जिन्ना का जिन्न

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अपनी तस्वीर को लेकर जिन्ना एक बार फिर चर्चा में है। वह इसलिए क्योंकि भारत में जिन्ना एक शैतानी जिन्न हैं तो पाकिस्तान में भी उनकी छवि एक ऐसे जिन्न की बना दी गयी है जिसके पास असीम ताकत थी। इतनी कि दुनिया में इस्लाम के नाम पर पहला देश बना दिया। लेकिन जितना मैंने जिन्ना को समझा है उतने में मुझे वो एक त्रासदी लगते हैं। पता नहीं नियति ने इतिहास का ये पात्र गढ़ा ही क्यों था। वो सच्चे मुसलमान कहीं से नहीं थे। खोजा मुस्लिम थे। वही खोजा जिसे सच्चा मुसलमान वाजिबुल कत्ल मानता है।

फिर बहुत तेज दिमाग पढ़े लिखे और चोटी के वकील थे। जिन्दगी में न कभी नमाज पढ़ी। न रोजा रखा। न सिर पर टोपी न बदन पर इस्लामी लिबास। जब पाकिस्तान बना और कायदे आजम के बतौर उनका पहला भाषण हुआ तो उस वक्त पहली और आखिरी बार जिन्ना ने अचकन और पाजामा पहना था। जिन्ना को यह ड्रेस इतना नापसंद था कि उसके बाद फिर कभी उसको हाथ नहीं लगाया। खानपान भी ऐसा कि सूअर के मांस वाला हैमबर्गर खाते थे और मंहगी सिगार शराब के शौकीन थे। गांधी जी के आने से पहले उनके इसी “उदार” स्वभाव के कारण कांग्रेस में उनकी हनक रहती थी।

लेकिन लंदन से लौटे जिन्ना कुछ और ही थे। वो पाकिस्तान की एक ठोस मांग लेकर भारत लौटे थे। लेकिन इतिहास को देखें तो संभवत: बंटवारा जिन्ना भी नहीं चाहते थे। वह कुछ तो हिसाब बराबर कर रहे थे। किससे कर रहे थे, यह समझ नहीं आता। लेकिन जिन्ना का रवैया बदले की भावना वाला था। या फिर हो सकता है वह अपने ही बनाये किसी ऐसे चक्रव्यूह में फंस गये थे कि फिर उससे कभी बाहर ही नहीं निकल पाये।

मसलन, वॉयरॉय से शुरुआती बैठकों में पाकिस्तान को लेकर जिन्ना का रुख इतना कठोर था कि वॉयसरॉय उन्हें “और किसी विकल्प” पर विचार करने के लिए तैयार नहीं कर सके। लेकिन जब कांग्रेस ने बंटवारे का प्रस्ताव मान लिया और बंटवारे पर जिन्ना की सहमति के लिए माउण्टबेटन ने वॉयसरॉय हाउस बुलाया तो जिन्ना एकदम से खामोश हो गये। न हां बोला न ही न कहा। माउण्टबेटन से उन्होंने कहा कि यह फैसला मैं अकेले कैसे ले सकता हूं? इसके लिए मुझे मुस्लिम लीग के दूसरे नेताओं की सहमति लेनी पड़ेगी। माउण्टबेटन जानते थे जिन्ना ही मुस्लिम लीग थे। उनका फैसला ही मुस्लिम लीग का फैसला था। लेकिन जिन्ना के इस रुख से वो हैरान थे। जो आदमी पाकिस्तान के लिए चट्टान की तरह अटल खड़ा था, आज जब पाकिस्तान मिल रहा है तो यह आदमी लेने से ही कतरा रहा है।

खैर, इतिहास की यह एक लंबी कहानी है कि कैसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग की संयुक्त बैठक में पाकिस्तान का प्रस्ताव पारित हुआ। माउण्टबेटन ने जिन्ना के सामने बैठक में जिन्ना की सहमति पूछी तो जिन्ना एक शब्द भी नहीं बोले थे। सिर्फ हल्के से सिर हिलाकर “हां” का संकेत कर दिया था। वह हां इतना हल्का था कि बहुत ध्यान से न देखते तो वॉयसरॉय को भी दिखाई न पड़ता।

इसलिए कम से कम मेरे लिए जिन्ना इतिहास की एक त्रासदी है। एक ऐसी त्रासदी जिसके बारे में यही पता लगाना मुश्किल है कि उसने अलगाववादी मुसलमानों का उपयोग किया कि अलगाववादी मुसलमानों ने उनका उपयोग किया? वह पाकिस्तान बनाने के लिए वॉयसरॉय का इस्तेमाल कर रहे थे कि वॉयसरॉय पाकिस्तान बनाने के लिए जिन्ना का इस्तेमाल कर रहे थे? लेकिन जो भी हुआ उसमें जिन्ना एक ऐसे पात्र के रूप में सामने आते हैं जो एक धर्म के नाम पर पाकिस्तान बनाता है लेकिन पाकिस्तान बनते ही सबको अपना धर्म पालन करने की आजादी दे देता है। वह जिनके थे उनके कभी न हुए, जिनके कभी न थे उनका कायदे आजम बना दिया गया। जिन्ना पर गुस्सा तो आता है लेकिन वैसा ही जैसा घर के किसी सदस्य पर आता है कि जाकर दो थप्पड़ मारें और कहें कि तुझे समझ नहीं आ रहा है कि तू क्या कर रहा है?

लेकिन जिन्ना का जिन्न अभी इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा। हिन्दुओं के लिए भले ही जिन्ना एक “दरिंदा” हो लेकिन अलगाववादी मुसलमानों के दिल में जिन्ना आज भी जिन्दा है। वह क्यों जिन्दा है इस पर हर मुसलमान को सोचना चाहिए। क्या मुसलमान किसी और त्रासदी का खौफनाक ख्वाब देख रहे हैं?

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