पकौड़ा इकोनॉमी

हाल में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीटीवी के साथ एक इंटरव्यू में रोजगार के सवाल पर कहा कि “अगर कोई आपके चैनल के बाहर पकौड़े बेचता है तो क्या उसे रोजगार नहीं कहा जाएगा?” यहां जब वो यह बात कह रहे थे तो यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी सरकार के प्रयासों से प्रत्यक्ष रोजगार के साथ साथ अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुआ है जो किसी सरकारी आंकड़े में दिखाई नहीं देता। तो क्या इसे सरकार की उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए कि वह एक ऐसी अर्थनीति लागू कर रही है जिससे अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हो रहा है।

अब उनकी बात पर कटाक्ष करते हुए कांग्रेस के नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि अगर पकौड़ा बेचना रोजगार है तो फिर भीख मांगने को भी रोजगार की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। चिदंबरम का बयान राजनीतिक है क्योंकि वित्त मंत्री रहते हुए वो भी उसी अर्थनीति को लागू कर रहे थे जिसे प्रधानमंत्री रहते हुए अब नरेन्द्र मोदी लागू कर रहे हैं। पीएम मोदी के कहने का आशय क्या है इसे चिदंबरम अच्छी तरह से समझते हैं, और अगर वो समझते हैं कि पीएम का संकेत किस तरफ है तो फिर उस पर सवाल उठाना सिर्फ राजनीतिक हमला ही कहा जाएगा।

भारत में पकौड़ा इकोनॉमी की शुरुआत आज से करीब तीन दशक पहले कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री नरसिंहराव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने मिलकर शुरु किया था। कहने के लिए इसे आर्थिक उदारीकरण और लिबरलाइजेशन जैसे भारी भरकम नाम दिये गये लेकिन हकीकत में यह पकौड़ा इकोनामी ही थी। संयोग से ही सही, पीएम मोदी के पकौड़ा संदेश के बहाने सत्ताइस साल बाद उस अर्थव्यवस्था का वास्तविक नामकरण हो गया है।

इस पकौड़ा इकोनॉमी की तहें बहुत गहरी नहीं हैं कि इसे समझना कोई मुश्किल काम हो। १९९० तक भारत में जिस समाजवादी अर्थव्यवस्था को जारी रखा गया उसके बहुत गंभीर नतीजे सामने आये। हालात यहां तक खराब हो गये कि तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को भारत का सोना गिरवी रखकर उधार लेना पड़ा। नरसिंहराव उसी के बाद प्रधानमंत्री बने और उन्होंने मनमोहन सिंह के साथ मिलकर देश की अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दी। बहुत उदार मन से उन्होंने देश के कारोबार में विदेशी कंपनियों के प्रवेश का फैसला ले लिया। अब तक भारत की अर्थव्यवस्था को “बाहरी” हमलों से बचाने के लिए कई तरह के उपाय किये गये थे ताकि विदेशी कंपनियां देश के कारोबार पर “कब्जा” न कर लें। इन दोनों नेताओं ने उदारता दिखाते हुए वो सारे उपाय खत्म करने शुरु कर दिये इसलिए इसे बहुत उदारता से उदारीकरण का नाम दिया गया।

उस दौर में कई स्वदेशी संरक्षण आंदोलन भी हुए जिन्होंने बताना शुरु किया कि कैसे विदेशी कंपनियों के भारत में प्रवेश से भारत के लोग तबाह हो जाएंगे। लेकिन उदारीकरण की आंधी इतनी तेज थी कि एक दशक के भीतर ही वो सारे आंदोलन हवा में उड़ गये और उदारीकरण पूरे वेग से भारत में पसरने लगा। नरसिंहराव के बाद जितने भी प्रधानमंत्री आये चाहे वो कांग्रेस के हों या बीजेपी के उन्होंने आंधी को तूफान बनाने का ही काम किया। अटल बिहारी वाजपेयी जब विपक्ष में थे तो एफडीआई को सबसे बड़ा खतरा बताते थे लेकिन वही अटल जी पीएम बने तो सभी प्रकार के मात्रात्मक प्रतिबंध खत्म कर दिये ताकि छोटे से छोटे कारोबार में बेरोक टोक विदेशी निवेश आ सके। परिणाम ये हुआ कि उस दौर में जिस उदारीकरण को देश के लिए खतरा बताया जा रहा था वही उदारीकरण देश के मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था बन गया। देश में विदेशी पूंजी के चमत्कार ने सोना गिरवी रखने वाले भारत सरकार के खजाने को सोने चांदी से भर दिया। कभी सोना गिरवी रखनेवाली भारत सरकार के पास आज ४०० अरब डॉलर का फारेक्स रिजर्व है और वह दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ आगे बढ़ रहा है।

