साड्डे नाल रहोगे तो स्मोग करोगे

स्मोक करनेवाला समुदाय स्मोग से ऐसा घबराया कि दस दिन तक दिल्ली में अफरा तफरी मची रही। खूब हो हल्ला मचा। सरकारें इधर से ऊधर नाचती रहीं। पर्यावरण की अदालत बंद कमरे में बैठकर फरमान सुनाती रही लेकिन इस हायतौबा से न कुछ होना था, न कुछ हुआ। मौसम चक्र ने अपने तरीके से धुंध साफ किया और अगले साल फिर से आने का अघोषित वादा करके विदा हो गया। सवाल ये है कि ये स्मोग नामक महामारी अचानक से कहां से आ गयी?

स्मोग हमारे विकास की पैदावार है। पंजाब और हरियाणा में जिस कृषि क्रांति को अंजाम दिया गया उसी की जायज औलाद। हरित क्रांति का ऐसा रक्तबीज जो मरने का नाम नहीं ले रहा और साल दर साल विकराल होता जा रहा है। इसकी शुरुआत होती है खेती के मशीनीकरण से। पंजाब में खेती में केमिकल फर्टिलाइजर ही नहीं मशीनों का भी बहुत अंधाधुंध और मूर्खतापूर्ण प्रयोग हुआ है। इसी प्रयोग का नतीजा है पंजाब में धान की खेती। पंजाब में चावल प्रमुख खाद्य नहीं है फिर भी पंजाब सबसे ज्यादा चावल पैदा करता है। क्यों पैदा करता है? ताकि वह चावल का व्यापार कर सके। क्योंकि पंजाब में खेती सबसे बड़ा व्यापार है इसलिए वहां उत्पादन खाने के लिए नहीं बाजार में बेचने के लिए किया जाता है।

हम सब इस बात पर बहुत गर्व भी करते हैं कि पंजाब पूरे देश को भोजन कराता है लेकिन इसी गर्व में गर्त में जाने की सीढियां भी छिपी है। पंजाब जो कि मुख्य रूप से गेहूं उत्पादक प्रदेश था उसने गेहूं की कटाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल शुरु किया। ये मशीनें उन देशों से आई थीं जहां खेतों का आकार एकड़ या हेक्टेयर में नहीं बल्कि किलोमीटर में होती है। ये मशीनें बिनावजह नकल करके लायी गयी थीं ताकि खुद को उन्नत प्रदेश घोषित कर सकें। गेहूं की कटाई तक तो इन मशीनों ने पर्यावरण का कोई संकट पैदा नहीं किया लेकिन इसके बाद हमारा पंजाबी दिमाग सक्रिय हो गया। जो मशीनें गेहूं काटने के लिए बनायी गयीं थी उसी से पंजाबियों ने धान काटना शुरु कर दिया। ये मशीनें इस तरह से बनाई गयी है कि पौधों को जड़ से नहीं काटतीं बल्कि उनकी बालियों को अलग कर लेती हैं और बाकी पौधा खेत में ही छोड़ देती हैं।

गेहूं के पौधे में और धान के पौधे में एक बुनियादी अंदर होता है। कटाई के वक्त गेहूं का पौधा सूख चुका होता है जबकि धान का पौधा हरा रहता है। इसलिए अगर गेहूं का पौधा मशीन से आधी कटाई भी की जाए तो बाकी बचे पौधे को निपटाने की जरूरत नहीं पड़ती। उसे खेत में जोत दिया जाता है और बारिश के साथ मिलकर वह जैविक खाद का काम करता है लेकिन धान के पौधे के साथ ऐसा करना संभव नहीं। एक तो वह हरा होता है और दूसरा वह आसानी से मिट्टी में गलता नहीं है। गेहूं की फसल के बाद तत्काल बारिश आती है जो पौधों को सड़ाने में मदद करती है लेकिन धान की कटाई के बाद किसान कटाई के बाद बच गये पौधोंं के सड़ने का इंतजार नहीं कर सकता। इसलिए वह उनमें आग लगा देता है।

यहां से समस्या की शुरुआत होती है। धान की कटाई ऐसे वक्त में होती है जब सर्द हवाओं का मैदान में आगमन होना शुरु होता है। इस तरफ धान की खेत में बचे पौधे जलाने का परिणाम ये होता है कि ठंडी हवाओं के दवाब में यह धुंआ आसमान में नहीं जा पाता है और वही स्मोग बनकर आसपास के इलाकों में फैल जाता है। इस स्मोग की चपेट में अब हर साल पाकिस्तान का पंजाब और भारतीय पंजाब हरियाणा समेत  दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी आने लगे हैं। इस स्मोग में निश्चित रूप से स्थानीय प्रदूषण भी एक अहम कारण है लेकिन असली समस्या पराली जलाने की ही है।

अब सवाल ये है कि इस समस्या का समाधान क्या है? जब तक पंजाब के किसान धान की खेती करेंगे वो पराली जलाना बंद नहीं करेंगे और समस्या हर साल इसी तरह बनी रहेगी। तो क्या पंजाब के किसानों को धान की खेती करने से रोक दिया जाए? रोका भले न जाए लेकिन उन्हें हतोत्साहित तो किया ही जाना चाहिए कि वो धान की खेती से खुद को अलग करें। इसके लिए गेहूं काटनेवाले हार्वेस्टर का धान काटने के लिए इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी जानी चाहिए। धान काटने के जो छोटे हार्वेस्टर जापान और चीन में विकसित किये गये हैं उनके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि ये हार्वेस्टर धान के पौधे को जमीन से काटते हैं, आधे पर नहीं। सिर्फ हायतौबा मचाने या दिल्ली में बैठकर एनजीटी के आदेश पारित करवाने से धान से उपजी इस समस्या का कोई समाधान नहीं होगा।

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