कट्टरपंथी इस्लाम का नया खादिम

साल भर पहले की बात है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वॉयरल हुआ जिसमें एक मौलना हिन्दुओं की तुलना शौचालय से कर रहा था। इस मौलाना का नाम था खादिम हुसैन रिजवी। खादिम हुसैन रिजवी पाकिस्तानी पंजाब का रहनेवाला है और उसने हिन्दुओं को शौचालय इसलिए कहा था क्योंकि नवाज शरीफ ने कराची में दीवाली मिलन के कार्यक्रम में हिन्दुओं को भाई कह दिया था और ये भी हम कौन होते हैं जन्नत और दोजख के फैसले करनेवाले। यह बात खादिम रिजवी को इतनी बुरी लगी कि उसने नवाज शरीफ को भी गालियां दी और हिन्दुओं को भी।

यह पहला मौका था जब खादिम हुसैन रिजवी चर्चा में आया। लेकिन सालभर बाद ही वह एक और वजह से चर्चा में आया। उसने नवाज शरीफ के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा और उसकी पार्टी तीसरे नंबर पर रही। अब पूरे पाकिस्तान के लिए रिजवी चर्चा का विषय बन गया। यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी जब एक अनजान सी राजनीतिक पार्टी ने नवाज शरीफ के परिवार को लाहौर में ही चुनौती दे दी थी। लाहौर का ही रहनेवाला हाफिद सईद भी खादिम रिजवी की पार्टी से पीछे रह गयी जिसका मतलब था कि कट्टरपंथी दुनिया खादिम रिजवी हाफिज सईद से ज्यादा स्वीकार्य हो चला था।

पाकिस्तान में उसकी स्वीकार्यता और बढ़ती लोकप्रियता का कारण है। खादिम हुसैन रिजवी सुन्नी इस्लाम के बरेलवी फिरके से संबंध रखता है। बरेलवी फिरका पाकिस्तान में ही नहीं भारत में भी सबसे बड़ा समूह है। एक अंदाज के मुताबिक पाकिस्तान की ६० प्रतिशत से ज्यादा आबादी बरेलवी है। जबकि पाकिस्तान की सियासत पर देओबंदी सुन्नी राज करते हैं जो कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हैं। ऐसे में खादिम हुसैन रिजवी का औचक उभार एक तरह से बरेलवी मुस्लिमों का मजहबी उभार है।

खादिम हुसैन रिजवी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत एक ऐसे मुद्दे से की जो किसी भी मुसलमान के लिए बहुत संवेदनशील होता है। लाहौर में उनके गनर मुमताज कादरी द्वारा पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को गोली मार दी थी। मुमताज कादरी का कहना था नबी निन्दा कानून का विरोध करके सलमान तासीर ने पैगंबर और इस्लाम की तौहीन की है इसलिए उसने गोली मारकर इस्लामिक कायदे से उसे सजा दे दी। सलमान तासीर की हत्या के आरोप में मुमताज कादरी को फांसी की सजा हुई और यहीं से खादिम रिवजी के राजनीति की शुरुआत भी होती है। खादिम रिजवी ने मुमताज कादरी की फांसी को सरकार और न्यायालय का अपराध मानते हुए पाकिस्तान में नये राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत की जिसको उसने नाम दिया लब्बैक या रसूल अल्लाह।

खादिम हुसैन रिजवी अल्लामा इकबाल को अपना आदर्श मानता है और पाकिस्तान में सच्चे इस्लाम का शासन लाना चाहता है जहां नबी निंदा करनेवाले को बिना किसी सुनवाई गोली मारी जा सके। खादिम हुसैन रिजवी पाकिस्तान में यह कोई नयी बात नहीं कर रहा। देओबंंदी मुसलमान लंबे समय से ऐसी कट्टरता का समर्थन कर रहा है। नया ये है कि पहली बार उदार कहे जानेवाले बरेलवी समुदाय से कोई मौलवी कट्टरता की ऐसी बात कर रहा है जिसे देओबंदी और बहावी इसलिए काफिर कहता है क्योंकि वह मजारों की पूजा करता है। बरेलवी समुदाय भारत और पाकिस्तान दोनों जगह उदार मुसलमान के तौर पर ही पहचाना जाता है लेकिन पहली बार पाकिस्तान में बरेलवी मुसलमान कट्टरता की तरफ आगे बढता दिख रहा है।

पाकिस्तान में खादिम हुसैन रिजवी का यह उभार देओबंदी और बरेलवी के झगड़े तो बढ़ायेगा ही लेकिन इस कट्टरता से भारत का बरेलवी मुसलमान भी बच नहीं पायेगा। रिजवी की योजना है कि वह अगले साल पाकिस्तान में होनेवाले आम चुनाव में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेगा। इसलिए वह अभी से अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ा रहा है। फिलहाल वह अपने समर्थकों के साथ इस्लामाबाद तक जानेवाले रास्ते को जाम करके बैठा है। उसकी मांग है कि पाकिस्तान के कानून मंत्री इस्तीफा दें क्योंकि उनकी वजह से खत्मे नबूवत (मोहम्मद को आखिरी पैगंबर मानने की जिद्द) खतरे में पड़ गयी है। खादिम हुसैन रिजवी की इस मांग से जहां वह कट्टरपंथियों की आंख का तारा बन रहा है वहीं वह पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिन्दुओं और अहमदियों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है।

लेकिन असली खतरे की घंटी है खादिम हुसैन रिजवी का बरेलवी होना। अगर पाकिस्तान में खादिम हुसैन का राजनीतिक सिक्का चलता है तो बरेलवी समुदाय अपने भीतर कट्टरता के उभार को रोक नहीं पायेगा। जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए चिंता की बात होगी।

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