मराठा दर्प को चुनौती देता भीमा कोरेगांव

पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कही जाती है। महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी होने का मतलब है मराठा संस्कृति की राजधानी। महाराष्ट्र में मराठा संस्कृति विशिष्ट हिन्दुत्व विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है जिसने कभी किसी विरोधी से हार नहीं मानी। छत्रपति शिवाजी महाराज या फिर छत्रपति शंभाजी महाराज। मराठा संस्कृति की राज रियासत का यह गौरव समय बीतने के साथ एक दंभ में परिवर्तित होता गया। इसी दंभ का परिणाम है भीमा कोरेगांव युद्ध की वो घटना जिसमें मराठा शासकों ने अंग्रेजों से लड़ाई में अपने ही समाज के महार जाति के लोगों का घोर अपमान किया जिसकी आग में आज महाराष्ट्र जल उठा है और दलित पिछड़े वर्ग के लोग अपने “सम्मान” की रक्षा के लिए सड़क पर उतर आये हैं। यह सम्मान क्या है?

इस सम्मान की कहानी शुरु होती है दो सौ साल पहले जब १ जनवरी १८१८ को मराठा सैनिकों और ब्रिटिश सैनिकों के बीच पुणे के पास कोरेगांव में जंग हुई थी। पेशवा बाजीराव की अगुवाई में मराठा सैनिक अंग्रेजों से लोहा लेने को तैयार थे, उसी वक्त ५०० महार सैनिकों ने अपनी मातृभूमि के लिए अंग्रेजों से लड़ने में मदद का प्रस्ताव किया। वो मराठा सैनिकों के साथ मिलकर ब्रिटिश सैनिकों से लड़ना चाहते थे लेकिन मराठों ने उन अछूतों को सेना में शामिल होने से रोक दिया। इससे महार आहत हुए और उन्होंने ब्रिटिश सेना की तरफ से लड़ने का प्रस्ताव भेजा। ईस्ट इंडिया कंपनी ने तत्काल महार सैनिकों को अपनी सेना में शामिल कर लिया।

युद्ध हुआ और युद्ध में महार सैनिक मराठा सैनिकों के खिलाफ लड़े और युद्ध में ५०० महार सैनिकों वाली ब्रिटिश फौज की जीत हुई। पेशवा परास्त हुए और इसी के साथ महाराष्ट्र में मराठा शासन का अंत भी हो गया। १८५१ में ब्रिटिश हुकूमत ने मारे गये सैनिकों की याद में भीमा कोरेगांव में एक स्मारक बनवा दिया।

१ जनवरी १९२७ को भीमराव अंबेडकर ने यहां महार सैनिकों की याद में एक आयोजन शुरु किया जो हर साल १ जनवरी को मनाया जाता है। इस साल भी महार सैनिकों की याद में यह आयोजन किया गया था लेकिन खबर है कि कुछ मराठी समुदाय से कुछ लोगों को यह बात पसंद नहीं आयी और उन्होंने इसका विरोध किया। जाहिर है, इसकी प्रतिक्रिया हुई महाराष्ट्र में मराठा दलित संघर्ष शुरु हो गया। देखते ही देखते चौबीस घण्टे में दोनों पक्ष मराठा और दलित समाज के लोग सड़कों पर उतर आये और पुणे के बाद मुंबई में हिंसक प्रदर्शन और झड़पें शुरु हो गयी हैं।

लेकिन मराठा क्षत्रप अगर उस वक्त सही नहीं थे तो आज भी सही नहीं कहे जा सकते। भारत का यह जातीय भेदभाव भारत के एकात्म भाव के खिलाफ है। होना तो यह चाहिए था कि मराठा समाज के लोग आज अतीत में पेशवा की गलतियों का प्रायश्चित करते और यह स्वीकार करते कि अतीत में जो हुआ वह गलत हुआ। लेकिन इसके उलट वो गलत को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। जहां तक महार समाज का सवाल है तो उन्हें भी यह समझना चाहिए कि जिन अंबेडकर ने वहां सम्मान समारोह आयोजित करना शुरु किया वही अंबेडकर स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं में से एक थे। यह संविधान उन्हीं ब्रिटिश शासकों के भारत से बाहर जाने के बाद बना जिनके लिए कभी महार सैनिकों ने जंग लड़ी थी। आज अगर अतीत के उस दुखदायी घटना में दलित समाज के लोग सम्मान खोजेंगे तो यह भीम भावना के ही खिलाफ जाएगा। क्या अंग्रेजों से आजादी के सत्तर साल बाद अंग्रेजों की जीत को सेलिब्रेट करना कहीं से स्वागतयोग्य कहा जाएगा?

अच्छा तो ये होगा कि मराठा और दलित समाज के लोग दोनों ही अतीत से अपने आप को बाहर निकालें। जो हुआ अगर वो दुखद था तो आज २०० साल बाद जो हो रहा है वह कहीं से सुखद नहीं कहा जा सकता।

4 thoughts on “मराठा दर्प को चुनौती देता भीमा कोरेगांव

  1. संजय भाई ये दलित आंदोलन की नई करवट है जो तिलक तराजू तलवार इनको मारो जूते चार से भी आगे जाने वाली है।ये हिंसा और पिटाई का सहारा लेंगे।ये खुद को हिन्दू नहीं मानते अपने पूर्वजों को ग़ाली तक देते है। ये इससे भी और आगे जाएंगे भविष्य में अगर कोई ऐसी खबर आती है कि “स्वयं को हिन्दू कहने पर दलित की हुई पिटाई” तो समझ लेना उसके पीछे इन्ही भीमवादियों का हाथ है।इस प्रकार के कार्यक्रम इनके कार्यकर्ताओ के लिए अभ्यास वर्ग होता है दलितों को अतीत का हवाला देकर भड़काया जाता है उस पर आग में घी का काम करते है हिन्दूवादी संघटन जिसके नेता तर्क का सहारा न लेकर सबक सिखाने की बात करते है। बेहतर यही होगा की अकादमिक स्तर पर इसका हल ढूंढा जाये। नहीं तो परिणाम बहुत ही बुरे हो सकते है…..

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  2. सुन्दर, ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए धन्यवाद, संजय सर

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