लेकिन इसके बाद भी है यह पकौड़ा इकोनॉमी ही। इस अर्थव्यवस्था के दर्शन में उपभोक्तावाद है। इस पकौड़ा इकोनॉमी का ढांचा ऐसा है कि यह जहां लागू होता है वहां एक छोटा मध्यवर्ग और उस मध्यवर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक बहुत छोटा उत्पादक वर्ग तैयार करता है। यह अनुपात कैसा होता है उसे एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं कि भारत में इस वक्त ७३ प्रतिशत मिल्कियत पर १ प्रतिशत लोगों का कब्जा हो चुका है। मतलब एक प्रतिशत आबादी इतनी अमीर हो चुकी है कि वह दुनिया के अमीरों से टक्कर ले सकती है। इनके पास ये दौलत कहां से आयी? ये दौलत आयी है उत्पादन तंत्र पर उनके नियंत्रण से। मान लीजिए इस देश में लाखों लोग पत्थर काटकर मसाला पीसने की सील बनाते हैं। एक कंपनी आयी और उसने मिक्सी बना दी। तो वह धन जो अब तक लाखों गरीबों के पास जा रहा था वह सिमटकर दो चार कंपनियों के पास पहुंच गया और इस तरह देश में चार अरबपति पैदा हो गये जो सरकार को टैक्स भी देते हैं और उनकी समृद्धि प्रत्यक्ष रूप से दिखाई भी देती है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में वो पथरचट्टे कहां चले गये किसी को नहीं मालूम।

इस तरह समूचे उत्पादन तंत्र पर धीरे धीरे बड़ी कंपनियां अपना नियंत्रण कर रही हैं। वही मिल फैक्ट्री लगाकर उत्पादन कर रही हैं और उन्हीं के द्वारा जो रोजगार पैदा किया जा रहा है उसे ही सरकारें “रोजगार के नये अवसर” बताकर प्रचारित कर रही हैं। लेकिन इन “नये अवसरों” से कितने लोग अवसरविहीन हो रहे हैं ये सरकार नहीं बताती। सवाल ये है कि ये अवसर विहीन लोग कहां जाएं? पकौड़ा चाय समोसा बेचने के अलावा उनके सामने और कोई अवसर बचता भी नहीं है।

भारत में जो मध्य वर्ग पनप रहा है वह भी उन्हीं एक प्रतिशत उत्पादकों का दलाल या बिचौलिया है जो अमीरों के लिए पैदल सेना या घुड़सवार का काम करती है। यह मध्यवर्ग अमीरों से आदेश लेकर गरीबों को लूटता है फिर लूट के उस माल में अपनी हिस्सेदारी ले लेता है। भारत में मोटा अनुमान ये है कि यह वर्ग करीब ३० प्रतिशत बैठता है। तो फिर बाकी का ७० प्रतिशत?

यह ७० प्रतिशत उसी पकौड़ा समुदाय का हिस्सा है जो किसी तरह से अपना जीवन यापन कर लेता है। ठेला लगाकर। खोमचा खोलकर। रिक्शा ठेला चलाकर। असंगठित क्षेत्र की मजदूरी करके। चाय और पकौड़ा बेचकर। देश में इस वक्त सबसे ज्यादा जोर ढांचागत विकास पर है। हवाई मार्ग, जल मार्ग, थल मार्ग तीनों को विकसित करने पर मोदी सरकार का पूरा जोर है। सरकार का दावा है कि इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार पैदा होगा। इस ढांचागत विकास का जो परोक्ष रोजगार है, वह वही पकौड़ा बेचने वाला कारोबार है।

सवाल किसी सरकार से पूछने की बजाय उन अर्थशास्त्रियों से पूछा जाना चाहिए कि आखिर यह पकौड़ा इकोनॉमी एेसे कितने दिन चलेगी? जिस अर्थव्यवस्था की नियति यही हो कि वह अपने आश्रितों को चाय पकौड़ा बेचने से ज्यादा अवसर नहीं दे सकता उसको हर मर्ज की दवा क्यों बताया जा रहा है? ढांचागत विकास के सबसे मजबूत कारीगर नितिन गड़करी भी हांफने लगे हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर का इतना विकास ठीक नहीं है। सालाना २२ प्रतिशत की दर से सड़क पर गाड़ियां बढ़ रही हैं। आप कितनी सड़क बनायेंगे? आखिरकार आप भारत हैं और आपका आज का मध्यवर्ग अमेरिका के बराबर है। अगर इस मध्यवर्ग में आनेवाले समय में इसी तरह बढ़त होती रही तो आपका कोई भी ढांचागत विकास नाकाफी हो जाएगा। फिर क्या करेंगे?

इसलिए, किसी सरकार पर सवाल मत उठाइये। कांग्रेस भी यही पकौड़ा इकोनॉमी लागू कर रही थी, मोदी भी यही पकौड़ा इकोनॉमी लागू कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस लागू करने में जरा कमजोर पड़ जाती थी, मोदी दनदनाते हुए सरपट दौड़ रहे हैं। सवाल उठाना ही है तो इस अर्थव्यवस्था पर उठाइये जो इस पकौड़ा इकोनॉमी की जन्मदाता है। किसी नेता को बुरा भला कहकर क्या हासिल होगा?

One thought on “पकौड़ा इकोनॉमी

  1. पश्चिमी देशों में यही इकोनोमी चल रही है। भारत में भी पत्थर काटने वाले ’पकोड़ा’ बेच कर अधिक कमाते हैं। भारत में कंप्यूटर आने के पहले यही तर्क था कि कलम-स्याही से काम करने वाले”पकोड़ा’ बेचेंगे। पर प्रगति की रफ्तार को रोका नहीं जा सकता। रोकना देश के हित में नहीं है।

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