मरने के बाद भी कट्टरपंथियों द्वारा मारी जा रही हैं असमां जहांगीर

कहने के लिए असमा जहांगीर पाकिस्तान की वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता थीं, लेकिन असल में उनका असर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में था। असमा जहांगीर एक समृद्ध पश्तून परिवार में पैदा हुई थीं और उनके पिता मलिक गुलाम जिलानी पाकिस्तान में नौकरशाह थे। जनरल जिया उल हक के दौर में उनके पिता को बहुत परेशान किया गया और जेल भेज दिया गया क्योंकि वो जिया के इस्लामिक हुकूमत का समर्थन नहीं कर रहे थे। संभवत: यहीं से असमा जहांगीर के मन में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति संघर्ष का जज्बा पैदा हुआ जो आगे चलकर उनके जीवन का मकसद बन गया।

असमां जहांगीर के मानवाधिकार और इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ मानवीय मूल्यों की लड़ाई ने उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उन्हें मैगसेसे पुरस्कार मिला और पाकिस्तान का नागरिक सम्मान भी। लेकिन जीते जी कट्टरपंथियों ने कभी उन्हें न तो स्वीकार किया और न ही सम्मान दिया। वो हमेशा पाकिस्तान के कट्टरपंथी पत्रकारों, मौलानाओं और नेताओं के निशाने पर रहीं। आश्चर्य ये है कि जीते जी तो इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उनका अपमान किया ही लेकिन उनके मरने के बाद भी उनकी रूह को संगसार किया जा रहा है।

११ फरवरी को असमां जहांगीर की मौत हुई और १३ फरवरी को उनको सपुर्दे खाक कर दिया गया। इस्लामिक रिवायत के मुताबिक किसी को दफनाने से पहले नमाजे जनाजा पढ़ाई जाती है। हालांकि असमां जहांगीर अपने आपको नास्तिक घोषित कर चुकीं थी लेकिन उनकी मौत के बाद उनके लिए नमाजे जनाजा आयोजित की गयी। इस आखिरी प्रार्थना को अंजाम दिया सैयद हैदर फारुख मौदूदी ने। हैदर मौदूदी मौलाना मौदूदी के बेटे हैं जिन्हें पाकिस्तान का रिलिजियस फादर आफ नेशन कहा जाता है। मौलाना मौदूदी पाकिस्तान में जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक थे और पाकिस्तान में कट्टर इस्लामिक शासन के हिमायती भी। लेकिन उनके बेटे हैदर एक उदार, प्रजातांत्रिक व्यक्ति हैं जो मानते हैं कि रिलीजन का शासन में कोई हस्तक्षेप होना नहीं चाहिए।

हैदर असमां जहांगीर के मित्र भी थे इसलिए उन्होंने ही नमाजे जनाजा की अगुवाई की। असमा जहांगीर की इस अंतिम विदाई में महिलाएं भी शामिल हुईं जिसमें उनकी बेटी भी शामिल थी। यहीं से विवाद पैदा हो गया और कट्टरपंथियों को मौका मिल गया कि वो असमां जहांगीर की रूह को संगसार कर सकें। पाकिस्तान के मुल्ले मौलवियों का कहना है कि असमा जहांगीर के जनाजे में महिलाओं ने शामिल होकर इस्लाम की तौहीन किया है। इस्लाम में महिलाओं का शमसान जाने की मनाही है। अगर वो जाती भी हैं तो उन्हें मर्दों के पीछे पर्दे में खड़ा रहना चाहिए। असमां जहांगीर के नमाजे जनाजा में इन इस्लामिक उसूलों का पालन नहीं किया गया। लिहाजा उन लोगों पर अल्लाह निंदा कानून के तहत केस भी दर्ज करवाया गया है जो असमां जहांगीर के नमाजे जनाजा में शामिल हुए।

असमां जहांगीर के मरने के बाद कुछ कट्टरपंथियों ने उनके ऊपर कादियानी होने का “आरोप” भी लगाया है। पाकिस्तान में कादियानी मुसलमानों को गैर मुस्लिम करार दिया जा चुका है और सुन्नी मौलवी उन्हें वाजिबुल कत्ल मानते हैं। जाहिर है जिस इस्लामिक कट्टरपंथ से असमां जहांगीर जीवनभर लड़ती रहीं वही इस्लामिक कट्टरपंथ मरने के बाद भी उन्हें मार रहा है।

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