कांग्रेस कल भी शाह बानो के खिलाफ थी, कांग्रेस आज भी शाह बानो के खिलाफ है

अगर नियति ने यही लिख दिया है कि अब बीजेपी अनंतकाल तक देश पर राज करे तो इसे भला कौन रोक सकता है? राज्यसभा में जिस तरह से कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम मर्दों का बचाव कर रही है क्या उसे देश नहीं देख रहा होगा? क्या वो मुस्लिम महिलाएं इस नाटक को नहीं देख रही होंगी कि उनके सिर पर लटकनेवाली तलवार को कांग्रेस और उसके समर्थक दल किस तरह लटकाकर रखना चाहते हैं?

मामला मुस्लिम महिलाओं का नहीं है। मामला है महिलाओं का। ऐसी कोई कुरीति किसी भी धर्म में होती तो सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि उसे दूर करे। कांग्रेस ने जानबूझकर कभी ऐसी कोशिश नहीं किया क्योंकि कांग्रेस कभी नहीं चाहती थी कि मुस्लिम मुख्यधारा में आये। उसकी रणनीति हमेशा से यही रही है कि मुसलमानों को तीन तलाक और चार शादी तक सीमित रखो। इनको दाढ़ी बुर्का मदरसा और आतंकवाद दे दो, ये खुश रहेंगे और खुशी खुशी वोट करते रहेंगे। जेहनी तौर पर यह एक कूढ़ मगज और पिछड़ा हुआ समाज है। समय के साथ बदलने की कूव्वत इसमें नहीं है। अगर कोई कोशिश भी करे तो यह एक पिछड़ा समुदाय है कि उसी के खिलाफ खड़ा हो जाता है। इतिहास उठाकर देख लीजिए मुसलमानों ने हर सुधारवादी आवाज को काफिर मुर्तद करार देकर खारिज कर दिया है। वह अलीगढ़ विश्वविद्यालय भी बुर्के दाढ़ी वाली युनिवर्सिटी बनकर रह गयी जिसे खुद उनके समाज से सर सैय्यद अहमद ने शुरु करवाया था ताकि मुसलमानों को अच्छी शिक्षा मिल सके।

बीजेपी अभी इस बात को नहीं जानती। तीन तलाक के मामले में उसका प्रयास ईमानदार है। निश्चित रूप से इससे उसे वोटों का फायदा होगा और मुस्लिम महिलाओं का एक बड़ा वर्ग चोरी छिपे उसको वोट भी करेगा लेकिन मामला सिर्फ दो तीन परसेन्ट वोट का नहीं है। मामला है मुसलमानों के दृष्टिकोण का। जब वो खुद तीन तलाक और चार शादी को सामाजिक बुराई मानते हैं तो फिर वो तीन तलाक पर बननेवाले कानून के खिलाफ क्यों खड़े हैं? क्या सिर्फ इसलिए कि यह प्रयास एक ऐसा दल कर रहा है जिसे वो इस्लाम का दुश्मन मानते हैं? या फिर इसलिए कि मुसलमान अपने निजी मामलों में किसी प्रकार के कानूनी दखल को बर्दाश्त ही नहीं कर सकता?

सच यही है कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो सातवीं सदी के बाहर नहीं आना चाहता। उनको डर लगता है कि अगर वो इससे बाहर जाने की कोशिश करेंगे तो इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा। वो अपने समाज को मौलवी मदरसों और काजी के बाहर ले ही नहीं जाना चाहते। उन्हें वहीं रहना है। फिर ये शिकायत भी करते रहना है कि मुसलमान पिछड़े हुए हैं। उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा है। हकीकत तो ये है कि ये शरीयत वाली व्यवस्था ही मुसलमानों के पिछड़ेपन का असली कारण है। सच्चे इस्लाम की खोज में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी बीमार है। महिलाओं की दुर्दशा है और आजादी के सत्तर साल बाद भी स्कूली शिक्षा पर मदरसा शिक्षा हावी है। तीन तलवार के साये में जी रहीं मुस्लिम महिलाओं में अशिक्षा और पिछड़ेपन का प्रतिशत बाकी किसी भी समाज से ज्यादा है। भयावह है।

कमोबेश ऐसी ही कट्टरता या इससे ज्यादा पाकिस्तान में है। अपनी मान्यताओं के प्रति इस कट्टरता का नतीजा क्या निकलता है? नतीजा ये निकलता है काजी के हलाला का कारोबार चलता है। नतीजा ये निकलता है आज मुख्यधारा के समाज से मुस्लिम महिलाएं नदारद हैं। नतीजा ये निकलता है कि महिलाएं मर्दों के रहमो करम पर जीवन जीती हैं। खान अब्दुल गफ्फार खान कहते थे कि किसी समाज की तरक्की को देखना है तो उस समाज में महिलाओं की स्थिति देखो। अगर महिलाओं की दशा दयनीय है तो निश्चित रूप से वह समाज पिछड़ा हुआ है। खुद पाकिस्तान ने कभी सीमांत गांधी की बात नहीं सुनी। इसलिए आज पाकिस्तान पतन के कगार पर खड़ा है। भारत के मुसलमान आज पाकिस्तानी मुसलमानों से बहुत बेहतर स्थिति में हैं तो उसरा कारण बहुसंख्यक हिन्दु समुदाय है जो अपने साथ साथ उनकी तरक्की भी सुनिश्चित कर रहा है। वरना सच्चा इस्लाम ऊंट की कुर्बानी से शुरु होकर दुंबे की सवारी पर सिमट जाता है। इससे ज्यादा उस समुदाय को कुछ चाहिए भी नहीं। अभी बीजेपी को यह बात समझ में नहीं आ रही है इसलिए वह तीन तलाक पर कठोरता से खड़ी है। जिस दिन उसे यह बात समझ आ जाएगी वह भी उन्हीं मदरसा सिस्टम को मजबूत करेगी जहां से इस्लाम के रखवाले पैदा होते हैं।

लेकिन आज जो वह कर रही है उससे भी वह घाटे में नहीं रहेगी। तीन तलाक पर उसका कठोर रुख उसे राजनीतिक फायदा पहुंचाएगा इसमें कोई दो राय नहीं। आज बीजेपी ऐसी स्थिति में है कि बिल का विरोध होगा तो भी उसे फायदा होगा और समर्थन मिलेगा तो फायदा तो होगा ही। संकट है कांग्रेस के साथ। वह विधेयक के साथ जाती है तो मुस्लिम मर्द वोट बैंक नाराज होता है और विधेयक का विरोध करती है तो मुस्लिम महिलाओं के बीच वह विलेन बन जाएगी। लेकिन एक बात जो शीशे की तरह साफ है वह यह कि कांग्रेस कल भी (१९८६) शाह बानों के साथ नहीं थी, वह आज भी (२०१८) शाह बानों के साथ नहीं है।

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