ईरान सुलग रहा है, कहीं आग न लग जाए

तेहरान में हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन करती एक ईरानी युवती

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान जब यह कहते हैं कि ईरान के कारण सऊदी अरब में कट्टरता बढ़ी तो वह पूरा का पूरा मजाक भी नहीं होता। १९७९ में खोमैनी के उभार का असर पूरी इस्लामिक दुनिया पर हुआ और शिया हो कि सुन्नी महिलाओं के प्रति सख्ती और पाबंदी का नया दौर शुरु हुआ। पूरी दुनिया में मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब और निकाब की नये सिरे से पाबंदी खोमैनी की ही देन है।

लेकिन अब उसी ईरान में हिजाब के खिलाफ विद्रोह हो गया है। नयी उम्र की लड़कियों ने गुलामी का प्रतीक (Symbol of slavery) हिजाब पहनने से मना करना शुरु कर दिया है। उन्होंने हिजाब को सफेद कपड़े का प्रतीक बनाकर इसे कफन करार दिया है और स्त्री की मनोवैज्ञानिक “हत्या” करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ईरान में बीते दो तीन साल से हिजाब की अनिवार्यता के खिलाफ महिलाएं विद्रोह कर रही थीं और सार्वजनिक जगहों पर बिना हिजाब के बाहर निकल रही थीं। कुछ महिलाओं की गिरफ्तारी हुई तो यह प्रतिरोध और बढ़ गया।

लेकिन अब यह विरोध व्यापक होता जा रहा है। बीते तीन दिनों से ईरान के कई छोटे बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और कुछ जगहों पर हिंसक झड़पे भी हुई हैं। वह ईरान जिसने शाह राजवंश के खिलाफ इस्लामिक धर्मगुरु खोमैनी को अपना सर्वोच्च नेता स्वीकार किया था उसी ईरान में आज चार दशक के भीतर ही खोमैनी मुर्दाबाद के नारे लग रहे हैं। महिलाएं सड़कों पर निकल कर इस्लामिक शासन का विरोध कर रही हैं और अब पुरुषों ने भी उनका साथ देना शुरु कर दिया है।

प्रदर्शनकारी ईरान शासन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वो इस्लामिक शासन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। जैसा कि स्वाभाविक था अमेरिका ने उनकी आवाज का समर्थन किया है और ईरान को चेतावनी दिया है कि वह अपने नागरिकों के मानवाधिकारों की अनदेखी न करे क्योंकि दुनिया सब देख रही है। अमेरिका का यह दखल स्वाभाविक है। अगर अमेरिकी एजंसियां इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे सक्रिय हों तो भी कोई आश्चर्य नहीं। आखिर चार दशक पहले इसी ईरान में डेथ टू अमेरिका के नारे लगे थे। ईरान के आखिरी राजा अहमद रजा शाह पहलवी पर अमेरिका समर्थक होने का आरोप लगा था और आखिरकार शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा। ईरान की जनता ने शाह की जगह रोहिल्ला खोमैनी को अपना सर्वोच्च नेता स्वीकार कर लिया जिन्होंने ईरान को इस्लामिक उसूलों के मुताबिक चलाने का निर्णय लिया।

लेकिन ईरान की जनता ने शाह के शासन में जिस तरह की आजादी हासिल कर ली थी, वह उन्माद के उतर जाने के बाद शायद फिर से याद आने लगा और जिन इस्लामिक कानूनों को उन्होंने आगे बढ़कर अपनाया था आज उन्हीं से आजादी मांग रहे हैं। हालांकि ईरान की रौहानी सरकार द्वारा कोशिश की जा रही है इस विरोध की आग को यहीं दबा दिया जाए इसलिए ईरान पुलिस महमके ने ऐलान किया है कि वह बिना हिजाब वाली किसी लड़की को गिरफ्तार नहीं करेगा बल्कि ऐसी लड़कियों को ट्रेनिंग दी जाएगी कि उन्हें हिजाब क्यों पहनना चाहिए। लेकिन ऐसे उपायों के लिए अब शायद देर हो गयी है। ईरान में जो आग सुलग रही है अगर वह भड़की तो ईरान अरब पतझड़ का गिरनेवाला आखिरी पत्ता बन जाएगा।

One thought on “ईरान सुलग रहा है, कहीं आग न लग जाए

  1. ईरान या सउदी अरब, इस्लामी जगत के इन दोनों केंद्रों में होने वाली किसी भी हलचल का असर व्यापक होता है।
    कामना है कि ये हलचल असरदार हो। आमीन

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