सवर्ण शोषण का हथियार न बने दलित सुरक्षा कानून

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कानून कमजोर वर्ग को संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करने की गारंटी देते हैं लेकिन अगर कानून ही प्रताड़ना का औजार बन जाए तो क्या उसकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए? क्या कानून लागू करने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो उस कानून के दुरुपयोग को रोकें? सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट की समीक्षा ऐसा ही एक कदम है और जो लोग दलित राजनीति के नाम पर इस समीक्षा की आलोचना कर रहे हैं, वो देश के गैर दलितों के साथ अन्याय करने की हिमायत कर रहे हैं।

बीते सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी एक्ट के दुरुपयोग की शिकायतों पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया है कि अब किसी आरोपित व्यक्ति पर आरोप लगने पर सीधी गिरफ्तारी नहीं की जाएगी बल्कि एसपी द्वारा जांच के बाद ही गिरफ्तारी संभव होगी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि बिना जांच और साक्ष्य के एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी। किसी भी सख्त कानून में ऐसी सावधानी बरतना स्वाभाविक होता है। लेकिन भारत में कानून के दुरुपयोग को लेकर कोई खास सावधानी नहीं बरती जाती। इसका नतीजा ये होता है कि भारत में कानून न्याय पाने की बजाय सजा दिलाने के लिए इस्तेमाल होते हैं।

इस तरह से देखें तो अब तक दुरुपयोग के कारण भारत में दो कानून “काला कानून” का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। एक है दहेज उत्पीड़न को रोकने के लिए लाया गया कानून और दूसरा दलितों के उत्पीड़न को रोकने के लिए बनाया गया कानून। ये दोनों कानून बहुत ही अच्छे उद्येश्य से बनाये गये थे लेकिन इन कानूनों का इस्तेमाल दमन रोकने की बजाय दमन करने के लिए शुरु कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समीक्षा में पाया कि दहेज उत्पीड़न कानून का भी देश में बहुत बेजा इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न कानून के तहत बिना गंभीर चोट का सबूत मिले तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया है। इसके साथ ही बिना पर्याप्त साक्ष्य के पूरे परिवार की गिरफ्तारी पर भी रोक लगा दिया।  सुप्रीम कोर्ट से पहले विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट भी ऐसे ही आदेश दे चुके हैं।  अदालतों को यह काम इसलिए करना पड़ा क्योंंकि इस कानून के उपयोग से ज्यादा दुरुपयोग होने लगा था।

यही हाल एससी/एसटी एक्ट के साथ हुआ है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय की रिपोर्ट को देखें तो साल 2014 में एससी जाति के द्वारा उत्पीड़न के कुल 40,300 मामले दायर किये गये जिसमें 6,144 मामले फर्जी पाये गये। इसी तरह एसटी द्वारा 6886 मामले दायर किये गये जिसमें 1265 मामले फर्जी  पाये गये। इसके एक साल बाद 2015 में अनुसूचित जाति द्वारा 38,564 मामले दर्ज किये गये जिसमें 5,866 मामले झूठे पाये गये। इसी तरह अनुसूचित जाति के द्वारा 6275 मामले दर्ज किये गये जिसमें 1177 मामले फर्जी पाये गये। इसके अगले साल यानी 2016 में अनुसूचित जाति के 40,774 मामले दर्ज किये गये जिसमें से 5,344 मामले फर्जी पाये गये वहीं अनुसूचित जाति द्वारा इस साल 6564 मामले दायर किये गये जिसमें 912 मामले फर्जी पाये गये।

गृह मंत्रालय ने ये आंकड़े संसद में प्रस्तुत किये हैं जो बताते हैं कि इस एक्ट का कितने बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इस कानून का दुरुपयोग रोकना व्यवस्था की जिम्मेदारी है और सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समीक्षा में वही किया है। उसने कानून को कहीं से कमजोर नहीं किया है बल्कि इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए उपाय किये हैं। लेकिन जिस तरह से दलित नेताओं ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर अपनी चिंताओं से अवगत कराया है वह चिन्ताजनक है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपनी दलित वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखकर बोल रहे हैं जबकि इस बारे में बहुत व्यावहारिक तरीके से सोचने की जरूरत है जैसे सुप्रीम कोर्ट ने सोचा है। कानून द्वारा एक वर्ग को सुरक्षा देने का मतलब दूसरे वर्ग का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो कानून अपनी ही अहमियत खो देता है।

लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक दल कानून के उपयोग से ज्यादा कानून के दुरुपयोग के हिमायती हो गये हैं।  शायद इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तुरंत हरकत में आ गये और बीजेपी के भी दलित नेताओं ने भी पीएम से मिलकर सुप्रीम कोर्ट की गाईडलाइन के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का दबाव बनाया है। बीजेपी की राजनीतिक मजबूरी है इसलिए वह मना भी नहीं करेगी लेकिन देश में सवर्णों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि अगर कोई राजनीतिक दल उनके उत्पीड़न को कानूनी मान्यता देना चाहता है तो फिर वो उस राजनीतिक दल के साथ कैसा व्यवहार करेंगे? बीजेपी के सवर्ण नेताओं को चाहिए कि वो सरकार द्वारा दायर की जा रही पुनर्विचार याचिका का विरोध करें। यही लोकतंत्र का तकाजा है।

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