मदरसा और आतंकवाद

मदरसा मतलब विद्यालय। स्कूल। एक ऐसी जगह जहां बच्चों को तालीम दी जाती है। अगर बात इतनी सी हो तो फिर मदरसा इतना खौफनाक शब्द क्योंकर हो गया है? क्यों मदरसे का नाम आते ही इसको आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है? यहां ऐसा क्या सिखाया पढ़ाया जाता है कि यहां पढ़ने वाले बच्चे और नौजवान दुनिया के लिए खतरा नजर आते हैं? आखिर क्या कारण है कि शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी को कहना पड़ा कि मदरसों में आतंकवाद पढ़ाया जाता है?

शुरुआत करते हैं जावेद अहमद घामड़ी के एक बयान से जो कुछ साल पहले उन्होंने अमेरिका में दिया था। पाकिस्तान के उदारवादी मुस्लिम मौलाना कहे जाने वाले जावेद अहमद घामड़ी से जब मदरसों के बारे में पूछा गया तब उन्होंने कहा था –

“इस वक्त जो दहशतगर्दी मुसलमानों की तरफ से हो रही है उसके मूल में मजहबी फिक्र और मजहबी सोच है जो मुसलमानों को मदरसों में पढ़ाया जा रहा है, उनकी सियासी तहरीक में सिखाया जा रहा है। इसमें चार बातें हर मदरसा पढ़ाता है। वो आपके सामने न सिखाये तो आपके पीछे स्वाभाविक तौर पर सिखाता है। वो चार चीजें क्या हैं उसे सुन लीजिए।

पहली चीज, अगर दुनिया में कहीं शिर्क (मूर्तिपूजा) होगा, कुफ्र होगा या इर्तिदाद होगा (मुसलमान इस्लाम छोड़कर जायेगा) तो उसकी सजा मौत होगी और वह सजा हमें नाफिज करने का हक है।

(मतलब भारत में मदरसे में पढ़नेवाला हर बच्चा मूर्तिपूजक हिन्दुओं को अपना दुश्मन मानता है जिसे खत्म करना उसकी दीनी जिम्मेदारी है।)

दूसरी चीज यह सिखाई जाती है कि दुनिया में गैर मुस्लिम सिर्फ महकूम (प्रजा) होने के लिए पैदा किये गये हैं। मुसलमानों के सिवा किसी को दुनिया पर हुकूमत का हक नहीं है। गैर मुस्लिमों की हर हुकूमत एक नाजायज हुकूमत है। जब हमारे पास ताकत होगी। हम उसको उलट देंगे।

(यहां भी यह काबिले गौर है कि भारत में लोकतंत्र है और बहुसंख्यक हिन्दू ही कमोबेश सत्ता में रहते हैं। ऐसे में मदरसों में पढ़नेवाले बच्चे इस शिक्षा के साथ बड़े होते हैं कि उन्हें देश में हिन्दुओं का शासन खत्म करना है।)

तीसरी बात जो सिखाई जाती है वह यह कि दुनिया में मुसलमानों की एक ही हुकूमत होनी चाहिए जिसको खिलाफत कहते हैं।

(यह वही सोच है जिसने तालिबान और आइसिस पैदा किया।)

और चौथी बात यह जो लोकतंत्र है वह कुफ्र है उसके लिए इस्लाम में कोई जगह नहीं है।

(मतलब साफ है कि मदरसे में पढ़नेवाला हर बच्चा लोकतंत्र के खिलाफ खड़ा होनेवाला एक संभावित जिहादी होता है।)

ये चार बातें हमारी मजहबी फिक्र की बुनियाद हैं। मुझे ये बताइये अगर ये आपको सिखा दी जाएं तो आप क्या करेंगे?”

वही करेंगे जो मदरसों से निकले नौजवान करते हैं। आतंकी घटनाओं को अंजाम देंगे। इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि मदरसों में जानेवाला हर बच्चा आतंतवादी घटनाओं को अंजाम देने लगता है लेकिन यहां ये भी सच है कि दुनिया में जहां कहीं भी इस्लामिक आतंकवाद की फसल तैयार की गयी है उसके लिए मदरसों की जमीन का ही इस्तेमाल किया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि मदरसे ही हैं जो बच्चों को जिहाद का बुनियादी पाठ पढ़ाते हैं। वही पाठ जिसकी तरफ घामड़ी इशारा कर रहे हैं।

