजाय नोटबंदी के अपने षण्यंत्र को सेलिब्रेट करेगा। उसने और उस शासक की पार्टी ने ८ नवंबर २०१७ को आर्थिक आपातकाल की पहली बरसी पर यही किया। लेकिन ठीक उसी दिन देश की राजधानी से सटे गुरुगांव में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम घटित हुआ। सीबीआई ने गुरुगांव के रेयॉन मर्डर मामले में उसी स्कूल में पढ़नेवाले एक छात्र को गिरफ्तार किया जिस पर आरोप है कि उसने प्रद्युम्न की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि वह स्कूल में छुट्टी करवाना चाहता था। इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि एक बच्चे ने दूसरे बच्चे की हत्या कर दी। बल्कि महत्वपूर्ण पहलू दूसरा है और वह शासन प्रशासन से जुड़ा हुआ है।

प्रद्युम्न मर्डर मामले में हरियाणा पुलिस पहले ही एक बस कंडक्टर को गिरफ्तार कर चुकी थी और उसने कथित तौर पर उस कंडक्टर का अपराध भी सिद्ध कर दिया था। अगर इस मामले की सीबीआई जांच न होती तो अदालत में हरियाणा पुलिस एक निर्दोष व्यक्ति को अपराधी भी साबित कर देती और अदालत से सजा भी दिला देती। हरियाणा पुलिस के लिए यह कौन सी बड़ी बात थी? हमारे देश की पुलिस तो ऐसे कारनामों के लिए ही जानी जाती है इसलिए इस देश में लोग डकैतों और अपराधियों से नहीं बल्कि पुलिस से ज्यादा डरते हैं।

देश की भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था काम करने का यह वह पहला क्षेत्र है जहां सनकी शासक को सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत थी। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद नरेन्द्र मोदी ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। पुलिस पहले की ही तरह आतंक पैदा करती रही और नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों की बूटी सुंघाकर लोगों को भ्रमित करते रहे। मोदी सरकार अगर पुलिस सुधार की दिशा में पहल करती तो हो सकता है प्रद्युम्न मर्डर केस में उनकी ही पार्टी की सरकार की इस तरह किरकिरी न होती। आज भारत के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकार है और अगर वो पुलिस सुधार की पहल करते तो ज्यादा से ज्यादा राज्यों से उन्हें समर्थन मिल जाता। लेकिन या तो मोदी को पता ही नहीं है कि उन्हें करना क्या है, या फिर वो जानबूझकर कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दे को छूना नहीं चाहते ताकि अपने मूल एजेण्डे को पूरी तरह से लागू कर सकें।

ऐसा ही कुछ भ्रष्टाचार का मामला है। मोदी खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा योद्धा बताते हैं लेकिन उन्होंने बड़ी चालाकी से भ्रष्टाचार की परिभाषा ही बदल दी है। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों और बड़े पूंजीपतियों को भ्रष्टाचार मुक्त घोषित करते हुए आम आदमी को करप्ट घोषित कर दिया है। उनकी नोटबंदी की मुहिम इसी आम आदमी को ध्यान में रखकर की गयी थी जो अपना अधिकतर कारोबार कैश में करता है। ऐसे छोटे, मझोले कारोबारियों को मोदी ने देश का सबसे बड़ा काला कारोबारी घोषित कर दिया जो अपने कारोबार में कुछ लाख या करोड़ नकद में लेन देन कर लेते थे। जबकि दूसरी तरफ टैक्स हैवेन के जरिए काले धन को सफेद करनेवालों के खिलाफ खुलासे हो रहे हैं लेकिन मोदी सरकार ने अब तक एक भी आरोपी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं है।

इसी तरह देश में भ्रष्टाचार का मामला है। भारत की गिनती एशिया के सबसे भ्रष्ट देश के रूप में होती है। लेकिन भ्रष्टाचार की जननी नौकरशाही पर किसी भी प्रकार का अंकुश लगाने की बजाय मोदी ने उसे खुली छूट दे रखी है। मोदी मानते हैं कि नौकरशाही को अपने साथ रखकर वो अपनी योजनाएं लागू करवा लेंगे इसलिए उन्होंने मंत्रियों से ज्यादा नौकरशाहों को ताकत दे रखी है। नोटबंदी के वक्त भी नौकरशाहों का काला धन सफेद हो जाए इसके लिए उन्हें पूरा मौका दिया गया कि वो पुराने नोट बैंक में जमा कराएंगे तो उनसे यह नहीं पूछा जाएगा कि यह नकदी उनके पास कहां से आयी थी। नौकरशाहों को इससे ज्यादा और क्या चाहिए था? मोदी की पहली प्राथमिकता ये होनी चाहिए थी कि वो पुलिस और नौकरशाही में सुधार करते ताकि भ्रष्टाचार में कमी आती लेकिन उन्होंने ये दो काम करने की बजाय आम आदमी, छोटे मझोले कारोबारियों को ही भ्रष्ट बताना शुरू कर दिया।

नोटबंदी हो या जीएसटी मोदी के निशाने पर इस देश का छोटा और मझोला कारोबारी तथा आम आदमी ही है। जिस आम आदमी के खाते में पंद्रह लाख डालने का वादा करके मोदी ने चुनाव जीता था उसको ही उन्होंने सबसे ज्यादा परेशान किया है। फिर भी उस आम आदमी का भरोसा अभी पूरी तरह से मोदी पर से टूटा नहीं है। मोदी उसके मन में यह भ्रम बनाये रखने में अब तक कामयाब हैं कि एक दिन वो उसका भला करेंगे। लेकिन मोदी के रहते शायद वो दिन कभी नहीं आयेगा।

मोदी से अगर कोई सवाल पूछे कि क्या वो जो कर रहे हैं वही करने के लिए चुनाव जीतकर आये थे? मोदी जवाब दें न दें लेकिन जिसने भी मोदी का चुनाव देखा सुना है वह यही कहेगा कि नहीं। मोदी ने जिन समस्याओं को देश की विकराल समस्या बताया था और उनकी पार्टी जिन समस्याओं के समाधान के लिए पूर्ण बहुमत खोज रही थी, वो समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। मोदी सरकार की तरफ से उन समस्याओं के समाधान की तरफ एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया गया। वह शायद इसलिए कि अगर उन समस्याओं का समाधान कर दिया तो फिर लोग उन्हें वोट क्यों देंगे?

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