धर्म अधर्म

न हिन्दू किसी का धर्म है, न हिन्दी किसी की भाषा

भारत में हिन्दू धर्म किसी का धर्म नहीं है। वैसे ही जैसे हिन्दी भाषा किसी की भाषा नहीं है। हिन्दू और हिन्दू ये पहचान हैं, माध्यम है। धर्म और भाषा नहीं। क्योंकि जो हिन्दू हैं वो खालिस हिन्दू नहीं हैं। उनका अपना कोई न कोई मत संप्रदाय है। ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी किसी की भाषा नहीं है। जो अपनी भाषा हिन्दी बताता है असल में उसकी अपनी कोई न कोई भाषा है लेकिन वह हिन्दी बोलता है।

जैसे मैं ये कहूं कि मेरा धर्म हिन्दू है तो मैं ठहरा वैष्णव। मेरा धर्म हिन्दू कैसे हो सकता है? इसी तरह लोग हमें हिन्दी भाषी समझ लेते हैं, जबकि सच्चाई ये है कि मेरी भाषा तो अवधी है। लेकिन जैसे हिन्दू धर्म के आवरण में मेरी वैष्णव पहचान गुप्त हो गयी वैसे ही हिन्दी भाषा में मेरी अवधी पहचान लुप्त हो जाती है। एक वैष्णव और अवधी होने के नाते यहां तो मेरी मूल पहचान ही गायब हो गयी। न तो मैं हिन्दू और न ही हिन्दी मेरी भाषा लेकिन यही दोनों मेरी पहचान बन गयी है।

इसलिए अगर लिंगायत अपने आपको अल्पसंख्यक कह रहे हैं तो कुछ गलत नहीं कह रहे। सनातन धर्म भी कुछ हद तक ही भारतीय धर्मों को परिभाषित कर पाता है। असल में यहां तो सिर्फ धर्म हैं और बाकी हैं सैकड़ों की संख्या में संप्रदाय। शैव, वैष्णव और शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख ये सब संप्रदाय हैं। आश्चर्य की बात ये है कि इस्लाम की तरह एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय को खत्म करने के फतवे नहीं देता बल्कि सम्मान करता है। फिर हर संप्रदाय में कई कई उप संप्रदाय हैं। शैव में भी वैष्णव में भी। जैन में भी बौद्ध में भी और बिल्कुल नये नये शामिल हुए सिखों में भी। इसके अलावा ऐसे सैकड़ों न जाने कितने संप्रदाय हैं जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान है और वो अपनी विशिष्ट पहचान से साथ आजादी से जी रहे हैं।

ऐसे में कर्नाटक में कांग्रेस ने लिंगायत को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर ऐसी बहस छेड़ दिया है जिसका अंतत: कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा। क्योंकि अगर इस आधार पर संप्रदायों की गिनती शुरु हुई फिर तो कोई बहुसंख्यक है ही नहीं। लिंगायत कहते हैं कि वो हिन्दू विरोधी नहीं हैं लेकिन हिन्दू भी नहीं हैं। हर संप्रदाय यही कहता है। वह हिन्दू नहीं है लेकिन हिन्दू विरोधी भी नहीं है। वैसे ही जैसे एक अवधी या भोजपुरी बोलनेवाला व्यक्ति हिन्दी भाषी न होते हुए भी हिन्दी विरोधी नहीं होता।

एक रामानंदी वैष्णव होने के नाते मैं भी कह सकता हूं कि मैं हिन्दू नहीं हूं, वैष्णव हूं लेकिन हिन्दू विरोधी नहीं हूं। लेकिन ऐसा कहने से बड़ा सवाल तो ये पैदा होता है कि फिर हिन्दू कौन है? अगर इस तरह से खोजने निकले तो आपको इस देश में एक भी हिन्दू नहीं मिलेगा। तो क्या कांग्रेस सभी को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए तैयार है?

हकीकत ये है कि इस देश में न हिन्दू किसी का धर्म है और न हिन्दी किसी की भाषा फिर भी देश के सौ करोड़ हिन्दू के रूप में पहचान पाते हैं और पचास करोड़ लोग हिन्दीभाषी कहे जाते हैं। यही सच्चाई है। हम जो नहीं हैं, वही हमारी पहचान हो गयी है। और यह पहचान होने में कोई बुराई नहीं है। कांग्रेस और लिंगायत अनावश्यक रूप से एक ऐसी बहस खड़ी कर रहे हैं जो सदियों पहले पीछे छूट चुकी है। अब सदियों बाद गड़े मुर्दे उखाड़ने से मुर्दे का शरीर तो छोड़िये कंकाल भी हाथ में नहीं आयेगा।

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