नवाज क्यों हुए शरीफ?

अतीत पीछा नहीं छोड़ता। वह साये की तरह आपके साथ चलता है। ऐसी ही कुछ कहानी हमेशा के लिए पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री हो चुके नवाज शरीफ की है। नवाज शरीफ के बारे में कहा जाता है कि वो राजनीति में जनरल जिया उल हक की पैदावार हैं। जनरल जिया ने ही उन्हें पाला पोसा और बड़ा किया। लेकिन इन्हीं नवाज शरीफ को एक और जनरल मुशर्रफ ने न सिर्फ पीएम की कुर्सी से हटा दिया बल्कि देश निकाला भी दे दिया। नवाज शरीफ लौटकर आये। दोबारा पीएम बने, लेकिन अतीत अब भी साये की तरह उनके पीछे था।

नवाज शरीफ का खौफनाक अतीत वही फौज है जिसकी वो खुद पैदाइश कहे जाते हैं। करीब एक दशक बाद देश निकाले से लौटकर आये नवाज शरीफ जब २०१३ में तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने तो साया एक बार फिर हमशाया था। नवाज शरीफ जब तीसरी बार पीएम बन रहे थे तब तक मुंबई में आतंकी हमला हो चुका था और इस हमले के पर्याप्त सबूत पाकिस्तान को सौंपे जा चुके थे कि हमलावर पाकिस्तान से ही आये थे। जिन्दा पकड़े गये आतंकवादी अजमल कसाब ने सारे राज देश और दुनिया के सामने खोल दिये थे। लेकिन पाकिस्तान अभी भी “सबूतों” की मांग कर रहा था। मुंबई हमलों के मुख्य साजिशकर्ता हाफिज सईद और लखवी को पाकिस्तान की अदालतों ने इसलिए रिहा कर दिया क्योंकि पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं दिये थे।

इस बीच २०१६ में एक बड़ी घटना हुई जिसे पाकिस्तान में डॉन लीक्स के नाम से जाना जाता है। डॉल लीक्स में अखबार के एक संवाददाता सिरिल अल्मीडा ने एक स्टोरी लिखी जिसमें बताया कि आतंकवाद के मसले पर सेना और सिविलियन सरकार आमने सामने है। सिविलयन सरकार चाहती है कि सेना “नेशनल एक्शन प्लान” के तहत आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करे। यह स्टोरी नवाज शरीफ और जनरल राहिल शरीफ के बीच हुई बैठक में बातचीत के आधार पर बनी थी जिस पर बहुत बवाल भी हुअा। इस स्टोरी का संदेश यही था कि शरीफ के चाहने के बाद भी सेना पाकिस्तान से आतंकवाद के खात्मे के लिए नेशनल एक्शन प्लान पर अमल नहीं कर रही है।

उन्हीं सिरिल अल्मीडा ने तीन दिन पहले एक बार फिर नवाज शरीफ से बातचीत की है जिसमें शरीफ ने फिर सेना पर सवाल उठाया है। इन्हीं सवालों में एक सवाल ये भी है कि आखिर (मुंबई हमलों) के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई आज तक? नवाज शरीफ जब मुंबई हमलों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं तो वो सेना के साथ साथ हाफिज सईद पर भी निशाना साधते हैं जिसे आजकल पाकिस्तानी फौज राजनीतिक पुनर्वास करने में लगी है। हाफिज सईद अगर इस साल होनेवाले आम चुनाव में मैदान में उतरता है तो पहले ही कमजोर मुस्लिम लीग (एन) और अधिक कमजोर हो जाएगी क्योंकि हाफिज सईद की पार्टी पंजाब में नवाज शरीफ को इतना नुकसान तो पहुंचा ही सकता है कि इसका फायदा इमरान खान की तहरीके इंसाफ को हो जाए।

इसके साथ ही उन्होंने भारत सहित दुनिया को भी ये संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ कौन है। लेकिन यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि २०१३ का चुनाव नवाज शरीफ ने हाफिज सईद की लश्कर-ए-तैयबा और मलिक इशाक की लश्कर ए झांगवी की मदद से जीता था। क्या इस बात पर सचमुच यकीन किया जा सकता है कि चुनाव जीतने के बाद सचमुच नवाज ने सेना पर कार्रवाई का दबाव बनाया होगा?

जाहिर है, नवाज शरीफ पर इस वक्त दोहरा दबाव है। भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें हमेशा के लिए प्रधानमंत्री पद के अयोग्य घोषित किया जा चुका है और चुनाव में वो अपनी पार्टी की जीत भी सुनिश्चित करना चाहते हैं। ऐसे माहौल में वो अपने आप को असहाय बताना चाहते हैं ताकि उनका नाकामियों का ताज फौज के सिर पर रख दिया जाए। इससे स्थानीय राजनीति में उन्हें सहानुभूति मिले न मिले अंतरराष्ट्रीय जगत में विश्वास जरूर हासिल होगा। खासकर भारत में, जहां अभी तक विदेश मंत्रालय ने नवाज शरीफ की स्वीकारोक्ति पर एक बयान देना भी जरूरी नहीं समझा है।

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