बियाबान में शोर

बंटवारे के लिए वह ‘पटेल’ सबसे ज्यादा जिम्मेदार था जिसे कोई नहीं जानता

प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में खड़े होकर उस ऐतिहासिक बहस को फिर से जिन्दा कर दिया कि आखिर सरदार पटेल प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने जबकि यह सरदार पटेल ही थे जिन्होंने देश को एक किया। विभिन्न रजवाड़ों को भारतीय तिरंगे की छत्रछाया में ले आये। संभवत: मोदी यह कहना चाहते थे कि अगर नेहरू पीएम न बनते और सरदार पटेल पीएम होते तो कश्मीर समस्या भी समय के साथ हल हो जाती।

लेकिन यहां यह महत्वपूर्ण तथ्य काबिले गौर है कि सरदार पटेल कश्मीर को भी पाकिस्तान को देने के पक्षधर थे। यह नेहरू थे जो कश्मीर को किसी भी कीमत पर पाकिस्तान को देने के लिए तैयार नहीं थे। ऐतिहासिक तथ्य ये है कि बंटवारे के लिए जिस तरह जिन्ना अड़े थे उसी तरह सरदार पटेल भी बंटवारे के प्रति सख्त हो गये थे। १९४७ में वॉयसरॉय माउण्टबेटेन ने गांधी, नेहरू, जिन्ना और पटेल से जो मुलाकातें की उसमें सिवाय गांधी के सभी बंटवारे को तत्कालीन समस्याओं का समाधान मान रहे थे। सभी बंटवारे के समर्थन में अपना अपना मंतव्य माउण्टबेटेन के सामने रख आये थे सिवाय गांधी के जिन्हें भरोसा था कि वो कांग्रेस के नेताओं (पटेल और नेहरू) को बंटवारे का विरोध करने के लिए मना लेंगे और कांग्रेस प्रस्ताव पारित करके माउण्टबेटेन को सौंप देगी। माउण्टबेटेन से गांधी ने कहा था कि अगर जिन्ना तो प्रधानमंत्री ही बनना है तो कोई हर्ज नहीं है।

लेकिन बंटवारे में सरदार पटेल से ज्यादा एक और “पटेल” की भूमिका सबसे ज्यादा निर्णायक साबित हुई। अगर वह ‘पटेल’ चाहता तो भारत का बंटवारा कभी नहीं होता।

उस पटेल का नाम था- एस के पटेल। एस के पटेल जिन्ना के निजी चिकित्सक थे। जिन्ना एक बीमार व्यक्ति थे और उनके निजी चिकित्सक एस के पटेल उनके सेहत की रखवाली करते थे। जिस वक्त दिल्ली में अड़ियल जिन्ना पाकिस्तान मांग रहे थे उसी समय की बात है। १९४७ में दिल्ली से बंबई जाते हुए जिन्ना को ट्रेन में ही ब्रोंकाइटिस का दौरा पड़ा। उनकी बहन फातिमा जिन्ना उनके साथ थीं। उन्होंने डॉ एस के पटेल के पास सूचना भेजी और आग्रह किया कि वो तत्काल ट्रेन में ही आकर उनकी जांच करे। एस के पटेल को बीच रास्ते में ही बुलाकर दिखाया गया। एस के पटेल को लगा कि इस हालत में जिन्ना बंबई नहीं पहुंच सकते और वहां जो स्वागत सत्कार की तैयारी है उसे झेलने के स्थिति में उनका रोगी बिल्कुल नहीं है। इसलिए जिन्ना को रास्ते में ही उतारकर एक अस्पताल ले जाया गया।

यहां एस के पटेल ने पहली बार अपने रोगी की छाती का एक्सरे लिया। रिपोर्ट आयी तो पटेल सन्न रह गये। जिन्ना को फेफड़े की टीबी हो गयी थी और उनका फेफड़ा लगातार सूख रहा था। डॉ पटेल ने अनुमान लगा लिया कि जिस तेजी से यह बीमारी बढ़ रही है उससे वो दो तीन साल से ज्यादा जीवित नहीं रह पायेंगे। कुछ दिनों बाद यह बात उन्होंने जिन्ना को भी बता दिया लेकिन अपनी इस बीमारी के बारे में जानकर जरा भी विचलित नहीं हुए। उल्टे जितनी तेजी से बीमारी उनकी तरफ आ रही थी उतनी ही तेजी से वो पाकिस्तान के लिए निकल पड़े। अब वो जल्द से जल्द पाकिस्तान बनता हुआ देखना चाहते थे।

जिन्ना ने डॉ पटेल को सख्त हिदायत दी कि इस बीमारी के बारे में किसी को कानो कान खबर नहीं होनी चाहिए क्योंकि जिन्ना जानते थे कि जैसे ही कांग्रेस नेताओं को यह बात पता चलेगी कांग्रेस के नेता “दो चार साल और इंतजार” करना शुरु कर देंगे और उनका मिशन पाकिस्तान कभी कामयाब नहीं होगा। डॉ पटेल ने वैसा ही किया। उन्होंने इस बारे में किसी को कभी कुछ नहीं बताया। अगर वो किसी कांग्रेसी नेता को यह बात बता देते तो शायद इतिहास में १९४७ उस रूप में दर्ज न होता जैसे दर्ज हो गया।

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