घामड़ी जब यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आधुनिक इस्लामिक आतंतवाद की जड़ मदरसों में छिपी है तो कुछ गलत भी नहीं कहते। यह पाकिस्तान की एक ऐसी हकीकत है जिससे आज पाकिस्तान भी इंकार नहीं कर रहा है। अफगानिस्तान पर जिहादियों के जरिए कब्जा करने का जो प्लान तैयार किया गया था उसके लिए आईएसआई ने एक मदरसे का ही इस्तेमाल किया था। उस मदरसे का नाम था दारुल उलूम हक्कानिया जो कि दारुल उलूम देओबंद के पाठ्यक्रम पर चलने वाला मदरसा है। यहीं के एक तालिब मुल्ला उमर को आईएसआई ने अमीर बनाकर उसके नेतृत्व में तालिबान तैयार किया था।

आज करीब दो दशक बाद पाकिस्तान की सेना भी ये मान रही है कि खुद पाकिस्तान जिस आतंकवाद का शिकार हो रहा है उसका कारण भी मदरसा ही है। इसलिए पाक फौज मदरसों को नियंत्रित करने की सलाह दे रही है। भारत के सेनाध्यक्ष ने भी कश्मीर में जारी आतंकवाद को रोकने के लिए मदरसों में दी जा रही शिक्षा पर नजर रखने की बात कही है। ये लोग तो अभी सिर्फ बात कर रहे हैं जबकि बांग्लादेश ने मदरसों के पाठ्यक्रम से जिहाद का पाठ ही निकाल दिया है। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो जानता है कि आतंकवाद का स्रोत कहां है, इसलिए उसने स्रोत को ही काटकर अलग कर दिया।

भारत में मदरसा शिक्षा का राजनीतिक तौर पर इतना बेजा इस्तेमाल किया गया है कि जिन मदरसों पर निगरानी रखने की जरूरत है उन्हें सरकार पैसा देकर पालती पोसती है। मसलन उत्तर प्रदेश में 7500 मदरसे चल रहे हैं। ये वो मदरसे हैं जिन्हें सरकार की मान्यता प्राप्त है। इनमें से 850 मदरसों को सरकार वित्तीय मदद करती है। हाल में योगी सरकार ने जब मदरसों से उनके डिटेल मांगे तो 46 मदरसे डिटेल देने को तैयार नहीं हुए। सरकार ने उनको दी जानेवाली मदद बंद कर दी। लेकिन मदरसों को सरकारी मदद चाहिए भी नहीं क्योंकि सरकार मदद करती है तो अपनी शर्तें भी थोपती है। ऐसे में वो मजहबी शिक्षा मन मुताबिक दे नहीं पाते। उन्हें कुरान, हदीस और अरबी के अलावा दूसरे विषय भी पढ़ाने पढ़ते हैं। यह संभवत: उन्हें मंजूर नहीं है कि अल्लाह की तालीम में किसी प्रकार का व्यवधान आये। इसीलिए मोदी सरकार ने आते ही जब मदरसा आधुनिकीकरण की बात की तो इस्लामिक संस्थानों ने ही विरोध कर दिया। जमात ए उलमा ए हिन्द के मौलाना मदनी ने कहा कि ये मदरसे हमने अपने खून पसीने से तैयार किया है, हम उनमें सरकार के किसी प्रकार के दखल को बर्दाश्त नहीं करेंगे।

मतलब, सुन्नी देओबंदी मुसलमान नहीं चाहता कि उनके मदरसों में सरकार की पहुंच हो। वह ऐसा क्यों नहीं चाहता? वह दीन की तालीम के नाम पर ऐसा क्या पढ़ा रहा है कि उसे सरकार की नजरों से छिपाकर रखना चाहती है? कट्टरपंथी देओबंदी विचारधारा जो कि बहावी विचारधारा से सबसे अधिक प्रभावित है, वही मदरसों का सबसे ज्यादा बचाव करती है। यह वही विचारधारा है जिसने मुल्ला उमर को पैदा किया। यह वही विचारधारा है जिसमें हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकवादी पलते बढ़ते हैं। पाकिस्तान आज सबसे अधिक इसी देओबंदी विचारधारा से है। आज पाकिस्तान में सबसे अधिक मदरसे इसी देओबंदी विचारधारा के हैं जिसकी गर्मी अब पाकिस्तान सरकार और फौज को भी परेशान कर रही है। सवाल ये है कि क्या भारत में इन देओबंदी मदरसों को बेखौफ और बिना निगरानी के चलने देना चाहिए। अगर हां तो फिर क्या गारंटी है कि आनेवाले कल में भारत की दशा पाकिस्तान जैसी नहीं हो जाएगी? याद रखिए पाकिस्तान में आतंकवाद की शुरुआत एक मदरसे से ही हुई थी।

One thought on “मदरसा और आतंकवाद

  1. निश्चय ही बेहद खतरनाक।
    अगर समय रहते मदरसों को काबू न किया गया, तो ये भारत के अस्तित्व पर खतरा बन जायेगा, यह तय है।

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